Dr. D.N. Wadia Biography in Hindi | भूगर्भ विज्ञानी डी.एन.वाडिया की जीवनी

Dr. D.N. Wadia Biography in Hindi

Dr. D.N. Wadia Biography in Hindi

विश्व में भूगर्भ विज्ञान का वैज्ञानिक अध्ययन सोलहवी शताब्दी से होना माना जाता है किन्तु भारत में वैदिक काल से ही ताम्बा , लोहा ,सोना एवं चाँदी का उल्लेख मिलता है | हीरे का खनन भी भारतवर्ष में आदिकाल से प्रचलित है | भारत देश का समुचित एवं विस्तृत सर्वेक्षण 1851 ईस्वी में शुरू हुआ था ,जबकि ब्रिटिश सरकार ने भारतीय भूतात्विक सर्वेक्षण विभाग की स्थापना की किन्तु यह सर्वेक्षण पूर्णतया विदेशी हाथो द्वारा किया गया | सर्वेक्षण की इस पाश्चात्य परम्परा का अंत डा.वाडिया (Dr. D.N. Wadia) ने किया |

जन्म एवं शिक्षा

डा.वाडिया (Dr. D.N. Wadia) का जन्म 25 अक्टूबर 1883 को गुजरात के सुरत जिले में हुआ था | उनकी प्रारम्भिक शिक्षा सुरत में ही हुयी थी | 12 वर्ष की आयु में उनका परिवार सुरत से बडौदा चला आया और बडौदा में ही उनको उच्च शिक्षा प्राप्त हुयी | डा.वाडिया ने बम्बई विश्वविद्यालय से B.Sc. तथा M.A. की उपाधियाँ प्राप्त की थी | उस समय भूगर्भशास्त्र की शिक्षा केवल मद्रास और कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेजों में ही दी जाती थी | उन्होंने अपने अंतकरण की प्रेरणा से भूगर्भशास्त्र का स्वत: अध्ययन किया |

प्रोफेसरी और अनुसन्धान

डा.वाडिया (Dr. D.N. Wadia) 1907 में जम्मू के प्रिंस ऑफ़ वेल्स कॉलेज में भूगर्भ के प्राध्यापक नियुक्त किये गये | जम्मू शहर को घेरने वाली पर्वतश्रेणियों से उन्हें अनुसन्धान सामग्री प्राप्त हुयी | सन 1921 में 38 वर्ष की आयु में वाडिया ने भारतीय भूतात्विक सर्वेक्षण विभाग (Geological Survey of India) में कार्य करना शुरू किया और इस विभाग के विभिन्न पदों पर कार्य किया | इस क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण कार्यो में सर्वप्रथम कार्य पंजाब के पीर पांजाल पर्वत की बनावट पर मौलिक विचार थे जिसे उन्होंने सर्वेक्षण द्वारा प्रमाणिक किया |

डा.वाडिया (Dr. D.N. Wadia) ने पूंछ रियासत और पंजाब के भूगर्भ तथा हिमालय के उद्भव एवं उत्थान पर वृहत कार्य किया | हिमालय पर्वत असम से कश्मीर तक विशाल पर्वतश्रेणियों में विभक्त है जो कश्मीर से दक्षिण-पश्चिम की ओर ,बलूचिस्तान की ओर एवं असम से दक्षिण की ओर से बर्मा की ओर तीक्ष्ण मोड़ पर घूमी है | यह इतना तीव्र मोड़ है जो हिमालय श्रेणियों को न तो असम से चीन की ओर और न कश्मीर से ईरान की ओर प्राप्त है |

कश्मीर में हजारा के समीप मोड़ के विषय में प्रारम्भ में सुएस एवं अन्य भूमि विवादों का विचार था कि यह मोड़ एक ही श्रेणी का नही बल्कि दो अलग अलग श्रेणियों से बना है |उनके विचार से हिन्दूकुश की पहाड़िया एक दुसरी पर्वत श्रेणियों है और ये हिमालय का भाग नही है | किन्तु डा.वाडिया ने अन्य भूविदो के इन विचारों से असहमति प्रकट की ओर यह सिद्ध किया कि यह तीव्र मोड़ एक ही पर्वत है जो हिमालय की श्रेणी के मोड़ से बना है तथा बलूचिस्तान श्रेणी का के भाग है जो अलग नही है |

प्रमाणस्वरूप उन्होंने सिद्ध किया कि दोनों श्रेणियो की शिलाए बनावट में एक रूप है | यह एकरूपता उनके मत में हिमालय के उत्थान के समय से ही विद्यामान है | इसका कारण डा.वाडिया ने यह बताया कि पंजाब का वह निचला भाग जो तेथीस सागर से एक जीभ की तरह निकला हुआ है वह उठते हुए हिमालय पर्वत को दक्षिण-पश्चिम की ओर मोड़ने में बाध्य करता रहा | इसी प्रकार उन्होंने प्रमाणित किया कि असम की ओर मोड़ का कारण तेथीस है जो समुद्र से उठते हुए हिमालय को घुमने के लिए बाध्य कर रहा था |

यह अनुसन्धान कार्य वास्तव में हिमालय पर्वत पर बेहद दुष्कर था किन्तु डा.वाडिया ने 50 वर्ष की आयु में भी कठिन परिश्रम करके 26,920 फीट ऊँचे नंगा पर्वत दीयामित पहियों के स्थान की शिलाओं का अध्ययन हिम नदो से प्राप्त कंकडो द्वारा किया और उनकी स्तरतीयता बताई | दुर्गम पहाडी पर उनका यह साहसिक कार्य भूगर्भ सर्वेक्षण का एक ज्वंलत उदाहरण है | डा.वाडिया ने हिमालय और उससे संबधित अनेक कार्य जैसे उत्थान ,बनावट , पुराजीव अवशेषों के अलावा भूगर्भ शास्त्र के आर्थिक पक्ष का विधिवत अध्यप्प्न और सर्वेक्षण किया | यही नही , कोहाट के काले नमक के पहाड़ के उद्भव ,झेलम की स्तरीय सिवालिक युगीन चट्टानों में तेल की सम्भावित अवस्था , भारतीय मृदा एवं मिट्टियों का अध्ययन भी डा.वाडिया ने किया |

डा.वाडिया (Dr. D.N. Wadia) के नेतृत्व में बिहार में युरेनियम के भंडार ढूंढे गये | डा.वाडिया (Dr. D.N. Wadia) के मध्य एशिया के मरुस्थल के संबंध में महत्वपूर्ण कार्य किया और खनिज सम्पदा के साथ मरुस्थल के उद्भव के संबध में विचार प्रकट किये | उनका मानना था कि 10 लाख वर्ष पूर्व हिमयुग में पृथ्वी पर हिम था | हिमनद के हटने से स्थान बालू से घिरा | वर्तमान में हिमनद उत्तरी ध्रुव के रूप में शेष है |

लेखन कार्य

डा.वाडिया (Dr. D.N. Wadia) भूविज्ञान संबधी प्रथम भारतीय लेखक थे | उनकी प्रसिद्ध पुस्तक Geology of India and Burma है उन्होंने Geology of Naga Parvat and Gilgil Dsitrict तथा 1938 में Structure of Himalaya नामक पुस्तक लिखी | शिक्षक के पद पर रहते हुए डा.वाडिया ने “छात्रों के लिए भूगर्भ विज्ञान” पुस्तक की रचना की | इस पुस्तक से उनकी ख्याति विश्वव्यापी हो गयी | उत्तर भारत की नदियों से संबधित अनेक महत्वपूर्ण कार्यो पर उन्होंने वैज्ञानिक निबन्ध लिखे |

पद पुरुस्कार और सम्मान

डा.वाडिया (Dr. D.N. Wadia) को अपने जीवन में अनेक पद और सम्मान प्राप्त हुए जो इस प्रकार है |

  • श्रीलंका सरकार ने 1938 में भूगर्भ के अध्ययन हेतु उन्हें सरकारी भुवेत्ता नियुक्त किया |
  • 1945 में भारत सरकार के भूगर्भ संबधी परामर्शदाता , भारतीय खान संस्थान के निदेशक एवं 1948 में अणुशक्ति आयोग के अणुकणों एवं खनिजो के विभाग के निदेशक नियुक्त किये गये |
  • डा.वाडिया दो बार भारतीय विज्ञान परिषद के अध्यक्ष निर्वाचित किये गये | 1957 में रॉयल सोसाइटी ,लन्दन ने उन्हें अपना फेलो चुनकर सम्मानित और गौरवान्वित किया |
  • 1964 में अंतर्राष्ट्रीय भूगर्भ कांग्रेस के 22वे नई दिल्ली में होने वाले अधिवेशन में उन्होंने अध्यक्ष पद को सुशोभित किया था |
  • लन्दन की रॉयल जियोलाजिकल सोसाइटी ने इस अनुसन्धान पर उनको लेल पदक प्रदान किया | यह एक अनूठा पुरुस्कार है |
  • डा.वाडिया को राष्ट्रीय विज्ञान संस्थान ने मेघनाद साहा पदक तथा कलकत्ता एशियाटिक सोसाइटी ने पी.एन बोस पदक प्रदान किया |
  • भारत सरकार ने उनको पद्म भूषण के अलंकार से अलंकृत किया |

देहांत

15 जून 1969 को डा.वाडिया (Dr. D.N. Wadia) का देहांत हो गया | इस तरह भारत का एक देदीव्य्मान वैज्ञानिक इस दुनिया को विदा कर गया |

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