Amrita Pritam Biography in Hindi | साहित्यकार अमृता प्रीतम की जीवनी

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Amrita Pritam Biography in Hindi | साहित्यकार अमृता प्रीतम की जीवनी
Amrita Pritam Biography in Hindi | साहित्यकार अमृता प्रीतम की जीवनी

भारतीय साहित्य में अमृता प्रीतम (Amrita Pritam) का नाम बड़े आदर से लिया जाता है | शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो कि इस नाम से अपरिचित हो | अमृता जी ही ऐसी एक लेखिका है जिनकी कृतियों का अनुवाद विश्व की 34 भाषाओं में हुआ है साथ ही अनेक भारतीय भाषाओं में भी अनुवाद किया गया है | उनकी रचनाओं में उपन्यास , कविता संग्रह , स्नस्म्रुतिया तथा निबन्ध है | उनकी कई कहानियों पर टीवी धारावाहिक बन चुके है तथा फिल्मो का निर्माण हुआ है जिसमे पिंजर , पिंजर और डाकू फिल्मे तथा कशमकश जैसे टीवी सीरियलस सम्मिलित है |

अमृता प्रीतम (Amrita Pritam )का जन्म 31 अगस्त 1919 में हुआ था | उनकी माँ का नाम “राज” तथा पिता का नाम नन्दसाधू था | वे अपने माँ बाप की अकेली सन्तान थी | बचपन में ही उनकी माँ का देहांत हो गया | पिताजी भी विरक्त हो गये | इससे उनका विश्वास भगवान पर से बिल्कुल उठ गया | उनका पालन पोषण उनकी नानी ने किया | वर्ष 1947 के भारत-पाक बंटवारे को उन्होंने बहुत करीब से देखा और महसूस किया था | उनके शव्दों में सामजिक , राजनितिक और धार्मिक मूल्य काँच के बर्तनों की भाँती टूट गये थे और उनकी किरचे लोगो के पैरो में बिछी हुयी थी | उस समय वे अपने जीवन के सोलहवे साल में थी | उनके युवा मन में इन रिश्तो की तपिश अधिक महसूस हुयी कि उन्होंने कविताये लिखना शुरू किया |

वर्ष 1936 में उनक विवाह हुआ | जब वे चार वर्ष की थी तो उनकी माँ के नजदीकी रिश्ते से बुआ के बेटे के साथ सगाई हुयी थी | उनकी माँ की मृत्यु के बाद उनके पिता ने उनका विवाह उसी लडके से करके अपना फर्ज पूरा किया परन्तु उन्हें वैवाहिक सुख कम ही मिला | उन्हें लगता था कि वे एकदम अकेली है | अमृता प्रीतम का कार्यक्षेत्र सिमित था उअर उन्होंने एक कवि और लेखक के रूप में पंजाबी भाषा में गध्य और पध्य दोनों में ही रचनाये की है | उनके प्रिय विषय है कविता , उपन्यास और कहानी |

अमृता प्रीतम (Amrita Pritam )पंजाबी की सबसे लोकप्रिय लेखको में से एक थी | पंजाब के गुजरावाला जिले में पैदा हुयी अमृता प्रीतम को पंजाबी भाषा की पहली कवियत्री माना जाता है | उन्होंने कुल मिलाकर 100 से अधिक पुस्तके लिखी है | उनकी कृतियों का अनुवाद कई भाषाओं में हुआ है जिनसे हिंदी , उर्दू , गुजराती ,अंग्रेजी , मलयालम , कन्नड़ ,बांगला , सिन्धी ,मराठी आदि भाषाओं में अनुदित पुस्तके है | अपने जीवन के अंतिम दिनों में अमृता प्रीतम को भारत का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्मविभूषण प्राप्त हुआ था | उन्हें साहित्य अकादमी पुरुस्कार से पहले ही सम्मानित किया जा चूका था | उनके द्वारा अर्जित पुरुस्कार निन्व्त है जिनका विवरण इस प्रकार है | साहित्य अकादमी पुरुस्कार (1957), पंजाबी भाषा पुरुस्कार  (1958), बैरोव पुरुस्कार , बल्गारिया (1988), ज्ञानपीठ पुरुस्कार (1982) आदि |

यधपि अमृता प्रीतम (Amrita Pritam) का जन्म गुजरावाला पाकिस्तान में हुआ था परन्तु उनका बचपन लाहौर में बीता | उनकी प्रांरभिक शिक्षा लाहौर में हुयी | किशोरावस्था में उन्होंने लिखना शुरू किया – कविता , कहानी और निबन्ध आदि | उनकी प्रकाशित पुस्तके लगभग 100 से अधिक है | उनकी महत्वपूर्ण रचनाये अनेक देशी-विदेशी भाषाओ में अनुदित है | उनकी गध्य कृतिया भी अत्यंत लोकप्रिय है जिनमे किरमिची लकीरे काला गुलाब  ,अगदिया लकीरा , एकी पत्तिया डा गुलाब , सफरनामा , अपने अपने चार बरे , कडी जिन्दगी कड़ा साहित्य , कच्चे अखर , एक मेहंदी एक हाथ छल्ला , मुहब्बतनामा , मेरे काल मुकुट समकाली ,कड़ी धुप्पदा सफर , अज्ज दे काफिर आदि सभी हिंदी में अनुदित है |

अमृता प्रीतम (Amrita Pritam) के अनुसार तीन घटनाओ ने उनके नारीत्व की पहचान  उनसे करवाई | पहली बार जब वे पच्चीस वर्ष की थी उनके कोई बच्चा नही था और उन्हें प्राय: रात को एक बच्चे का स्वप्न आया करत अता | यह बच्चा सपने में उनसे बाते किया करता था | रोज एक ही बात और उसकी आवाज से उनकी पहचान पुरी हो गयी थी | दुसरी बार जन साहिर को बुखार आया तब उसकी सेवा करने में उन्हें अहसास हुआ था | तब उनके अंदर की औरत को उस समय दुनिया के किसी कागज कलम की आवश्यकता नही थी | तीसरी बार जब इमरोज ने स्टूडियो में अपने ब्रश से उनके माथे पर लाल रंग की बिंदी लगा दी इससे उनके मन पर अद्भुद प्रभाव पड़ा |

अमृता प्रीतम (Amrita Pritam )ने वर्ष 1980 से वर्ष 1990 तक के दशक की पंजाब की घटनाओं पर 24 कहानीकारों की कहानियों का सम्पादन किया | इस पुस्तक का नाम था “एक उदास किताब” | इसका विमोचन तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह ने किया था | अपनी कृतियों से उन्होंने अपना नाम देश-विदेश में कमाया | उनके द्वारा रचित “एक शहर की मौत” नामक कहानी तथा “नौ सपने” नामक कविता का विरोध सामाजिक एवं सरकारी संघठन द्वारा किया गया क्योंकि ये दोनों कृतिया गुरुनानक साहब की माँ के गर्भवती होने के अनुभवो पर आधारित थी | इसके बावजूद वर्ष 1957 में “सुनैहेड़े” नामक कविता संग्रह पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरुस्कार से सम्मानित किया गया |

वर्ष 1969 में राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री और 1982 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरुस्कार मिला |अमृता प्रीतम ने विभिन्न देशो में जाकर अपने विचारों को रखा और दोस्ती और मोहब्बत का संदेश दिया | इनके लिए उन्होंने रोमानिया ,हंगरी , मोरिशस , इंग्लैंड , जर्मनी ,फ़्रांस , युगोस्लाविया , नेपाल , बुल्गारिया ,सोवियत संघ तथा चेकोस्लोवाकिया आदि देशो का भ्रमण किया | अपनी कृतियों में उन्होंने दो आत्मकथाये “रसीदी टिकट” तथा “हुजरे दी मिटटी” लिखी है |

बेबाक जीवन जीने वाली अमृता प्रीतम जी (Amrita Pritam) ओशो से अत्यधिक प्रभावित रही इसलिए उन्होंने महिलाओ का आह्वान करते हुए कहा था कि भाग्य के भरोसे बैठना ठीक नही है | स्वयं को ऊँचा उठाने की जिम्मेदारी स्वयं पर ही है अन्य किसी पर नही अत: पुरी जिम्मेदारी के साथ स्वयं को ऊँचा उठाने का प्रयास करते रहना चाहिए | उनका निधन 31 अक्टूबर 2005 में हुआ परन्तु उनकी रचनाये देशवासियों को सदैव उनकी याद दिलाती रहेगी |

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