Alexander Fleming Biography in Hindi | पेनिसिलिन के अविष्कारक अलेक्जेंडर फ्लेमिंग की जीवनी

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Alexander Fleming Biography in Hindi | पेनिसिलिन के अविष्कारक अलेक्जेंडर फ्लेमिंग की जीवनीपेनिसलिन के नाम की आज हर व्यक्ति जानकारी रखते है | एक समय था जब इस दवा को भी संक्रामक रोगों में प्रयोग किया जाता रथा | शरीर में हुए घावो को ठीक करने और संक्रमण को ठीक करने के लिए इस दवा का प्रयोग किया जाता था | यह पहली एंटीबायोटिक औषधि थी जिसे बहुत लम्बे समय तक प्रयोग किया जाता रहा | अब इसकी क्रियाशीलता बढ़ जाने के कारण इसका प्रयोग न के बराबर हो गया है | इस जादू भरी औषधि को खोजने का श्रेय अलेक्जेंडर फ्लेमिंग (Alexander Fleming) को दिया जाता है |

स्कॉटलैंड में 6 अगस्त 1881 को अलेक्जेंडर फ्लेमिंग (Alexander Fleming) का जन्म हुआ था | इस वैज्ञानिक ने सन 1906 ने चिकित्सा विज्ञान की डिग्री प्राप्त करने के बाद प्रतिजीवी पदार्थो पर कार्य करना शुरू कर दिया | इसके बाद अलेक्जेंडर फ्लेमिंग (Alexander Fleming) रॉयल आर्मी मेडिकल कॉप्स में चले गये | प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद वह सन 1918 में फी से सेंट मेरी स्कूल में लौट आये और प्रतिजिवी पदार्थो पर काम करना आरम्भ कर दिया |

पेनिसिलिन के आविष्कार की कहानी बड़ी मनोरंजक है | फ्लेमिंग (Alexander Fleming) एक दिन पेट्री डिश में कुछ प्रयोग कर रहे थे तो उन्होंने देखा कि उसमे फफूंद उग आयी है | जहा जहा फफूंद उगी है पेट्री डिश में वही पर बैक्टीरिया मर गये है | उन्होंने देखा कि यह फफूंद पेनिसिलियम नौटाडम है | इस घटना को उन्होंने फिर दोहराया | इस फफूंद के नमूने उन्होंने उगाये और जीवाणुओं पर इनका प्रभाव देखा तो उन्होंने पाया कि इस फफूंद के रस से रोग के जीवाणु मर जाते है | यह उनके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण आविष्कार था |

दो अन्य वैज्ञानिकों ने सन 1938 में इसे स्थिर कर दिया | उसके बाद इस औषधि को सन 1941 में दुसरे विश्वयुद्ध में घायल हुए 6 रोगियों पर प्रयोग किया गया | इसके अच्छे परिणाम प्राप्त हुए लेकिन पेनिसिलिन की कमी हो जाने के कारण ये 6 रोगी मर गये | इसी वर्ष के अंत में वे पेनिसिलिन अलग करने की विधि के सिलसिले में अमरीका गये | वहा उन्होंने अनेक वैज्ञानिकों से पेनिसिलिन अलग करने की विधि पर विचार विमर्श किया | आखिरकार इसे अलग करने का तरीका खोज लिया गया |

देखते ही देखते यह औषधि संक्रामक रोगों को ठीक करने का सरताज बन गयी | दुसरे विश्वयुद्ध में घायलों को ठीक करने में पेनिसिलिन रामबाण साबित हुयी | इसके बाद में पेनिसिलिन के इंजेक्शन और गोलियाँ अनेक संक्रामक रोगों में प्रयोग की गयी | लगभग सन 1970 तक शल्य चिकित्सा के रोगियों पर इस औषधि का भरपूर प्रयोग किया गया | सन 1970 के दशक में इस औषधि की क्रियाशीलता से लोग मरने लगे तब से इसका प्रयोग न के बराबर हो गया |

इस औषधि से निमोनिया , रक्त की विषाक्तता , डिफ्थीरिया , गले का दर्द ,सड़े हुए घावो आदि का इलाज सम्भव हो गया | यौन रोगों के इलाज में यह औषधि रामबाण साबित हुयी | इस औषधि को पेनिसिलियम नौटाडम नामक फंफूद से खोजा गया इसलिए इसका नाम पेनिसिलिन रखा गया | इस औषधि के आविष्कार के बाद streptomycin ,टेरामाइसिन आदि अनेक एंटीबायोटिक औषधिया खोजी गयी | आज 80 से भी अधिक एंटीबायोटिक औषधिया है जिनसे विश्व में हर वर्ष करोड़ो लोगो को मौत के मुंह से बचाया जाता है |

इनमे से कुछ औषधिया के प्रति रोगी क्रियाशील हो है जो रोगियों को डॉक्टरों द्वारा नही दी जाती है | अच्छे अच्छे विशाल ऑपरेशनों में एंटीबायोटिक औषधिया बहुत ही सफल सिद्ध हुयी है यद्यपि इनके साइड इफ़ेक्ट भी होते है | इस महान अविष्कार के लिए सन 1945 का चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार फ्लेमिंग , फ्लोरे और जेन को प्रदान किया गया | इससे फ्लेमिंग (Alexander Fleming) का नाम विश्वभर में फ़ैल गया | सन 1955 में इस महान वैज्ञानिक का देहांत हो गया | उनके योगदानो को हम कभी नही भूल सकते है |

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