Hadi Rani History in Hindi | वीरांगना हाड़ी रानी की जीवनी

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Hadi Rani History in Hindi | हाड़ी रानी की जीवनी
Hadi Rani History in Hindi | हाड़ी रानी की जीवनी

रूप नगर की राजकुमारी रूपमती की सौन्दर्य चर्चा से प्रभावित होकर दिल्ली के मुगल बादशाह औरंगजेब उससे बलपूर्वक विवाह करना चाहता था | जब रूपवती को इस बात का पता चला तो उसने उदयपुर क्र महाराणा को एक पत्र लिखकर उनसे विवाह करने का प्रस्ताव किया | उसने पत्र में लिखा कि “औरंगजेब मुझे ब्याहना चाहता है परन्तु क्या राजसिंहनी एक गिद्ध के साथ जायेगी ! क्या पवित्र वंश की कन्या मलेच्छ को अपना पति बनायेगी” पत्र के अंत में उसने लिखा था कि यदि वह उससे विवाह नही करेंगे तो वह आत्महत्या कर लेगी और इसका पाप उदयपुर नरेश महाराणा को लगेगा |

अपने कुल पुरोहित द्वारा यह पत्र उसने महाराणा को भिजवा उसका जवाब यथाशीघ्र माँगा | पत्र पढकर महाराणा कुछ सोच विचार करने लगे तभी चुडावत सरदार ने उनसे उनकी चिंता का कारण पूछा | महाराणा ने वह पत्र चुडावत जी को दे दिया | चुडावत जी यह पत्र पढ़ा और पढकर महाराणा से बोले “यह बेचारी अबला मन से आपको वर मान चुके है और अब आपका कर्तव्य है कि आप उसका पाणिग्रहण करे ” | महाराणा ने उत्तर दिया कि यदि औरंगजेब की सेना अधिक हुयी तो व्यर्थ में लोग मारे जायेंगे और राठौड़जेई का मनोरथ पूरा न हो पायेगा तथा राजकुमारी को अकारण ही आत्मघात करना पड़ेगा |इस पर चुडावत सरदार ने महाराणा को उत्तर दिया कि “आप थोड़े से लोगो के साथ राजकुमारी से विवाह के लिए जाए तथा मै सेना लेकर औरंगजेब को मार्ग में रोकता हु ” | महाराणा को यह सलाह उचित लगी तथा इसी के अनुसार अपनी योजना बनाई तथा राजकुमारी को उसी समय पत्र लिखकर तथा राजपुरोहित को देकर  उसे रूपनगर के लिए विदा किया |

सरदार चुडावत भी तत्काल विदा होकर अपनी राजधानी आये तथा दुसरे दिन प्रात:काल युद्ध का डंका बजाकर सब योद्धाओ सहित युद्ध के लिए प्रस्थान किया | प्रस्थान करते समय उन्होंने अपनी नवयौवना रानी को महल के झरोखे से झांकते हुए देखा | रानी को देखते ही उनके युद्ध में जाने की उमंग कुछ मंद पड़ गयी | मुखाकृति की कान्ति मलिन हो गयी | वे उदास मन से रानी से विदा मांगने गये | रानी ने अपने पति को देखते ही पूछा कि “महाराज ! क्या कोई अशुभ समाचार आपको मिला है जो आप इतने उदास हो गये है | आपका मुखारविंद उतर गया है | लड़ाई का डंका सुनकर तो क्षत्रिय में आवेश भर जाता है फिर आप शिथिल क्यों पड़ गये | कोई कारण अवश्य है आपको मेरी शपथ आप मुझे अवश्य बताये” |

चुडावत जी ने उत्तर दिया “रूपनगर की राठोड वंश की राजकुमारी को औरंगजेब ब्याहने आ रहा है तथा वह राजकुमारी मन ,वचन और कर्म से हमारे राणा साहब को अपना पति स्वीकार कर चुकी है अत: प्रात:काल हमारे राणा साहब उसे ब्याहने जायेंगे तथा बादशाह औरंगजेब का मार्ग रोकने के लिए मेवाड़ की सारी सेना मेरे साथ जा रही है किन्तु मेवाड़ की सेना मुगल सेना से बहुत कम है | मुझे मरने के गम नही है सभी को आगे पीछे मरना ही है फिर भी वहां से जीवित लौटने की आशा नही है | मै तो युद्ध में अवश्य जाऊँगा ताकि मेरी माता की कोख को कलंक न लगे तथा मेरे पूर्व चुडाजी के नाम पर ध्ब्ब्बा न लगे | मुझे मरने का कोई दुःख नही है परन्तु मुझे तुम्हारी चिंता है “|

इतना सुनते ही हाडी रानी (Hadi Rani) ने कहा “महाराज यदि आप रणक्षेत्र में विजय प्राप्त करेंगे तो इससे बड़ा सुख कौनसा है ? मृत्यु का समय आने पर आदमी चलते चलते ,खड़े बैठे कही भी काल कवलित हो जाता है परन्तु जिसकी मृत्यु नही वह रणक्षेत्र से भी जीवित आ जाता है अत: युद्ध में जाते समय सांसारिक सुखो की चिंता न करे तथा निश्चिंत होकर युद्ध के लिए जाए ईश्वर की इच्छा से रण में आपको विजय मिलेगी | यदि युद्ध में मारे गये तो मुझे अपना कर्तव्य भली भाँती याद है अत: यदि आप रण’क्षेत्र में मृत्यु को प्राप्त होते है तो स्वर्ग में दाम्पत्य सुख अवश्य भोगेंगे” |

इस प्रकार बात करते करते चुडावत जी युद्ध के लिए जैसे ही जाने लगे तभी रानी ने कहा “महाराज ! विजय पाकर शीघ्र लौटना | आप अपने कुल धर्म का ध्यान में रखते हुए शत्रु संहार करने में ही अपना ध्यान केन्द्रित करे न कि अन्य किसी दुसरी बात में ” | चुडावत जी बोले “रानी यह हमारी अंतिम मुलाकात है विजय पाकर लौटने की कोई आशा नही है शत्रु को पीठ दिखाकर वापस आना भी धिक्कार है तुम समझदार हो अपना स्त्रीधर्म निभाना | हम रण में काम आ जायेंगे तो मेरे पीछे अपनी प्रतिष्टा की रक्षा करना | ”

हाड़ी रानी (Hadi Rani) ने उत्तर दिया कि “महाराज आप हमारी चिंता छोड़ दे | आप अपना धर्म पालन करे | मै अपने धर्म का पालन अवश्य करूंगी |इसे आप पत्थर की लकीर समझे ” | हाड़ी रानी द्वारा कही गयी बात पर चुडावत को विशवास नही हुआ कि पता नही वे मरने के बात सती होगी या नही अत: सीढियों से उतरते -उतरते उन्होंने रानी से फिर कहा “हम जाते है तुम अपना धर्म मत भूलना ” | तत्पश्चात जब वे चौक में पहुचे तथा युद्ध का धौसा बजने लगा और सभी लोग प्रस्थान करने लगे तो अंतिम बार उन्होंने अपने सेवक को भेजकर रानी को फिर संदेश भेजा “रानी आप अपना धर्म मत भूलना “|

तब हाड़ी रानी (Hadi Rani) को लगा कि उनके पति का ध्यान उनमे ही लगा है और इस हालात में वे युद्ध नही कर पायेंगे | अत: सेवक से बोली कि “मै अपना सिर देती हु | इसे ले जाकर अपने स्वामी को देना और कहना कि हाड़ी जो पहले सती हुयी है और यह भेंट भेजी है जिसे लेकर आप निश्चिन्तता और आनन्द के साथ रणक्षेत्र में जाइए | विजय पाइए अपना मनोरथ सफल कीजिये | किसी प्रकार की चिंता न रखिये ” यह कहकर हाड़ी रानी ने तलवार से अपना सिर काट डाला |जब सेवक हाड़ी रानी का सिर त्तथा उसके द्वारा दिए संदेश को लेकर चुडावत जी के पास पहुचा तो यह देखकर और सुनकर चुडावत आनन्द और उत्सर्ग भाव से अभिभूत हो गये और युद्धभूमि की ओर रवाना हो गये |

हाडी रानी (Hadi Rani) ने अपना बलिदान देकर सतीत्व की रक्षा की | ऐसी वीरांगना महिलाये सम्मान की पात्र है | राजपरिवारो के लिए हाड़ी रानी (Hadi Rani) का चरित्र आदर्श तथा अनुकरणीय माना जाता है तथा भारत की वीरांगनाओ में उनका नाम सम्मान से लिया जाता है |

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