Balraj Sahni Biography in Hindi | अभिनय और लेखन की मिसाल बलराज साहनी की जीवनी

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Balraj Sahni Biography in Hindi | अभिनय और लेखन की मिसाल बलराज साहनी की जीवनी
Balraj Sahni Biography in Hindi | अभिनय और लेखन की मिसाल बलराज साहनी की जीवनी

जब कभी भी फ़िल्मी जगत के महान अभिनेताओ की बात होती है तो उनमे बलराज साहनी (Balraj Sahni) का जिक्र अवश्य होता है | सफल साहित्य रचना तथा सफल अभिनय – इन दोनों का एक ही व्यक्ति में पाया जाना मणि-कांचन संयोग ही माना जाएगा | फिल्मो में सफल अभिनय द्वारा अपनी कलात्मक क्षमता को व्यक्त करना तथा सामाजिक सरोकारों को प्रधानता देने वाले उत्कृष्ट निबन्ध , रेखाचित्र तथा कहानियों के रचना करना बलराज साहनी (Balraj Sahni) के व्यक्तित्व की दो धाराए थी |  आइये इस महान कलाकार की जीवनी से आपको रुबुरु करवाते है |

बलराज साहनी का प्रारम्भिक जीवन

बलराज साहनी (Balraj Sahni) का जन्म 01 मई 1913 को ब्रिटिश भारत के पंजाब के रावलपिंडी में हुआ था | उनके पिता हरवंशलाल साहनी अपने नगर के एक समृद्ध नागरिक थे को आयात-निर्यात का व्यापार करते थे | पंजाब यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में M.A. करने के बाद बलराज ने अपने पिता के काम में सहयोग देना आरम्भ किया | शीघ्र ही उनके जीवन में एक परिवर्तन आया | गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के साथी और सहयोगी गुरुदयाल मलिक जब एक बार रावलपिंडी आये तो उन्होंने युवक बलराज साहनी की सुप्तप्रतिभा को पहचाना और उनके पिता से कहा “आपने इस पक्षी को पिंजरे में क्यों दाल रखा है ? इसे पिंजरे से मुक्त कीजिये और उन्मुक्त गगन में विचरण करने दीजिये  ”

इस बीच बलराज ने टैगोर के साहित्य को पढ़ा और “गीतांजली” और “डाकघर” जैसी रचनाओं में निहित महाकवि की रहस्यवादी अवधारणाओं से परिचय प्राप्त हुआ | 1936 मर बलराज (Balraj Sahni) का विवाह दमयन्ती के साथ हुआ और यह विवाहित युगल हनीमून मनाने शान्ति निकेतन गया | गुरुदयाल मलिक से परिचय के कारण उन्हें शान्ति निकेतन के अथितिग्रुह में ठहराया गया और गुरुदेव से भेंट हुयी |  लाहौर जैसी विलास और फैशन नगरी में रहे तथा शैले ,कीट्स और बायरन जैसे रोमांटिक कवियों की मांसल शृंगार से आपुर्रित कृतियों से रस ग्रहण करने वाले इस युवक को शान्ति निकेतन का सौम्य शांत वातावरण बहुत अधिक रुचिकर तो नही लगा किन्तु गुरुदेव के आग्रह से वे वहा पर्याप्त समय तक रहे |

बलराज साहनी का लेखन जीवन

Bhisham Sahni with actor Balraj Sahni
Bhisham Sahni with actor Balraj Sahni

इस बीच बलराज (Balraj Sahni) ने साहित्य-लेखन के द्वारा जीवनयापन किया | वो कलकत्ता आये और “विशाल भारत” के तत्कालीन संपादक अज्ञेयजी का सहारा पाकर पत्रों में नियमित रूप से लिखने लगे | शीघ्र ही उनकी अनेक कृतियाँ प्रकाश में आयी और बलराज का एक कविता संग्रह “कुंगपोश ” प्रकाशित हुआ | प्रारम्भ में उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी में लिखा किन्तु महाकवि रवीन्द्रनाथ की प्रेरणा से वे पंजाबी में भी लिखने लगे क्योंकि गुरुदेव ने बताया कि पंजाबी भी बंगला जितनी पुरानी भाषा है और जिस भाषा में गुरुनानक ने लिखा उसमे लिखकर हर कोई स्वयं को कृतार्थ मानेगा |

कलकत्ता जैसे महानगर में रहकर केवल लेखन से गुजारा करना बलराज (Balraj Sahni) को कठिन जान पड़ा तो वे पुन: शान्ति निकेतन आ गये और कृष्ण कृपलानी के माध्यम से पुन: गुरुदेव से मिले | उन्होंने गुरुदेव से निवेदन किया कि वे यथा सुविधा उन्हें शान्ति निकेतन में अध्यापक रख ले | यह भी कहा कि चाहे नौकरी देरी से मिले , उन्हें फिलहाल अपने पिता के भेजे 100 रुपयों का भरोसा है जिससे कुछ दिन तो निर्वाह हो जाएगा | बलराज के इस सहज ,सरल कथन को सुनकर विनोदी स्वभाव वाले गुरुदेव हंस पड़े और बोले “तो तुम्हारे पास 100 रूपये है तो तुम मुझसे भी अधिक अमीर हो | खैर तुम निश्चिंत रहो तुम्हे ये रूपये खर्च नही करने पड़ेंगे “|

गुरुदेव ने वचन निभाया और बलराज (Balraj Sahni) को विश्वभारती में अंग्रेजी पढाने का काम मिल गया | शान्ति निकेतन का यह निवास बलराज साहनी के लिए नवीन स्फूर्ति तथा नवप्रेरणा का स्त्रोत बना | यहा रहकर उन्होंने अपनेमे जिन कलात्मक अभिरुचियो को जगाया तथा उपनिषद काल के सदृश्य सौम्य और शालीनता के संस्कार अर्जित किये , उन्हें अपने अभिनय काल में भी यथा-तथा सुरक्षित रख पाए और फ़िल्मी दुनिया में एक सुसंस्कृत छाप छोड़ सके |

बलराज साहनी का अभिनय जीवन

Balraj Sahni as Shambhu Mahato in Do Bigha Zamin

शान्ति निकेतन में कुछ वर्ष रहकर बलराज महात्मा गांधी के सेवाग्राम में रहे , जहा उन्होंने गांधीवादी सर्वोदय चिन्तन से रुबुर हुए | गांधीजी के आग्रह पर वे BBC में समाचार प्रवक्ता के रूप में लन्दन चले गये | चार वर्ष वे वहा रहे और 1944 में स्वदेश लौटकर Indian Peoples Theater Association (IPTA) से जुड़ गये | इस प्रकार अपनी अभिनय क्षमता को विकसित करने का अवसर उन्हें मिला | 1946 में सर्वप्रथम चेतन आनन्द की सिफारिश पर फणी मजुमदार ने अपनी फिल्म “इन्साफ” में काम मिला |  |

कुछ समय बाद कला को समाजिक प्रतिबद्धता स जोड़ने वाले ख्वाजा अहमद अब्बास ने उन्हें “धरती के लाल” में अभिनय करने का अवसर दिया | इसी फिल्म से बलराज साहनी फ़िल्मी दुनिया में अपनी स्थानीय पहचान बना पाए | यही वह फिल्म थी जिसका रूस में प्रदर्शन हुआ और जो श्रेष्ठ भारतीय फिल्म का गौरव प्राप्त कर सकी | उनकी पत्नी दमयन्ती साहनी ने पति के साथ फिल्म “गुडिया” में काम किया किन्तु इस क्षेत्र में आगे बढना उनके लिए सम्भव नही हो सका |

श्रेष्ठ फिल्म निर्माता बिमल राय ने जब 1953 में धरती-पुत्र किसान की व्यथाकथा को आवाज देने वाली फिल्म “दो बीघा जमीन” बनाई तो बलराज को अपनी अभिनय क्षमता दिखाने का एक ओर अवसर मिला | समाजवादी विचारधारा से प्रतिबद्ध साहनी की कला के परिष्कार और विकास में दलित और शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति ,करुणा और संवेदना के भाव कारक बनकर आये थे | 60 वर्ष की कुल आयु वाल बलराज ने फ़िल्मी जीवन बहुत काल नही जिया | तथापि वो लगभग 94 फिल्मो में नजर आये |

किसी साहित्यिक कृति पर आधारित फिल्म में काम करना बलराज को विशेष प्रिय था क्योंकि वे स्वयं को भी साहित्यकार मानते थे | यही कारण था कि प्रेमचन्द की कहानी पर आधारित फिल्म “हीरा-मोती” (दो बैलो की कहानी) , रवीन्द्रनाथ की विख्यात कहानी “काबुलीवाला” तथा पंजाब के उपन्यासकार नानक सिंह की औपन्यासिक कृति “पवित्र पापी” के आधार पर बनी फिल्मो में उनकी भूमिकाये विशेष प्रभावशाली रही | कालान्तर में वे चरित्र अभिनेता के रूप में रजत पट पर आये |

1969 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री के सम्मान से नवाजा | 1971 में पंजाब सरकार ने साहित्य और कला के लिए उन्हें “शिरोमणि पुरुस्कार” प्रदान किया | 13 अप्रैल 1973 को जब बलराज फिल्म “गरम हवा” की शूटिंग के लिए तैयारी कर रहे थे उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उसी शाम को वे अनंत पथ के यात्री बन गये | जींवत और मार्मिक अभिनय तथा कला और समाज की पारस्परिक प्रतिबद्धता जैसे विचारों के कारण बलराज साहनी (Balraj Sahni) सदा स्मरण किये जायेंगे | बलराज साहनी (Balraj Sahni) के पुत्र परीक्षित साहनी फिल्मो और टीवी में सक्रिय रूप से कायरत है और

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