Chandragupta Maurya Biography in Hindi | मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य की जीवनी

Chandragupta Maurya Biography in Hindi

Chandragupta Maurya Biography in Hindi

मौर्य वंश के संस्थापक और अपने समय के प्रतापी राजा चन्द्रगुप्त मौर्य (Chandragupta Maurya) का शासनकाल सामान्यत: 324 ईस्वी पूर्व से 300 ईस्वी पूर्व माना जाता है | इसके वंश के संबध में अलग अलग मत प्रचलित है | पुराणों के अनुसार यह मगध के राजा नन्द का पुत्र था जिसका जन्म मुरा नामक दासी के गर्भ से हुआ था | कुछ लोग इसे मयूर पोषको के ग्राम के मुखिया का पुत्र बताते है | बौद्ध और जैन सूत्रों के अनुसार इनका जन्म पिप्पलविन के मोरिय क्षत्रिय कुल में हुआ था |

मान्यता है कि बचपन में ही इस प्रतिभावान बालक पर कौटिल्य नामक ब्राह्मण की दृष्टि पड़ी | वह इसे तक्षशिला ले गया और वही इसकी शिक्षा दीक्षा हुयी | एक मत यह भी है कि चन्द्रगुप्त मौर्य सिकन्दर के आक्रमण के समय पंजाब में उससे मिला था | उसकी स्पष्टवादिता से खीझकर जब सिकन्दर ने उसे बंदी बनाने का प्रयत्न किया तो चन्द्रगुप्त (Chandragupta Maurya) उसके चंगुल से निकल भागा |इसके बाद ही इसकी कौटिल्य से भेंट हुयी जो मगध नरेश से अपमानित होकर उसे उखाड़ने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध था |

चाणक्य या कौटिल्य की सहायता से चन्द्रगुप्त (Chandragupta Maurya) ने विशाल सेना संघठित की | इस बीच सिकन्दर भारत से लौट चूका था और उसकी मृत्यु हो गयी थी | चन्द्रगुप्त ने स्थिति का लाभ उठाकर पंजाब से यूनानी सत्ता समाप्त कर दी | उसने मगध के नन्द वंश को समाप्त किया | मालवा , गुजरात  और सौराष्ट्र पर विजय प्राप्त करके नर्मदा तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया | सिकन्दर की मृत्यु के बाद उसका सेनापति सेल्यूकस पूर्वी यूनानी साम्राज्य का अधिपति बन बैठा |

उसने चन्द्रगुप्त (Chandragupta Maurya) को चुनौती दी पर उसे युद्ध में मुंह की खानी पड़ी और काबुल ,हेरात , कंधार और बलूचिस्तान के प्रदेश देने के साथ साथ अपनी पुत्री हेलेना का चन्द्रगुप्त से विवाह करके संधि करनी पड़ी | 303 ईस्वी पूर्व में हुयी यह संधि चन्द्रगुप्त की सबसे बड़ी उपलब्धि थी | उसने मगध के सिंहासन पर कब्जा किया , सेल्यूकस का घमंड मिटाया , यूनानियो को पंजाब और सिंध से भगाया और पुरे उत्तर भारत में एक सुदृढ़ राज्य की स्थापना की |

इसी का परिणाम था कि अगले सौ वर्षो तक फिर यूनानियो ने भारत की ओर मुंह नही किया | सेल्यूकस ने चन्द्रगुप्त के दरबार में मेगस्थनीज नामक दूत रखा था | उसकी रचित पुस्तक “इंडिका” से और चाणक्य अथवा कौटिल्य के “अर्थशास्त्र” से उस समय की व्यवस्थित शासन व्यवस्था का पता चलता है | उसका लगभग 24 वर्षो का कार्यकाल साम्राज्य विस्तार में ही बीता | जैन परम्परा के अनुसार अपने अंतिम दिनों में अपने पुत्र बिन्दुसार को गद्दी सौंपकर चन्द्रगुप्त (Chandragupta Maurya) ने जैन धर्म ग्रहण कर लिया था | वह स्वामी भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोल चला गया और वही उपवास करके शरीर त्याग दिया |

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