Edward Jenner Biography in Hindi | चेचक के टीके के अनुसन्धानकर्ता एडवर्ड जेनर की जीवनी

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Edward Jenner Biography in Hindi
Edward Jenner Biography in Hindi

एडवर्ड जेनर (Edward Jenner) का जन्म 17 मई 1749 को इंग्लैंड के बर्कले नगर में हुआ था | अपने नगर में सामान्य शिक्षा के अनन्तर जेनर ने चिकित्सा विज्ञान का शिक्षण एवं  प्रशिक्षण प्राप्त किया | लगभग ढाई-तीन सौ वर्ष पूर्व तक पाश्चात्य देशो में चेचक सर्वाधिक भयानक रोग माना जाता था | भारत की स्थिति इससे भिन्न नही थी | इस रोग के कारण अनेक मनुष्यों की मृत्यु हो जाया करती थी और जो इससे बच भी जाते थे तो उनका चेहरा बड़ा विकृत सा हो जाता था | भारत में इसको शीतला माता कहा जाता है और इसकी चिकित्सा कम और टोने-टोटके अधिक किये जाते थे | इसे शीतला माता का  प्रकोप माना जाता था | टोने-टोटके इसलिए क्योकि भारत तब पराधीन था और चिकित्सा विज्ञान की प्रगति नही हुयी थी | इस रोग के कारण अनेक लोगो की आंखे खराब हो जाया करती थी |

यह रोग महामारी की भांति नगर ,गाँव , कस्बे में जब प्रविष्ट होता तो महामारी का रूप लेकर सर्वत्र फ़ैल जाया करता था | यह छूत का रोग है | इसके विषय में यह प्रसिद्ध है कि जिस किसी को एक बार चेचक हो जाती थी उसको फिर दुबारा नही होती थी | इसके विषय में अनके किंवदतीया प्रचलित हो गयी थी | भारत में  अंधविश्वास अपनी जड़ जमा चूका था अत: चिकित्सा की अपेक्षा माता के पूजन अथवा टोटके अधिक  जाते थे | उधर इंग्लैंड आदि देशो में इसके विषय में यह   धारणा फ़ैल गयी थी कि गायो का दूध   दुहने वाली ग्वालिनो को , जिन्हें गौ शीतला (Cow Pox) हो जाती ,  उन्हें भी चेचक नही निकलेगी |

इस भयंकर रोग से मुक्ति दिलाने का श्रेय एडवर्ड जेनर को प्राप्त है |  अपनी आयुर्विज्ञान की पढाई समाप्त करने के उपरांत वे एक शल्य चिकित्सक के रूप में बड़े विख्यात हो गये थे और उन्होंने ही चेचक के टीके का आविष्कार किया था | बाल्यकाल से ही जेनर की इच्छा प्राकृतिक इतिहास के अध्ययन की थी | उन्होंने बड़ी लगन के साथ आयुर्विज्ञान की शिक्षा आरम्भ की | उस समय में जो लोग यह शिक्षा लेना चाहते थे उन्हें पहले किसी अनुभवी डॉक्टर की देखरेख में प्रशिक्षण लेना पड़ता था | इस प्रशिक्षण की समाप्ति के अनन्तर छात्रों को दो वर्ष तक किसी मेडिकल कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करनी पडती थी |

जेनर (Edward Jenner) ने 13 वर्ष की आयु में ब्रिस्टन के पास साडबरी नामक एक छोटे से गाँव में शिक्षा प्राप्त करनी आरम्भ की और उसके बाद उन्होंने लन्दन के एक प्रसिद्ध शल्य चिकित्सक जॉन हंटर की देखरेख में अध्ययन किया | यह अध्ययन उनका 21 वर्ष तक चालु रहा था | उनके प्रशिक्षण की अवधि में सन 1766 में एक ग्वालिन डॉक्टर हंटर के पास किसी विषय में परामर्श करने के लिए आयी | जिस समय वह आयी थी उस समय वहा चेचक पर कुछ चर्चा चल रही थी | चर्चा में भाग लेते हुए ग्वालिन ने कहा कि उसे चेचक जैसा भयंकर रोग नही हो सकता क्योंकि उसे Cow Pox हो चूका है | यह रोग गाय के थनों से आरम्भ हॉट अहि जो भी उस गाय का दूध दुहता है और उसको यह ग्रास लेता है | तदपि चेचक की भांति इस रोग में रोगी को अत्यधिक कष्ट नही होता |

एडवर्ड जेनर (Edward Jenner) ने अपना प्रशिक्षण सेंट जोर्ज हॉस्पिटल लन्दन में लिया था | प्रशिक्षण पूरा करने पर जेनर ने 1771 में अपने गाँव वापस लौट आये थे | वही उन्होंने अपने चिकित्सा कार्य आरम्भ किया | कई वर्ष बाद एक दिन जेनर को लन्दन में हुयी ग्वालिन की बात का स्मरण हो आया | उन्होंने सत्यता जानने के लिए गाँव वालो से पूछताछ की तो उन्होंने ग्वालिन की बात की पुष्टि की कि किसी को एक बार गौ शीतला हो जाने पर फिर उसे व्यक्ति को चेचक का रोग नही होता |

गाँव में रहते हुए जेनर अपना चिकित्सा व्यवसाय करते रहे किन्तु उनके मन में चेचक के विषय में कुछ न कुछ विचार आते रहते थे | आखिरकार उन्होंने सन 1796 में इस रोग पर परीक्षण करने का विचार बना लिया | तभी उनको भी ऐसी ग्वालिन मिल गयी जिसको गौ शीतला का प्रकोप हो चूका था | संयोगवश उसकी एक अंगुली में अभी उसका घाव भी विद्यमान था | एडवर्ड जेनर ने उस घाव सेइंजेक्शन की सुई से कुछ द्रव लिया और एक आठ वर्ष के जेम्स फिलिप नामक बच्चे को उसका इंजेक्शन लगा दिया | परिणामस्वरूप उस बालक पर गुट-शीतला रोग का हल्का सा प्रभाव हो गया |

उसकी चिकित्सा हो गयी और वह स्वस्थ हो गया | उसके सात सप्ताह बाद जेनर ने एक अन्य व्यक्ति के चेचक के घाव से कुछ पीव लेकर उसके लडके को उस पीव का इंजेक्शन लगा दिया | डॉक्टर को आश्चर्य कि उस लडके को चेचक निकलने के कोई लक्षण दिखाई नही दिए | अब जेनर को विश्वास हो गया कि जब उसको गौ-शीतला का इंजेक्शन लगाया गया था और उस पर उसका प्रकोप भी हुआ था यह निश्चित हो गया कि गौ-शीतला के प्रकोप को झेलने वाले को चेचक नही हो सकती | उस ग्वालिन के कथन की भी इस परीक्षण से पुष्टि हो गयी |

जेनर (Edward Jenner) इस प्रकार प्रयोग करता रहा किन्तु जन साधारण को इसमें डॉक्टर जेनर का कुछ ख्प्तीपना सा दिखाई देने लगा था और लोग उसके विषय में विभिन्न प्रकार की बाते भी करने लगे थे | कुछ लोगो की मान्यता थी कि गौ-शीतला और चेचक दो विभिन्न रोग है अत: गौ शीतला के द्रव का टीका लगाने से चेचक के रोग से बचाव नही हो सकता | इस प्रकार अनेक लोगो ने जेनर के विरुद्ध एक विचित्र प्रकार के विरोधी प्रचार करना आरम्भ कर दिया | उन्होंने इसे प्रकृति के कार्यो में हस्तक्षेप करने वाला भी सिद्ध करना चाहा |एडवर्ड जेनर ने इस आरोपों का प्रबल शब्दों में खंडन करते हुए कहा जब मनुष्य हजारो वर्षो से जानवरों का मांस खाता आ रहा है गाय का दूध पीता आ रहा है तब तो उसे इन कार्यो के प्रति घृणा नही हुयी किन्तु एक भयंकर रोग की चिकित्सा के लिए गौ शीतला के द्रव से उसे घृणा का आभास क्यों होता है ? यह सब मिथ्या धारणा है इससे किसी को किसी प्रकार की घृणा का आभास नही होना चाहिए |

एडवर्ड जेनर (Edward Jenner) ने जन समुदाय के आरोपों की ओर ध्यान देना छोड़ दिया | उन्होंने चेचक के रोग की चिकित्सा ढूंढने का यत्न किया और इस कार्य के लिए वे गौ-शीतला से ग्रस्त रोगियों से उसका द्रव एकत्रित करने में अपना समय बिताने लगे | इस प्रकार उस द्रव से जेनर ने चेचक रोधी इंजेक्शन का आविष्कार किया जो सफल सिद्ध हुआ और धीरे धीरे जेनर की यशोगाथा सर्वत्र विस्तार प्राप्त करने लगी | लोग चेचक के प्रकोप से बचने के लिए उनके द्वारा आविष्कारित टीके लगाने लगे | टीके का अविष्कार हो जाने पर विश्वभर में उसके टीके लगाये जाने लगे और जेनर के अविष्कार की ख्याति होने लगी | उसके बाद अनेक देशो ने उन्हें सम्मानित किया | सन 1802 और सन 1806 में ब्रिटिश संसद ने जेनर को बहुत सारा धन देकर सम्मानित किया था |

एडवर्ड जेनर द्वारा आविष्कारित चेचक के टीके का यह परिणाम है कि आज विश्व के लगभग सभी देशो ने चेचक जैसी भयंकर घातक रोग से मुक्ति पा ली है | यो जेनर की जीवनचर्या चल रही थी कि सन 1823 के प्रथम मास में जनवरी 26 को बर्कले में इस महान अविष्कारक की जीवन लीला समाप्त हो गयी यधपि एडवर्ड जेनर विश्व में जीवित नही है मानव प्राणी का मरण अवश्यभावी है तदपि अपने अविष्कार के कारण वे सदा सदा के लिए इस संसार में जीवित रहेंगे . उनकी यशोगाथा जीवित रहेगी |

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