Ishwar Chandra Vidyasagar Biography in Hindi | ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की जीवनी

Ishwar Chandra Vidyasagar Biography in Hindi

Ishwar Chandra Vidyasagar Biography in Hindi

बंगाल के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री ,विद्वान और समाज सुधारक ईश्वरचन्द्र विद्यासागर (Ishwar Chandra Vidyasagar) का जन्म 26 सितम्बर 1802 को पश्चिमी बंगाल के मिदनापुर जिले में वीरसिंह नामक गाँव में एक गरीब परिवार में हुआ था | उनके पिता ठाकुरदास बंधोपाध्याय 8 रूपये मासिक पर एक दूकान में काम करते थे पर उन्होने अपने मेधावी पुत्र की शिक्षा की ओर पूरा ध्यान दिया | गरीबी में भी ईश्वरचन्द्र विद्यासागर आगे बढ़ते गये | वे बड़े मेधावी थे | एक बार जो चीज पढ़ लेते , उसे कभी नही भूलते |

घर के अंदर रोशनी न होने के कारण वे सडक के किनारे बिजली के खम्भों के नीचे खड़े होकर अपना पाठ पढ़ते थे | उनकी विधिवत शिक्षा संस्कृत में हुयी थी परन्तु अपने अध्यवसाय से उन्होंने अंग्रेजी का भी अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था | उनका विविध विषयों का ज्ञान देखकर संस्कृत कॉलेज के विद्वानों ने 1880 ईस्वी में उन्हें विद्यासागर की उपाधि प्रदान की थी | विद्यासागर का अधिकाँश समय शिक्षक के रूप में बीता | वे पहले फोर्ट विलियम कॉलेज और उसके बाद संस्कृत कॉलेज में रहे  |

ईश्वरचन्द्र विद्यासागर (Ishwar Chandra Vidyasagar) संस्कृत कॉलेज मर प्रिंसिपल भी थे | कुछ समय तक उन्होंने स्कूलों में इंस्पेक्टर के पद पर भी काम किया | उनके समय में बंगाल में स्कूलों का बहुत प्रसार हुआ | महिलाओं के लिए अलग स्कूल खोले गये | संस्कृत पढना पहले उच्च वर्गो तक सिमित था ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने इसकी सुविधा सभी वर्गो को दिलाई | विद्यासागर सादा जीवन और उच्च विचारों के व्यक्ति थे | वे अनुशासन को बड़ा महत्व देते थे | इसी प्रश्न पर उन्होंने शिक्षा विभाग की नौकरी छोड़ दी और समाज सुधार के कार्यो और पुस्तक रचना में लग गये |

महिलाओं की स्थिति सुधारने की ओर उन्होंने विशेष ध्यान दिया | उस समय बंगाल में विधवाओं की बड़ी दुर्दशा थी | ईश्वरचन्द्र विद्यासागर (Ishwar Chandra Vidyasagar) ने शास्त्रों के प्रमाण देकर विधवा विवाह का समर्थन किया | जब रुढ़िवादियो ने उनका विरोध किया तो अपने एकमात्र पुत्र का विवाह एक विधवा से करके उन्होंने आदर्श स्थापित किया | ईश्वरचन्द्र विद्यासागर निर्धन विद्यार्थियों की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते थे | वे किसी को छोटा नही समझते थे |

एक बार उनसे मिलने आये अपरिचित का सामान अनजाने में स्वयं सिर पर रखकर स्टेशन से अपने घर ले गये थे | उन्होंने संस्कृत , बांग्ला , और अंग्रेजी में विभिन्न विषयों पर 50 पुस्तको की रचना की | कवीन्द्र रवीन्द्र ने उनके बंग्ला गध्य को आदर्श बताकर उसकी सराहना की | पिछले 150 सालो की अनेक पीढ़िया उन्ही की लिखी पुस्तक “वर्ण परिचय” के अक्षर ज्ञान सीखती आ रही है | जुलाई 1891 ईस्वी में विद्यासागर (Ishwar Chandra Vidyasagar) का देहांत हो गया |

Leave a Reply