बहुमुखी प्रतिभा के धनी गुरुदत्त की जीवनी | Guru Dutt Biography in Hindi

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Guru Dutt Biography in Hindi
Guru Dutt Biography in Hindi

मात्र 39 वर्ष की आयु प्राप्त करने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी गुरुदत्त (Guru Dutt) के सिनेमा की सबसे ख़ास विशेषता थी कि उन्होंने नितांत निजी संवेदनाओ को इस कदर सामाजिक आयाम प्रदान किया था कि सामाजिको को उनकी पेशकश जरा भी असामाजिक नही लगी | दर्शको ने उनकी हर फिल्म में उनकी प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता , उनके गम में अपना गम , उनके अकेलेपन में अपना अकेलापन महसूस किया | निजता की ऐसी सार्वजनिक तस्वीर हिंदी सिनेमा में अन्यत्र दुर्लभ है |

यद्यपि राजकपूर भी रूमानियत और निजता को प्रस्तुत करने वाले हिंदी सिनेमा के अन्यतम प्रस्तोता कलाकार थे परन्तु गुरुदत्त (Guru Dutt) से भिन्नता इस मायने में थी कि राजकपूर निजता को रूमानियत तक सिमित रखते थे वही गुरुदत्त निजता को यथार्थ के करीब ले जाकर उसे दर्शको के अनुभूतिजन्य अनुभवो से संपृक्त करा देते थे | फलस्वरूप गुरुदत्त (Guru Dutt) की संवेदनात्मक अदाकारी का असर लम्बे समय तक टिका रहता था और सम्भवतः यही कारण था कि ज्यादातर भारतीय सिने दर्शक , जो कि मनोरंजन के लिए फिल्मे देखने के लिए ख्यातिप्राप्त है उनकी समझ और मानसिकता की बदौलत गुरुदत्त की कई फिल्मे व्यावसायिक रूप से असफल हो गयी |

गुरुदत्त (Guru Dutt) का जन्म बंगलौर में हुआ था और शिक्षा दीक्षा कोलकाता में | गुरुदत्त के गुरु थे उदय शंकर | उनके साथ उन्होंने नृत्य के गुर सीखे | वह सन 1947 में निर्देशक बनने का ख़्वाब लिए मुम्बई आ गये | “नवकेतन” बैनर की फिल्म “बाजी” (1951) में उन्होंने उस समय के बड़े अभिनेता बलराज साहनी के साथ मिलकर पटकथा लिखी और निर्देशक भी बने | एक साल बाद ही उन्होंने 1952 में अपनी एक फिल्म कम्पनी बनाई – “गुरुदत्त फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड” | बाद में उनकी मुलाकात युवा पटकथा लेखक अबरार अल्वी से हुयी , जिनसे उनकी मित्रता आजीवन बरकरार रही |

उनकी कम्पनी की पहली फिल्म थी “आर-पार” (1954) , जिसमे उन्होंने खुद ही मुख्य भूमिका अदा की | इस हास्य प्रधान फिल्म में उनके साथ उस समय के चर्चित हास्य अभिनेता जानी वॉकर थे | गुरुदत्त की दुसरी हास्य प्रधान फिल्म थी “मिस्टर एंड मिसेज 55” (1955) | यह एक अमेरिकन शैली की हास्य फिल्म थी | फिल्म एम् पति-पत्नी के स्वाभाविक और जरुरी सहयोग तथा नोंक-झोंक की मसालेदार प्रस्तुति थी जिसे उस दौर में अनुकूल प्रतिक्रिया मिली |

जाहिर है कि गुरुदत्त (Guru Dutt) ने अब तक हास्य फिल्मे ही की थी लेकिन उनके हास्य में रोजमर्रा के जीवन का मर्म था जो निरा या निरर्थक हास्य नही था | वह संवेदना और करुणा से भरा था जो कि आम इंसान की साधारण जीवन-शैली के लिए बेहद मर्मस्पर्शी था | गुरुदत्त ने अपनी इस मर्मस्पर्शिता को आगे चलकर हास्य के बदले गम्भीर भावुकता का ढांचा तैयार किया | इस क्रम में उन्होंने “प्यासा” “कागज के फुल” तथा “साहिब बीबी और गुलाम” जैसी हृदयस्पर्शी फिल्मे बनाई | ये तीनो फिल्मे गुरुदत्त के सच्चे इरादों का वास्तविक मिश्रण थी | इन फिल्मो से गुरुदत्त अपना नाम अमर कर गये , इतिहास रच गये |

गुरुदत्त (Guru Dutt) की कला के बारे में देव आनन्द के शब्द है “गुरुदत्त में एक धधकता हुआ लावा था और उसे रचनात्मक स्तर पर कही न कही फूटना ही था | उसके अंदर प्रचलित कथानको से लड़ सकने की गहरी भावना थी | वह कुछ मौलिक और भिन्न करना चाहता था | बैचैन और संवेदनशील , चुप और अन्तर्मुखी वह अक्सर मुझे अर्धरात्रि को फोन करता था कि एक नया विचार सुझा है और मै कहता था – आ जाओ”| आइये अब गुरुदत्त की लोकप्रिय फिल्मो की चर्चा करते है |

प्यासा : रोमांटिज्म की प्यास (1957)

हिंदी और बांगला की अभिनेत्री माला सिन्हा के साथ इस फिल्म में गुरुदत्त ने एक कवि की भूमिया निभाई थी | फिल्म में उनका किरदार सामाजिक संवेदनाओ वाले भावुक कवि का है | पुरी फिल्म कलात्मकता की अनुपम पेशकश है जो कि व्यावसायिक तौर पर भी सफल है | इस फिल्म के बारे में ख्यातिप्राप्त फिल्म समीक्षक इकबाल मसूद का कहना था “प्यासा” मेरे लिए अब तक देखी हुयी सभी भारतीय फिल्मो में से सबसे अधिक भारतीय और कभी न भुलाई जाने वाली फिल्म है |

पहले कुछ शॉट्स में ही गुरुदत्त सारी मिठास ,इस शताब्दी के मध्यभाग के मध्यमवर्गीय रोमांटिज्म की सारी टूटन उड़ेल देते है गर्मियो के दिन है भंवरे फुल पर टूट रहे है कवि एक वृक्ष की छाँव में लेटा है और उष्ण वायु बह रही है | “प्यासा” के लिए साहिर लुधियानवी के लिखे गीत गुरुदत्त की भावनाओं और जज्बातों के इतने अनुकूल थे कि जैसे उन्ही के लिए तैयार किए गये थे | वे आज भी उतने ही माकूल है |

“कागज के फुल” (1959) : कल्पना की सदा

हिंदुस्तान की इस पहली सिनेमास्कोप फिल्म की कहानी में गुरुदत्त की अपनी म्ह्त्वकांश संलिप्त है | इस बार फिल्म में मुख्य किरदार कवि विजय के बदले निर्देशक सुरेश सिन्हा है | सुरेश के साथ अभिनेत्री है वहीदा रहमान | फिल्म के गीत देखी जमाने की यारी ,बिछुड़े सभी बारी बारी में आज भी गुरुदत्त के वास्तविक दर्द को महसूस किया जाता है | अपने निर्माण के वर्षो बाद आज भी यह फिल्म हिंदी सिनेमा की श्रेष्ट फिल्म मानी जाती है | “कागज के फुल” के सुरेश सिन्हा को गुरुदत्त के वास्तविक जीवन से जोडकर व्याख्याए प्रस्तुत की गयी है |

साहब बीबी और गुलाम (1962) : सामंतवाद का सिला

गुरुदत (Guru Dutt) ने यह फिल्म बांगला के मशहर लेखक बिमल मित्र के इसी नाम के उपन्यास के आधार पर बनाई थी | इस फिल का कथ्य पूर्ववर्ती फिल्मो से बिल्कुल अलग था | इस फिल्म में बिखरते सामन्तवाद को दिखाया गया था | जमींदार घरानों की अयाशी के दुष्परिणामो को दिखाना ही इस फिल्म का ख़ास मकसद था | फिल्म में मुख्य भूमिका मीना कुमारी ने निभाई थी | मीना कुमारी के अलावा स्वयं गुरुदत्त और रहमान ने इस फिल्म में अपनी गम्भीर अदाकारी से किरदार को गहराई प्रदान की थी |

फिल्म में अनेक गीत उस जमाने में अति लोकप्रिय हुए थे जो आज भी है | मसलन भंवरा बड़ा नादान है या ना जाओ साईंया छुड़ा के बईया आदि | गुरुदत की पत्नी गीता दत्त के गाये गीत आज भी अपनी मादकता के लिए मशहूर है | हालांकि इस फिल्म का निर्देशन उन्होंने खुद ने ही किया था लेकिन नाम दिया था अबरार आल्वी का | इस फिल्म को सन 1963 में सर्वोत्तम निर्देशन के लिए राष्ट्रीय पुरुस्कार से सम्मानित किया गया था |

इस फिल्म के दो वर्ष बाद ही 10 अक्टूबर 1964 की सुबह गुरुदत मृत पाए गये थे | कहा जाता है कि उन्होंने अधिक मात्रा में नींद की गोलिया खा ली थी | वास्तव में यह मौत “कागज के फुल” के नायक सुरेश सिन्हा की मौत के समान ही थी | दरअसल गुरुदत्त की फिल्मे मानवता और सामाजिकता की सहजता और स्वाभाविकता के ताने-बाने पर बनी थी इसलिए उनका महत्व आज भी कायम है |

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