Charaka Biography in Hindi | आचार्य चरक की जीवनी

0
169
Charaka Biography in Hindi
Charaka Biography in Hindi

हमारे वेदों में चिकित्सा ज्ञान जगह जगह पर वर्णित है | इस ज्ञान को परिष्कृत करके 8 खंडो एवं 120 अध्यायों में बाँटकर चिकित्सा शास्त्रियों द्वारा उपयोग में लाने लायक बनाने वाले आचार्य चरक के जन्म , काल , परिवार आदि के बारे में प्रमाणिक जानकारिया नही है | इस कारण इस ग्रन्थ के एक सूत्र एवं विभिन्न ग्रन्थ में इसके सन्दर्भ में जो उल्लेख है उन्ही के आधार पर मोटे तौर पर केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है | आचार्य चरक (Charaka) का जन्म ईसा पूर्व छठी शताब्दी में हुआ होगा | उन्होंने यह ज्ञान कब और कैसे प्राप्त किया , इस बारे में भी कोई प्रमाणिक जानकारी नही है पर इस ग्रन्थ के एक सूत्र के अनुसार इस ग्रन्थ की रचना उत्तर प्रदेश के वर्तमान फर्रुखाबाद जिले की कायमगंज तहसील के एक स्थान कपिल में हुआ था |

आचार्य चरक (Charaka) की “चरक संहिता” वास्तव में दो विद्वानों (गुरु एवं शिष्य) के बीच संवाद के रूप में है | यह केवल चिकित्सा ज्ञान तक सिमित नही है इसमें जीवन जीने के व्यापक उद्देश्यों एवं उनकी पूर्ति की व्यापक चर्चा भी की गयी है | इसमें व्यकित को कैसे स्वस्थ रहना है यह भी समझाया गया है और वैध को किस प्रकार से एवं किस भाव से उपचार करना चाहिए यह भी बतलाया गया | वैध को सलाह दी गयी है कि प्राणिमात्र से मित्रता का व्यवहार रखे , रोगी के प्रति दया भाव बनाये ,साध्य रोगों की प्रेमपूर्वक चिकित्सा करे और असाध्य रोगों की उपेक्षा करे | इसका अर्थ है कि यदि वैध आश्वस्त हो जाए कि रोग ठीक नही हो सकता तो उसे जबरन चिकित्सा नही करनी चाहिए |

चरक संहिता में सुखी जीवन हेतु शरीर और मन को स्वस्थ रखने , इन्द्रियों के दृढ़ होने , उचित आहार द्वारा प्रसन्नता लाने की बात कही गयी है | आचार्य चरक ने बतलाया कि संसार के सभी द्रव्य औषधीय गुणों से पूर्ण होते है | वात , पित्त एवं कफ औषधि विज्ञान की आधारशिला है | “चरक संहिता” में शरीर में ओज अर्थात विद्युत की उपस्थिति का भी वर्णन किया गया है | इसमें शरीर के अंदर विद्युत प्रवाह का भी वर्णन है | त्वचा , छह अंगो , दो बाहों , दो पैरो , ग्रीवा सहित सिर तथा मध्य शरीर का वर्णन है | अस्थियो की गणना नीचे से की गयी है और इनकी संख्या 360 बतलाई गयी है |

आचार्य चरक (Charaka) ने शरीर के भिन्न भिन्न भागो का विस्तार से वर्णन किया | उन्होंने शरीर ने नौ छिद्रों (दो आँखों , दो कानो , दो नाक , एक मुख , एक गुदा एवं एक मूत्र मार्ग) का वर्णन किया | साथ ही 900 स्नायु शिराओ , 200 धमनियों , 400 पेशियों , 107 मर्म , 200 संधियों , 29,956 शिराओ का भी वर्णन किया | उनके अनुसार इनमे कमी रोगों को जन्म देती है | आचार्य चरक ने तत्कालीन समाज का भी वर्णन किया है | सिर ढककर , पैरो में जूते-चप्पल पहनकर चलने की सलाह दी है | वैद्यो की आपसी प्रतिस्पर्धा का भी उल्लेख किया है | भोजन का भी वर्णन है और मांस के गुणों का भी वर्णन चरक संहिता में किया गया है | साथ में विभिन्न प्रकार के शाको जैसे – नीम की पत्ती , मुंग ,मटर ,उद्द आदि की पत्तियों का वर्णन किया गया है | कंद -मुलो एवं बादाम अखरोट जैसे मेवों का भी वर्णन किया गया है |

जहा एक ओर विभिन्न पहलुओ में बरसने वाले जल के गुणों का वर्णन किया है वही पर सूरा एवं मद्यपान के गुण-दोषों की भी विवेचना की गयी है | यह बतलाया गया है कि विधिपूर्वक मद्यपान से भय ,शोक ,थकावट दूर होते है | उनके पास हिमालय से निकलने वाली नदियों के जल के गुणों का भी ज्ञान था और पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्रो (बंगाल की खाड़ी एवं अरब सागर) में गिरने वाली नदियों के जल का बारीक अंतर भी उन्होंने समझाया | विभिन्न स्थानों पर गंगा के प्रवाह , आलस्य के कारण उत्पन्न होने वाले रोगों , चिकित्सालय के निर्माण के समय बरती जाने वाली सावधानियो , उत्पन्न की जाने वाली व्यवस्थाओं जैसे पानी की व्यवस्था , शौचालय आदि के बारे में विस्तार से बतलाया गया है |

उस समय उपचार यंत्रो से भी होता था और मन्त्रो से भी | सूक्ष्म आकार के कृमियो , जो ढाढी मूंछ के बालो , गंदे कपड़ो में वास करती है को निकालने हेतु यंत्र विकसित थे और इन कृमियो के गुणों जैसे पैरो की संख्या , त्वचा , रक्त आदि पर इनके प्रभाव का भी वर्णन किया गया है | हृदय रोग की पीड़ा जैसे धडकन का बढना, छाती भारी होना , पसीना आना आदि का वर्णन किया गया है | आचार्य चरक के काल में मनोविज्ञान भी उन्नत था और उन्होंने उन्माद एवं उसके निदान का वर्णन किया है | मानसिक रोगी की उपयुक्त चिकित्सा के उपाय जैसे मनोनुकूल विषय याद दिलाना , गाना बजाना आदि के बारे में बतलाया गया है | यह भी बताया है कि शरीर मन को प्रभावित करता है और मन शरीर को | अत: मानसिक रोगों का उपचार करते समय शरीर को भी औषधियों द्वारा स्वस्थ किया जाना चाहिए |

स्वप्न की महिमा का भे बखान किया है और स्वप्न की विकृतियों को उन्माद का पूर्व लक्षण बताया गया है | विक्षिप्त व्यक्तियों के लिए विभिन्न उपचारों जैसे उपर से जला गिराना , चन्दन का लेप करना , रस्सी से बांधना आदि की अनुशंषा की गयी है | महामारियो की उत्पति एवं फैलने के कारणों तथा प्रभाव का भी वर्णन किया है | दूषित अन्न , दूषित जल , दूषित वायु , मच्छर ,टिड्डी , मक्खियों ,चूहों के प्रभावों को समझाया गया है | मन्त्र द्वारा चिकित्सा का भी वर्णन किया गया है | कुल मिलाकर “चरक संहिता” एक ऐसा अद्भुद ग्रन्थ है जिसमे उस काल की चिकित्सा विज्ञान की समस्त उपलब्धियों को समेटा गया है | यह माना जाता रहा है कि जो ज्ञान इसमें नही है वह कही नही है | प्राचीन काल में वैध्य कर्म करने हेतु शिक्षा पुरी करने वालो को आचार्य चरक के नाम की शपथ लेनी होती थी | “चरक संहिता” आज भी शोध का विषय है |

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here