Baburao Painter Biography in Hindi | चलचित्र के चित्रकार बाबूराव पेंटर की जीवनी

Baburao Painter Biography in Hindi

Baburao Painter Biography in Hindi

बाबुराव पेंटर (Baburao Painter) का पूरा नाम बाबुराव कृष्ण जी मिस्त्री पेंटर था | उनका जन्म चित्रकारों के परिवार में हुआ था | उनके परिवार में पिछली तीन पीढ़ी से लोग चित्रकारी करते थे इसलिए उन्हें पेंटर कहा गया | बाबुराव ने कुछ समय तक दादा साहब फाल्के के कला विभाग में भी काम किया था | चित्रकारी के साथ साथ उन्हें रंगमंच और सिनेमा के प्रति भी रूचि जागृत हो चुकी थी | वह अक्सर नाट्य प्रस्तुतिया और फिल्मे देखा करते थे | वह स्वयं भी एक नाट्य मंडली चलाते थे |

कुछ समय बाद पेंटर ने फिल्म शो का व्वयसाय भी शुरू किया | तत्पश्चात उन्होंने फिल्म बनाने का निर्णय लिया | इस कार्य के लिए उन्होंने 1 दिसम्बर 1917 को महाराष्ट्र फिल्म कम्पनी की स्थापना की और “सैरेन्ध्री” नामक पहली फिल्म के लिए कार्य प्रारम्भ कर दिया | उस दौर में महाराष्ट्र में सैरंध्री का नाटक बहुत लोकप्रिय था और जब फिल्म बनी तो यह काफी सराही गयी | इस फिल्म से बाबुराव पेंटर (Baburao Painter) बेहतरीन फिल्मकार घोषित किये गये |

पेंटर (Baburao Painter) फाल्के की तरह ही गम्भीर , रचनात्मक और अन्वेषी फिल्ल्मकर थे | फिल्माकंन में सेट की परिकल्पना वह बखूबी करते थे | महाभारत के ही आख्यान पर आधारित बाबुराव ने दुसरी फिल्म “वत्सला हरण” बनाई | इस फिल्म को बनाने के लिए उन्होंने नया कैमरा खरीदा था | इस फिल्म का दूसरा नाम “माया बाजार” रखा गया था | गौरतलब है कि उन दिनों एक ही फिल्म के कई नाम होते थे -हिंदी ,अंग्रेजी ,गुजराती और मराठी में | लेकिन बाबुराव पेंटर अपनी फिल्मो के नाम ज्यादातर हिंदी में ही रखते थे |

बाबुराव (Baburao Painter) की तीसरी फिल्म थी “दामा जी” | इन फिल्मो के पश्चात पेंटर की महाराष्ट्र फिल्म कम्पनी की व्यावसायिक क्षमता बढ़ गयी किन्तु तभी 6 नवम्बर 1922 को उनके स्टूडियो में भयानक आग लग गयी | सब कुछ भस्म हो गया | तब ललित कलादर्श मंडली ने बाबुराव की आर्थिक सहायता की | इस सहायता से उन्होंने “सिंहगढ-1923” नमक फिल्म बनाई | यह फिल्म मुम्बई में कई महीनों तक चली | कहा जाता है कि पेंटर खर्च करने के मामले में बेसुध थे |

कहा जाता है कि जब उनकी मृत्यु हुयी तब उन पर 36,000 रूपये का कर्ज था | सन 1925 पेंटर के लिए सबसे सफल साल था | इस साल उन्होंने “राणा हमीर” “शाह के शह” और “साहूकारी पाश” नामक तीन फिल्मे बनाई थी | “साहूकारी पाश” उनके जीवन की सबसे बेहतरीन फिल्म मानी जाती है | इस फिल्म में उन्होंने सामाजिक यथार्थ को बड़े पैमाने पर दर्शाया था | इस फिल्म का संदेश था अनपढ़ मत रहो और भूखे मर जाओ लेकिन साहूकार से कर्ज मत लो |

मूक फिल्मो के युग में महाराष्ट्र फिल्म कम्पनी द्वारा बनाई गयी अंतिम फिल्म थी “महारथी कर्ण” (1928) | इस फिल्म का निर्देशन पेंटर (Baburao Painter) के शिष्यों मसलन विष्णुपंत गोविन्द दामले और फतेलाल ने मिलकर किया था | आगे चलकर उनकी फिल्म कम्पनी ने वनकुद्रे शांताराम और केशव धायबर भी जुड़ गये | सन 1929 में बाबुराव के इन चारो शिष्यों ने मिलकर एक स्वतंत्र फिल्म कम्पनी बनाई जिसका नाम रखा प्रभात फिल्म कम्पनी |

अब तक भारतीय सिनेमा समृधि की यात्रा पर काफी आगे बढ़ चूका था | तीसरे दशक के अंत में बनने वाली फिल्मो में पौराणिक सामाजिक विषयों के साथ साथ स्वाधीनता आन्दोलन के भी असर देखे जाने लगे थे | फिल्म निर्माता उस समय स्वाधीनता संग्राम के नेताओं के संदेशो को अपनी अपनी फिल्मो के माध्यम से जन-जन में प्रसारित करने लगे थे | यानि कि मूक फिल्मो में युग में ही कई अविष्कार और प्रयोग हुए वही फिल्मो को सामाजिक संदेश के प्रसारण का सबसे अहम जरिया भी माना गया | इस मकसद से उस दौर में कई फिल्मे बनी और दर्शको में सामजिक जागरूकता के अलावा देशभक्ति का पाठ भी पढाया गया |

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