बेगम हजरत महल की जीवनी | Begum Hazrat Mahal Biography in Hindi

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बेगम हजरत महल की जीवनी | Begum Hazrat Mahal Biography in Hindi
बेगम हजरत महल की जीवनी | Begum Hazrat Mahal Biography in Hindi

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में आहुति देने वाली अवध की दिलेर बेगम हजरत महल (Begum Hazrat Mahal) का नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से अंकित है | लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह एक उच्चकोटि के कत्थक नर्तक , शायर , गायक और अच्छे इन्सान थे | वे कला के पारखी थे | उनकी रंगीन मिजाजी के किस्से दूर दूर तक मशहूर थे | उनकी महफिल के लिए लखनऊ की प्रसिद्ध नर्तकिया आमंत्रित की जाती थी | इन नर्तकियो में एक थी दुलारी बेगम | नवाब साहब उसकी कला से अत्यंत प्रभावित थे | वे उसे महकती बेगम के नाम से पुकारते थे | अवध के राजसिंहासन पर सुशोभित होने के बाद नवाब वाजिद अली शाह ने दुलारी बेगम को सल्तनत-ए-अवध की “जनाब-ए-आलिया” बना लिया तथा बाद में उन्हें “बेगम हजरत महल” के खिताब से अलंकृत किया गया |

बेगम हजरत महल (Begum Hazrat Mahal) अंग्रेजो की चाल को समझती थी अत: वे नवाब वाजिद अली शाह को अंग्रेजो से दूर रहने की सलाह देती | सल्तनत के काम में लापरवाही को देखकर वे नवाब साहब को हमेशा समझती थी | वे अंग्रेजो द्वारा लखनऊ में सुधार लाने के लिए दो रेजीमेंट भिजवाने के विरुद्ध थी जिसके कारण अवध की सेना भंग हुयी | कई हजार सैनिक बेरोजगार हुए | अवध का काफी हिस्सा अंग्रेज पहले ही हड़प कर चुके थे | सल्तनत का खर्च पूरा करने के लिए नवाब ने कृषि पर लगान बढ़ा दिया | इससे अवध का ग्रामीण क्षेत्र बेहाल हो गया |

इधर नवाब और लखनऊ दोनों विलासिता में डूबे थे | हर हवेली में रतजगा होता था | हर गली में शतरंज ,चौपड़ तथा जुए के जमघट लगे रहते थे | इसी बात का फायदा उठाकर अंग्रेजो ने नवाब के महल छतर मंजिल में चुपके से घुसकर नवाब वाजिद अली शाह को गिरफ्तार कर लिया तथा कलकता ले गये | अपने नवाब के अपमान से पूरा अवध दुखी था और अंग्रेजो से बदला लेना चाहता था | उधर बेगम हजरत महल (Begum Hazrat Mahal) भी दुखी एवं परेशान थी |

अंग्रेजो को जब अवधवासियों के असंतोष का पता चला तो अंग्रेजो ने 12 मई 1857 ई. को लखनऊ में दरबार लगाया था तथा अवधवासियों को झोलियो ,पुरुस्कार ,सम्मान एवं पदविया बाँट दी ताकि हिन्दुस्तान में तलवे चाटने वालो की संख्या बढ़ सके | पंरतु इससे अवधवासियों की नाराजगी दूर नही हुयी | विद्रोह की ज्वाला मध्यम अवश्य हुयी मगर बुझी नही | विद्रोहियों को बेगम हजरत महल का सांकेतिक आशीर्वाद एवं प्रोत्साहन मिल ही रहा था |

सर हेनरी लोरेन्स के लुभावने आश्वासनों से प्राय: सभी उब चुके थे | वे अपने लोकप्रिय नवाब को कलकत्ता के कारागार से मुक्त करवाकर अवध के सिंहासन पर स्थापित करना चाहते थे अत: एक सोची समझी रणनीति के तहत 7 मई 1857 को मुसाबाग में लखनऊ के सैनिको ने अंग्रेज कमांडर का आदेश मानने से इनकार कर दिया था तथा 10 मई को मडियाऊ की छावनी में अंग्रेज अधिकारी पर बंदूक तान दी | इसकी सुचना लखनऊ पहुची तो विद्रोही सैनिको को बंदी बना लिया गया |

इधर क्रांतिकारियों की फ़ौज ने फैजाबाद के मौलवी अहमदशाह के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना को चिनहट में रोक लिया | दोनों ओर से युद्ध आरम्भ हुआ | 2 जुलाई 1857 को कैप्टन विल्सन को मार दिया गया | 4 जुलाई 1857 को हेनरी लोरेन्स को मौत के घाट उतार दिया गया | क्रांतिकारियों ने नवाब वाजिद अली शाह के अनुपस्थिति में उनके 11 वर्षीय पुत्र “विरजीस कदर” को स्थापित कर दिया तथा बेगम हजरत महल ने अवध राज्य का प्रशासन सम्भाल लिया तथा अपनी सहायता के लिए राजा बालकृष्ण राव को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया | साथ ही अवध की सेना का मुख्यालय अपने महल में ही बना लिया | इसी के साथ साथ लखनऊ में हर मोर्चे के लिए तैयारी आरम्भ की गयी | मुगलों के आखिरी चिराग “बहादुरशाह जफर” को अपना सम्पूर्ण समर्थन का संदेश देकर भिजवा दिया तथा आजादी की जंग में बहादुरशाह जफर का नेतृत्व स्वीकार कर लिया |

बेगम हजरतमहल (Begum Hazrat Mahal) एक कुशल प्रशासक थी | एक अंग्रेज लेफ्टिनेट वीवेन के कथनानुसार दिल्ली जीत लेने के बाद कलकत्ता से कानपूर तक अंग्रेजो को अपना यूनियन जैक लहराने में कोई परेशानी नही हुयी परन्तु लखनऊ पर अधिकार करने के लिए उन्हें नाको चने चबाने पड़े थे | लखनऊ की किलेबंदी का कौशल मात्र बेगम हजरत महल के कारण सम्भव हो सका | लखनऊ में अंगेजो की सेना आसानी से प्रवेश नही कर सकी थी |

14 जुलाई 1857 को बेगम हजरत महल “बेलीगारद” पर आक्रमण करके अंग्रेजो को सबक सिखाना चाहती थी परन्तु घर के भेदियो ने चंद चाँदी के टुकडो के लिए इस आक्रमण की खबर अंग्रेजो तक पहुचा दी | इधर बेगम के एक अति विश्वासपात्र अहमदशाह ने 21 सितम्बर 1857 को आलमबाग के मोर्चे पर अंग्रेजो के दांत खट्टे कर दिए | वे तो कलकत्ता के “फोर्ट विलिअम्स” को भी उड़ाना चाहते थे पर घर के जयचन्दो के कारण उनकी योजना सफल नही हो सकी |

1857 में अहमदशाह ने अंग्रेजो के विरुद्ध हर मोर्चे पर अपना शौर्य दिखाया परन्तु एक विश्वासघाती जमींदार ने धोखे से उनका सिर काटकर उसे अंग्रेजो के पास भेज दिया | प्रधानमंत्री की हत्या से बेगम को आघात लगा | इधर सेना का मनोबल टूट गया और सेना बिखर गयी तब बेगम हजरत महल (Begum Hazrat Mahal) ने सेना का नेतृत्व स्वयं ले लिया तथा महिलाओं को युद्ध कौशल का प्रशिक्षण दिया गया | कई वीर महिला वीरांगनाओ ने बेगम के कंधे से कंधा मिलाकर कार्य किया तथा अंग्रेजो को उखाड़ने में मदद करते हुए अपना जीवन बलिदान कर दिया |

उन्होंने वीर सैनिको को युद्ध के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित करते हुए कहा “यदि तुम लोग मेरा साथ नही भी दोगे तब भी मै लडूंगी परन्तु जीवित रहते हुए अंग्रेजो को लखनऊ नही दूंगी | मै गोलों तथा गोलियों पर सो जाउंगी पर लखनऊ नही दूंगी” | इस ओजस्वी संकल्प का सैनिको पर गहरा प्रभाव पड़ा | सेना फिर से संघठित हुयी तथा उसने फिर अंग्रेजी सेना से युद्ध किया | इस घमासान युद्ध का संचालन बेगम हजरत महल ने किया परन्तु भेदियो तथा विश्वासघातीयो के कारण अंग्रेज सेना जीत गयी और लखनऊ पर अंग्रेजो का अधिकार हो गया | बेगम हजरत महल अकेली रह गयी | उनके हितैषियो ने उन्हें लखनऊ छोड़ने की सलाह दी |

उधर कानपुर , इलाहाबाद , मेरठ , दिल्ली आदि पर भी अंग्रेजी सेना का कब्जा हो गया | अंग्रेजो ने मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को गिरफ्तार करके रंगून भेज दिया | अंग्रेजो ने बेगम हजरत महल (Begum Hazrat Mahal) को भी बंदी बनवाने की योजना बनाई परन्तु इससे पूर्व ही  बेगम को पता चल गया तथा वे अपने बेटे के साथ नेपाल नरेश की अनुमति से काठमांडू में रहने लगी | जिसके लिए उन्हें भारी राशी चुकानी पड़ी | इस प्रकार प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन तो समाप्त हो गया परन्तु क्रांतिकारियों को उखाड़ फेकने में कोई कसर नही छोडी |

यदि उस समय पटियाला नरेश तथा सिंधिया नरेश ने अंग्रेजो का साथ नही दिया होता तो स्वतंत्रता हमे पहले ही मिल गयी होती परन्तु भारत का दुर्भाग्य रहा कि पृथ्वीराज चौहान , राणा प्रताप , शिवाजी ,लक्ष्मीबाई ,अहमदशाह , बेगम हजरत महल (Begum Hazrat Mahal) आदि जिस धरती पर पैदा हुए उसी धरती पर जयचंद , मीरजाफर आदि वतनफरोश भी पैदा हुए जिन्होंने विदेशी सांपो को दूध पिलाया तथा उन्हें अपने ही देशभक्त भाइयो को डसने के लिए छोड़ दिया | निसंदेह जब भी 1857 की क्रांति की चर्चा होगी बेगम हजरत महला के नाम का उल्लेख बड़े आदर के साथ लिया जाएगा | उनकी देशभक्ति , शौर्य और वीरता ने इतिहास के पृष्टो ने उन्हें अमर बना दिया है |

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