Chandra Shekhar Azad Biography in Hindi | चन्द्रशेखर आजाद की जीवनी

Chandra Shekhar Azad Biography in Hindi

Chandra Shekhar Azad Biography in Hindi

चंद्रशेखर आजाद का जन्म भांवरा गाँव में हुआ | उनके पूर्वज बदरका (वर्तमान उन्नाव जिला) से थे | कई लोग  इनका जन्म बदरका ही बताते है | आजाद के पिता सीताराम तिवारी बदरका (उत्तर प्रदेश) को अकाल के समय छोडकर मध्यप्रदेश (भंवरा) में बस गये थे | उनेक माता का नाम जगरानी देवी था | उनका बचपन आदिवासी बहुल क्षेत्र में बीता | भील बालको के साथ खेल खेल में उन्होंने धनुष-बाण चलाना सीख लिया था तथा निशानेबाजी में कुशल हो गये |

1919 में हुए जलियांवाला बाग़ नरसंहार ने देश के नवयुवको को उद्वेलित कर दिया था | चंद्रशेखर तब विद्यार्थी थे | 1921 में गांधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन की पुकार पर चंद्रशेखर अन्य युवाओं के साथ आन्दोलन में कूद पड़े | 15 वर्ष की उम्र आन्दोलन में भाग लेने के कारण 15 कोड़े मारने की सजा मिली | हर चोट पर वे चिल्लाते “भारत माता की जय” | जब न्यायाधीश ने उनसे नाम पूछा तो उन्होंने कहा “आजाद” | तब से आजाद उपनाम उनके मुख्य नाम के साथ जुड़ गया | उन्होंने संकल्प लिया था कि वे कभी भी ब्रिटिश पुलिस के द्वारा गिरफ्तार नही होंगे तथा एक स्वाधीन व्यक्ति के रूप में मरना पसंद करेंगे |

जब असहयोग आन्दोलन को गांधीजी द्वारा वापस ले लिया गया तो देश के सब युवको को निराशा हुयी | आजाद ने तब बिस्मिल ,शचीन्द्रनाथ सान्याल तथा योगेशचन्द्र चटर्जी द्वारा संस्थापित हिदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन की सदस्यता स्वीकार कर ली | इसी के अंतर्गत 1925 में काकोरी रेलवे डकैती की गयी , जिससे संघठन के लिए धन जुटाया जा सके | 1926 में वायसरॉय की ट्रेन को उड़ाने की कोशिस भी की | सांडर्स वध में भी भगतसिंह लका साथ दिया था आजाद ने |

झांसी और ओरछा उनकी गतिविधियों के केंद्र रहे | यहाँ के जंगलो में वे स्वयं निशाना साधने का अभ्यास करते थे तथा अपने क्रांतिकारी दल के सदस्यों को भी शूटिंग का अभ्यास करवाते थे | बहुत बार वेश बदलकर रहना पड़ता था | एक बार तो पंडित हरीशंकर ब्रह्माचारी नामा से वे मन्दिर में रहे | धीमरपूरा में उन्होंने छोटे छोटे बच्चो को पढ़ाकर गाँव वालों का दिल जीत लिया | भगतसिंह ,राजगुरु तथा सुखदेव को जब ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया तो आजाद ने 27 फरवरी 1931 को जवाहरलाल नेहरु से मिले तथा उनसे मदद माँगी कि वे क्रांतिकारी मुक्त हो सके पर असफल रहे |

तब वे इलाहाबाद के एल्फ्रेड पार्क में गये तथा साथियो के साथ अपनी अगली गतिविधियों की चर्चा करने लगे | इसी बीच किसी ने पुलिस को खबर कर दी | बड़ी संख्या में पुलिस ने अल्फ्रेड पार्क को घेर लिया और गोलीबारी शुरू कर दी | आजाद ने जवाब में पुलिस पर गोलिया चलाई | बचने के लिए कोई चारा न देख अंतिम गोली स्वयं को मार ली | अंग्रेज उन्हें पकड़ नही सके और वे अंत तक आजाद रहे |

 

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