Bhagat Singh Biography in Hindi | क्रांतिकारी भगत सिंह की जीवनी

Bhagat Singh Biography in Hindi

Bhagat Singh Biography in Hindi

स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सशस्त्र क्रान्ति में विश्वास रखने वाले भगतिसंह (Bhagat Singh) ,बिस्मिल ,चंद्रशेखर आजाद और सूर्यसेन के नाम अंग्रिम पंक्ति में गिने जाते है | इनमे से चंद्रशेखर आजाद अनेक एक्शनो के अगुआ होकर भी कभी ब्रिटिश पुलिस , सेना या प्रशासन की पकड़ में नही आये इसलिए एक अजेय योद्धा के रूप में आजाद कहलाये | शेष तीनो आजादी के सपनों के साथ , भारत के भविष्य को लेकर अपनी एक सुनिश्चित विचारधारा भी रखते थे | इस कारण वे अपने पीछे अनगिनत किशोर ,  युवा क्रान्तिकारियो को लाने और आम जनता की सहानुभूति अर्जित करने में सफल हुए थे |

स्वतन्त्रता सेनानी सरदार किशन सिंह के सुपुत्र और प्रसिद्ध क्रांतिकारी अजीत सिंह के भतीजे भगत सिंह (Bhagat Singh) का जन्म 28 सितम्बर 1909 को पंजाब (अब पाकिस्तान ) के जिला लायलपुर के एक गाँव बंगा में हुआ था | संयोग से उसी दिन उसके पिता सरदार किशन सिंह और छोटे चाचा सरदार स्वर्ण सिंह जेल से छुटे थे और उसके बड़े चाचा अजीत सिंह का निर्वासन समाप्त होने की सुचना मिली थी तभी प्यार से उसकी दादी ने उसे “भागोवाला” (भाग्यवान) कहा और नाम रख दिया – भगत सिंह|

एक दिन ढाई-तीन साल का नन्हा भगतसिंह (Bhagat Singh) पिता के साथ खेत पर जाकर तिनके रोपने लगा | पिता ने प्यार से पूछा “क्या कर रहे हो बेटा ?” बालक ने उत्तर दिया “बंदूके बो रहा हु | जब बड़ा हो जाऊँगा तो इस खेत से बहुत सी बंदूके मिल जायगी ” | सब हंस पड़े लेकिन इस छोटी सी घटना में काल का जो संकेत छिपा था वही भगत सिंह का भविष्य था | राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत परिवार में इस बालक ने देशभक्ति और रूधि-विरोध के आर्यसमाजी संस्कार पाए थे |

नेशनल कॉलेज में जाकर भगतसिंह (Bhagat Singh) का परिचय भगवती चरण वोहरा , सुखदेव और यशपाल आदि से हुआ | भगवती चरण वोहरा के पिता बड़ी जायदाद छोड़ गये थे और यह पैसा इन सभी क्रांतिकारी साथियो के काम आ रहा था इसलिए दुर्गा भाभी सभी की भाभी बन गयी , भाभी के साथ आकर रहने वाली सुशीला सभी की दीदी बनी और इनका घर सभी क्रान्तिकारियो का घर बन गया | एम.ए.पास करने के बाद घर में भगत सिंह की शादी की बात उठी तो वे विवाह से बचने के लिए घर से भाग गये |

पहले दिल्ली आकर बलवंत सिंह नाम से “अर्जुन” पत्र के संवाददाता का काम किया फिर कानपुर जाकर गणेशशंकर विद्यार्थी के पत्र “प्रताप” में भी बलवंत सिंह के नाम से लिखने लगे | क्रान्ति-कार्य भी साथ में चला ही रहे थे | दरअसल यह एक तरह से गुप्त आन्दोलन को जन आन्दोलन बनाने का प्रयास था | उसे दर्शन और चिन्तन के साथ जोड़ने की मंशा का परिणाम था |  भगतसिंह की कुल सात वर्षीय इस सक्रियता की कहानी निरंतर जनता के साथ जुड़ने की कहानी है और इस जुड़ाव के लिए वे अपनी लेखनी का भरपुर उपयोग कर रहे थे | प्रताप के अलावा “चाँद” और “कीर्ति” में भी वे लिखते थे |

कानपूर में उनके रहने का पता चलने पर घरवालो ने दादी की बीमारी का तार देकर वही से उन्हें घर बुलवा लिया था | तब उनकी माँ विद्यावती ने कहा “इसकी शादी जबरदस्ती मत करो | अगर देश सेवा करने की मर्जी है तो इसे वही करने दो | यही गुरु महाराज की इच्छा है तो हम कौन होते है इसमें बाधा डालने वाले !” इन्ही विद्यावती को बाद में पंजाब सरकार की ओर से “पंजाब माता” का ख़िताब देकर सम्मानित किया गया |

भगतिसंह (Bhagat Singh) हिंदी -उर्दू , अंग्रेजी तीनो भाषाओं के अच्छे जानकार थे | इतने अध्ययनशील और विचारक की चोटी उम्र से ही अपनी व्याख्यान से सबको प्रभावित कर देते थे | लायलपुर में दिए गये व्याख्यान में जब उन्होंने “तेंगर्ड हत्याकांड” से जुड़े गोपीमोहन साहा की तारीफ़ कर दी तो पकड़ लिए गये | उनपर मुकदमा चलाया गया , मुकदमा आगे नही बढ़ पाया और प्रमाण के अभाव में वे छूट गये | सन 1926 में दशहरे पर एक जगह बम फटने को लेकर भी भगत सिंह पर मुकदमा चलाया गया था पर कुछ दिन जेल में अत्याचार सहकर भी वे अदालत से छुट गये |

अब उन्होंने पंजाब ,उत्तर प्रदेश ,बिहार के बिखरे हुए क्रांतिकारी संघठनो को जोड़ने के लिए एक सभा बुलाई ,जिसमे चंद्रशेखर आजाद , सुखदेव , शिव वर्मा , कुंदनलाल , कमलनाथ तिवारी , फणीन्द्र घोष , यशपाल , जयगोपाल आदि उनके सभी साथी इकट्ठे हुए | बम बनाने में माहिर यतीन्द्र दास भी कलकत्ता से आकर शामिल  हुए | चंद्रशेखर आजाद दल के सेनापति चुने गये और पूर्व संघठन “भारत नौजवान सभा” का नाम बदलकर “हिंदुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट पार्टी” कर दिया गया |

संघठन के साथियों ने “काकोरी काण्ड” के कैदियों को हवालात से छुड़ाने की योजना बनाई पर सफल नही हुए | तभी देश एम् एक ऐसी घटना घटी कि दल की पंजाब शाखा को एक एक्शन करना पड़ा | सन 1928 में संविधान संशोधन का कार्यक्रम लेकर ब्रिटेन से साइमन कमीशन भारत आया , जिसके सभी सदस्य अंग्रेज थे और कमीशन की कार्यप्रणाली भी भारत को स्वीकार्य नही थी अत: देश में जहा जहा साइमन कमीशन गया , काले झंडो के साथ प्रदर्शन करके “साइमन वापस लौट जाओ” के नारों के साथ उसका बहिस्कार किया गया |

23 अक्टूबर 1928 को लाहौर में ऐसे ही एक बायकाट जुलुस पर लाठी चार्ज में पंजाब के वरिष्ट नेता लाला लाजपत राय घायल हो गये थे और कुछ दिन बाद 29 नवम्बर को अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गयी थी | 15 दिसम्बर का लाहौर का प्रसिद्ध सांडर्स वध काण्ड लाला लाजपत राय की मौत का बदला ही था जिसके लिए भगतिसंह को पहले कलकत्ता में फरारी जीवन बिताना पड़ा और फिर दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंकर शहादत देनी पड़ी |भगतसिंह को उनके दो साथियो सुखदेव और राजगुरु के साथ 23 मार्च 1931 को फाँसी दिए जाने का समय तय हो जाने पर भी सरकार ने किस तरह क्रुद्ध जन सैलाब उमड़ने के भय से फाँसी के घोषित समय से पूर्व ही रात को चुपचाप तीनो को फांसी दे दी थी |

Leave a Reply