Abul Fazal Biography in Hindi | अबुल फजल की जीवनी

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Abul Fazal Biography in Hindi | अबुल फजल की जीवनी
Abul Fazal Biography in Hindi | अबुल फजल की जीवनी

अबुल फजल (Abul Fazal) का पूरा नाम फजल-इब्न-मुबारक था | अबुल फजल का जन्म 14 जनवरी 1551 को शिक्षित और इस्लामी संस्कार से युक्त मुस्लिम परिवार में हुआ था | इनके पिता शेख मुबारक नागौरी इस्लामिक सिद्धांतो के अच्छे जानकार थे | वे सिंध के सिविस्तान , सहवान के निकट रेल नामक स्थान के एक सिन्धी शेख ,शेख मुसा की पांचवी पीढ़ी से थे | वे यूनानी साहित्य और दर्शन के भी विद्वान थे | हुमांयू के पुन: हिंदुस्तान का राज्य प्राप्त कर लेने पर ईराक के अनेक विद्वान भारत पहुचे | वे शेख मुबारक के मदरसे आगरा भी आये |

अबुल फजल (Abul Fazal )को अकबर के जीवनीकार तथा उनके शासनकाल के इतिहासकार के रूप में ख्याति प्राप्त है | उन्होने अकबर की जीवनी लिखी जिसका नाम “अकबरनामा” (Akbarnama) है | यह पुस्तक फारसी में लिखी गयी है | एक इतिहासकार के तौर पर उन्होंने अकबर के शासनकाल को तीन खंडो की श्रुंखला में विस्तार से लिखा है | इस शृखला की तीसरी पुस्तक का नाम “आइन-ए-अकबरी” है जिसके दो भाग है | पहले भाग में राज्य एवं प्रशासन का उल्लेख है तथा दुसरे में भारत की भौगालिक एवं सांस्कृतिक स्थिति का वर्णन है |

पहले भाग के एक अध्याय में राज्य के समस्त मनसबदारो की सूची दी हुयी है | इनमे सबसे ऊँचा पद दस-हजारी है | यह पद शहजादा सलीम को हासिल था | एक अन्य पद हफ्त-हजारी या सात-हजारी जो कि दुसरे शहजादे को हासिल था | नवरत्नों में से अब्दुर्रहीम खानखाना तथा राजा मानसिंह पांचहजारी थे | यह तीसरा सर्वोच्च पद था | ये दोनों ही साम्राज्य की सेनाओं के सर्वोच्च सेनापति भी थे | खानखाना को साम्राज्य के आठ न्यायधीशो में से एक होने का गौरव हासिल था जिन्हें बादशाह का प्रतिनिधि कहा जाता था |

आइन-ए-अकबरी के अनुसार राजा टोडरमल और दस अन्य वजीर चार हजारी थे | अबुल फजल अकबर के प्रमुख सलाहकारों में थे | नौकरी की शुरुवात उन्होंने केवल बीस से की थी लेकिन अपनी मेहनत और बुद्धिमानी के बल पर 2500 की मनसबदारी हासिल कर ली थी | राजा बीरबल को दो हजारी तथा फैज को चार-हजारी बताया गया है | साहित्य ,इतिहास और दर्शन की उन्हें गहरी जानकारी थी | वे उत्कृष्ट विचारक और स्तरीय लेखक थे | अकबर के दरबार में पेश होने वाले धार्मिक विवादों का निबटारा उन्ही के जिम्मे था |

धर्म और ईश्वर के बारे में अबुल-फजल खुले विचारो एक व्यक्ति थे इसलिए कुछ लोग उन्हें हिन्दू , कुछ पारसी तो कुछ नास्तिक भी कहते थे | जो भी हो वे सामाजिक समरसता और शान्ति के प्रबल समर्थक थे | यह भी माना जाता है कि अकबर में सभी धर्मो के प्रति उदार मानसिकता को पनपाने वाली शख्सियत अबुल फजल ही थे | वह एक कुशल संघठन कर्ता एवं सैन्य संचालक भी थे | अपनी इस क्षमता को सिद्ध करने का मौका उन्हें 1599-1600 के दौरान तब मिला जब उन्हें खानदेश का शासक नियुक्त करके भेजा गया | उन दिनों उन्होंने सैन्य संचालन की अपनी क्षमता और संघठन कौशल को खुलकर प्रयोग किया |

प्रशासन को सम्भालने की इस कुशलता के कारण वे अकबर के ओर अधिक निकट आ गये | प्रशासन को सम्भालने की कुशलता के प्रदर्शन के कारण उन्हें अकबर का दांया हाथ समझा जाने लगा | जिन दिनों शहजादा सलीम ने बादशाह के खिलाफ जंग का एलान किया , उन दिनों अबुल फजल ने खुलकर शहजादा सलीम की खिलाफत की | इससे नाराज होकर उसने वीरसिंह बुंदेला को उकसा दिया जिसने 12 अगस्त 1602 को अबुल फजल (Abul Fazal) की हत्या कर दी |

अकबर को अबुल फजल (Abul Fazal) की मौत से इतना गहरा धक्का लगा कि तीन दिनों तक उन्होंने अपने आप को महल में बंद रखा और किसी से नही मिले | इस अपराध के लिए सलीम को उन्होंने कभी माफ़ नही किया | “अकबरनामा” (Akbarnama) का परिशिष्ट अबुल फजल की मौत के बाद इनायतुल्ला ने तैयार किया था | उन्होंने उसका नाम “तकमील-ए-अकबरनामा” रखा | अबुल फजल की मौत पर दुःख व्यक्त करते हुए उन्होंने श्रुधांजलि के तौर पर लिखा है “अफ़सोस ,चतुराई की खान और ज्ञान का महासागर नही रहा ! ज्ञान और विज्ञान की ज्योति बुझ गयी वाक्-पटुता और उत्क्रुत्स्ता का झरना ठहर गया ”

अपनी पुस्तको में अबुल- फजल (Abul Fazal) ने मुगल शासको के प्रशासनिक ,आर्थिक ,सामाजिक और राजनीतिक ढाँचे के साथ-साथ शासक के रूप में अकबर के कार्यो और उपलब्धियों को सुस्पष्ट वर्णन किया है | “अकबरनामा” लिखने में उन्हें सात साल लगे | यह किताब दो भागो में विभक्त है इसमें उन्होंने शन्शाह के रूप में अकबर की सामाजिक एवं आर्थिक उदार नीतियों का अच्छा वर्णन किया है | “अकबरनामा” के पहले भाग को पुन: दो भागो में बांटा गया है जिसमे से पहले में उन्होंने तैमुर से लेकर अकबर के जन्म तक उसकी वंशावली का ब्यौरा दिया है | इसमें अकबर की सत्रह साल की उम्र तक के समय को समेटा गया है तथा दुसरे भाग में अकबर के 46वे वर्ष तक के शासनकाल का जिक्र किया है |

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