Bhikaji Cama Biography in Hindi | भिकाजी कामा की जीवनी

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Bhikaji Cama Biography in Hindi | भिकाजी कामा की जीवनी
Bhikaji Cama Biography in Hindi | भिकाजी कामा की जीवनी

भारत का स्वाधीनता संग्राम ! लम्बे समय तक चलने वाला निरंतर संघर्ष | बलिदानों की लम्बी कहानी | असंख्य वीर देशभक्तों द्वारा स्वतंत्रता की बलिवेदी पर जीवन की आहुति | स्वतंत्रता का नारा बुलंद करनेवालों की टोलियाँ , लाठिया , गोलियाँ और पुलिस के जूतों की ठोकरे खाते हुए भी हँसते-हँसते सीना तानकर आगे बढती रहती थी | नारियाँ भी पीछे नही रही , वे अग्रणी होकर भी चली | जीवन के समस्त सुखो को तिलांजलि देकर कठोर साधना एवं कष्टमय जीवन अपनाने वाली नारियो में श्रीमति भीका रुस्तमजी कामा (Bhikaji Cama) का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है |

बम्बई के सक सम्पन्न पारसी परिवार में 24 सितम्बर 1891 को श्रीमती कामा (Bhikaji Cama) का जन्म हुआ था | वह श्री सोराबजी पटेल की नौ संतानों में से एक थी | Alexandria Girls School में शिक्षा दिलवाकर उनके पिता ने पश्चिमी संस्कृति के बीज उनमे भरने का प्रयत्न किया , पर भीका तो भारत की पुत्री थी | तीव्र बुद्धि , जन्मजात प्रतिभा और संवेदनशील हृदय की स्वामिनी भीका अपने चारो ओर के भारतीय वातावरण से असंपृक्त कैसे रह सकती थी ? भारतीयों की अपमानजनक जिन्दगी उनके लिए असहनीय थी | उनकी गरीबी उनसे देखी नही जाती थी | यह वह जमाना था जब स्त्रियों को , विशेषकर समृद्ध परिवारों की स्त्रियों का , घरो से निकलकर समाज सेवा के क्षेत्र में अना एक बड़े साहस का काम था पर भीका स्वयं को रोक न सकी |

किशोरावस्था में ही भीका (Bhikaji Cama) का ध्यान राजनीति की ओर आकर्षित हुआ | सन 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद जब कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन हुआ , तब उनकी अवस्था केवल 24 वर्ष थी | नेताओं के उग्र भाषणों और जोरदार अपीलों से वे इतनी प्रभावित हुई कि तभी से एक सक्रिय कार्यकत्री के रूप में कार्य करने लगी | जात-पांत , धर्म सम्प्रदाय के भेदभाव को भुलाकर उन्होंने सबसे पहले सभी तरह की स्त्रियों और महिला संस्थानों के संघठन का बीड़ा उठाया | निर्धन और अभावग्रस्त महिलाओं में समाज कल्याण-कार्य के अतीरिक्त उनका विशेष कार्य उन महिलाओं को अपनी दुर्दशा के प्रति सचेत करना और उनमे जागृति का शंख फूंकना था | विदेशी राज्य के अत्याचारों के खिलाफ होने के लिए उन्होंने सभी को ललकारा और उनके सोये हुए आत्माभिमान को जगाया |

उनके क्रांतिकारी विचारों और ब्रिटिश साम्राज्य गतिविधियों से आतंकित हो सन 1885 में ही उनके पिता ने उनका विवाह श्री रुस्तम जी कामा से करके उन्हें घर परिवार की तरफ मोड़ने का प्रयत्न किया पर विवाह से उनकी गतिविधियों में कोई बाधा नही पड़ी | श्री कामा एक विद्वान और सम्पन्न पिता के पुत्र थे | प्रारम्भ में उन्होंने श्रीमती कामा (Bhikaji Cama )के काम में कोई रुकावट नही डाली | वे दोगुने उत्साह से काम में जुट गयी | यहा तक कि वे पति से अधिक कार्य के प्रति समर्पित हो गयी | वे कहा करती थी “मेरा विवाह तो मेरे ध्येय के साथ हो चूका है”| इस तरह काम में डूब जाने और घर की ओर ध्यान न दे पाने के बाद से उनका वैवाहिक जीवन असफल हो गया | फिर एक बार जब वे बहुत बीमार पड़ गयी तो पति ने यह समझकर उन्हें इंग्लैंड भेज दिया कि भारत से बाहर जाकर वे राजनीती से अलग हो जायेगी | पर यह उनका भ्रम था |

जब वो स्वस्थ होकर भारत लौटने वाली थी उन्ही दिनों इंग्लैंड में उनकी भेंट प्रसिद्ध भारतीय क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा से हो गयी | श्यामजी के ओजस्वी भाषणों से उनकी सुषुप्त भावनाओ ने फिर इतना जोर मारा कि भारत लौटने का निश्चय छोडकर उन्होंने वही स्वतंत्रता संग्राम छेड़ दिया | श्री श्यामजी वर्मा के साथ वह भी हाइड पार्क में अपने जोशीले भाषणों से स्वतंत्रता का नारा बुलंद करने लगी | अंग्रेज आश्चर्यचकित हो गये | भारत जैसे गुलाम और पिछड़े देश की एक महिला अपने शासको के देश में इस तरह खुल्लमखुल्ला विद्रोही प्रचार कर सकती है | इंडिया ऑफिस के अधिकारी आग बबूला हो गये | उन्होंने श्रीमती कामा (Bhikaji Cama) को समझाया कि वे भारत लौट जाए नही तो उनके खिलाफ कारवाई की जायेगी | पर वे कहा मानने वाली थी | उन्होंने आन्दोलन ओर तेज कर दिया |

भाषणों का सिलसिला बंद न करने पर अधिकारियो ने उन्हें जबरदस्ती निकाल देने की धमकी दी , पर वह भी बेकार ! आखिर जब श्रीमति कामा को गुप्त रूप से खबर मिली कि उनके खिलाफ कठोर कारवाई की जाने वाली है तो वे इंग्लिश चैनल के रास्ते तुंरत फ्रांस पहुच गयी और फिर पेरिस को उन्होंने अपना कार्यस्थल बना लिया | पेरिस में उनका घर क्रांतिकारीयो का मुख्य आश्रय था | यहाँ भारत,फ्रांस और रूस के सभी भूमिगत क्रांतिकारी शरण पाते थे | ब्रिटिश अधिकारियो ने उनकी गतिविधियों से आतंकित होकर उनके भारत-प्रवेश पर रोक लगा दी थी इसलिए श्रीमति कामा 35 वर्ष तक पेरिस में रही | अंग्रेज अधिकारियो ने फ्रांस सरकार से उनके प्रत्यर्पण की कई बार कोशिश की , पर असफल रहे | यदि फ्रांस द्वारा उन्हें ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया जाता तो निश्चय ही वे गोली से उड़ा दी जाती |

इस तरह फ्रांस सरकार से सुरक्षा का आश्वासन पाकर उन्होंने “वन्दे मातरम्” पत्र का प्रकाशन भी प्रारम्भ कर दिया | फ्रांस सरकार पर इस प्रकाशन ने किसी तरह की उलझन में न पड़े , इसलिए उसका प्रकाशन जेनेवा से किया गया | यह क्रांतिकारी पत्र नौ वर्षो तक विदेशो में भारतीय स्वतंत्रता की अलख जगाता रहा | उनकी एक प्रमुख एवं चिरस्मरणीय देन है भारतीय तिरंगा झंडा | भारतीय स्वतंत्रता के प्रतीक तिरंगे झंडे का नमूना श्रीमति कामा (Bhikaji Cama) द्वारा भारत से बाहर तैयार किया गया | इसकी भी एक कहानी है

18 अगस्त 1907 को जर्मनी में विश्व समाजवादियों का एक विशाल सम्मेलन हुआ था जिसमे 1000 से अधिक प्रतिनिधि सम्मिलित हुए थे | उस सम्मेलन में श्रीमती कामा को न केवल आमंत्रित किया गया , सम्मेलन के नेता श्री जीन जोरस ने सभा-मंच से उनका परिचय “फ्रेटरनल डेलिगेट” के रूप में किया जिसका अर्थ होता है हमसफर प्रतिनिधि | श्रीमती कामा (Bhikaji Cama) ने इस सम्मेलन में अपने तूफानी भाषण से श्रोताओं के हृदय में उथल-पुथल मचा दी | अपनी ओजस्वी वाणी से उन्होंने यह प्रस्ताव प्रस्तुत किया “भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का बने रहना हम भारतीयों के लिए घोर अपमानजनक और भारतवर्ष के लिए सर्वनाश है | सम्पूर्ण विश्व स्वतंत्रता प्रेमियों को विश्व की चौथाई से अधिक जनसंख्या वाले इस दलित राष्ट्र की स्वाधीनता में अवश्य सहयोग देना चाहिए”|

इसके बाद एक भारी भीड़ उन्हें बधाई देने उमड़ पड़ी | इसी बीच भावावेश में आकर उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ा और उसे भारतीय स्वतंत्रता के झंडे के रूप में गर्व से लहरा दिया और कहा “यह है मेरे राष्ट्र की पताका” | श्रीमति कामा के व्यक्तित्व और कार्यो से प्रभावित होकर स्वयं लेनिन ने उन्हें रूस आने के लिए कई निमन्त्रण दिए , जिन्हें वे किसी कारणवश स्वीकार न कर सकी | 35 वर्ष तक भारत से निष्काषित रहकर काम में जुटी रहने वाली इस निर्भीक महिला की व्रुद्धावस्था में स्वदेश लौटने की इच्छा इतनी बलवती हो उठी कि राजनीति में भाग न लेने की ब्रिटिश सरकार के शर्त पर उन्होंने यह सोचकर स्वीकृति दे दी कि अब वे काम करने लायक नही रह गयी थी | अब वो एक थकी ,रुग्ण और क्षीणकाय नारी मात्र थी |

नबम्बर 1935 में बम्बई पहुचने पर स्ट्रेचर और एम्बुलेंस द्वारा उन्हें सीधे अस्पताल पहुचाया गया , जहां आठ महीने बाद 13 अगस्त 1936 को उनका स्वर्गवास हो गया | उनके अंतिम शब्द दे “वंदेमातरम्” | 19वी सदी में जबकि अंग्रेजो की शक्ति भारत या इंग्लैंड में ही नही ,सारे संसार में बढी चढी थी और जब भारतीय परूष भी खुलकर ऐसे आंदोलनों में भाग लेने से डरते थे एक नारी का इतना महान एवं साहसी कार्य सचमुच अद्भुद प्रेरणा और शक्ति प्रदान करता है |

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