J.R.D. Tata Biography in Hindi | प्रसिद्ध बिज़नसमेन जे.आर.डी.टाटा की जीवनी

J.R.D. Tata Biography in Hindi

J.R.D. Tata Biography in Hindi

टाटा परिवार का देश के औद्योगिकीकरण में जो स्थान है उसके संबध में प्राय: सभी भारतवासियों के अतिरिक्त विश्वभर के महत्वपूर्ण व्यक्ति भली-भांति परिचित है परन्तु जे.आर.डी.टाटा (J.R.D. Tata) का महत्व कुछ इसलिए बढ़ जाता है कि उन्होंने भारत में कुछ नई प्राथमिकताये प्रारम्भ की | उनकी सबसे बड़ी देन भारत को विमान-सेवा प्रदान करना है | इसके अतिरिक्त उन्होंने औद्योगिक क्षेत्र में जो विशेष कार्य किये है उसी के फलस्वरूप उन्हें भारत के अतिरिक्त विदेशो में भी अत्यंत सम्मान प्राप्त हुआ |देश-विदेश से प्राप्त अन्य सम्मानों के साथ उनके लिए यह एक महत्वपूर्ण सम्मान था जो उन्हें 1992 में भारत सरकार की ओर से सर्वोच्च “भारत रत्न” प्रदान किया गया | इसी से सिद्ध होता है कि जे.आर.डी.टाटा (J.R.D. Tata) का भारतीय समाज में कितना महत्वपूर्ण स्थान है |

जे.आर.डी.टाटा (J.R.D. Tata) का जन्म बीसवी शताब्दी के प्रांरभ में हुआ था | टाटा के पुरखा ईरान से उस समय भारत में आये थे जब वहा धर्मान्ध विचारों के कारण सारी जनता को इस्लाम धर्म कबूल करने के लिए विवश किया जा रहा था | कुछ थोड़े से लोग अपनी पवित्र अग्नि को सम्भालकर बड़ी कठिनाई से कुछ नौकाओ द्वारा गुजरात तट पर पहुचे थे | उन्हें यह स्थान फारस की प्राचीन नगरी “सारी” की याद दिलाता था इसलिए इन लोगो ने इस स्थान का नाम “नवसारी ” रख दिया अर्थात उनका नया सारी प्रदेश | वे ईरान में “सारी” नगर के रहने वाले थे |

जरथ्रुष्ठ के इन भक्तो ने फारस से अपने साथ लाई उस पवित्र अग्नि को तीन सौ वर्षो तक नवसारी में ही प्रज्वलित रखा | इस प्रकार नवसारी पारसी समुदाय के सिद्धांतो ,परम्पराओं और धर्म का केंद्र बन गया | इस घराने में जमेशद जी नौशेरवान जी टाटा ऐसे भविष्य दृष्टा थे जिन्होंने भारत में औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात किया | उन्होंने सबसे पहले इस्पात का कारखाना स्थापित करने की परियोजना भारत सरकार के सम्मुख रखी थी और उन्ही के प्रयत्नों से दस वर्ष में टाटा उद्योग ने ब्रिटिश सरकार को पन्द्रह सौ मील लम्बी रेल की पटरी सप्लाई की थी | जिसके कारण ब्रिटिश सरकार ने मेसोपोटामिया तक सैनिक और युद्ध सामग्री इसी पटरी के सहारे सप्लाई की थी |

जमेशद जी ने 1887 में टाटा एंड संस की स्थापना की थी | इसमें उनके सांझीदार थे उनके सबसे बड़े पुत्र दोराब जी और चचेरे भाई रतन जी टाटा | रतन जी टाटा को आर.दी.टाटा भी कहते है का जन्म नवसारी में हुआ था | आर.डी.टाटा का विवाह छोटी आयु में ही पारसी लडकी से हुआ परन्तु किसी बच्चे को जन्म दिए बिना वह चल बसी | आर.डी.टाटा को फ्रेंच भाषा सीखने का शौक था | फ्रेंच पढाने वाले अध्यापक के घर में ही उनकी भेंट एक फ्रेंच युवती से हुयी |

यह 20 वर्ष की छरहरे बदन की लम्बी ,सुनहरे बालो और नीली आँखों वाली थी | इसका नाम सुजाने था परन्तु आर.डी.टाटा से विवाह कर उन्होंने उसका नाम सूनी रख दिया जिसका पारसी में अर्थ होता है सोने से बनी हुयी | जे.आर.डी.टाटा का जन्म 29 जुलाई 1904 को सूनी की कोख से हुआ था | उस समय तक रतन टाटा पेरिश के प्रसिद्ध एफ़ील टावर से कुछ ही दूरी पर अपना मकान बना चुके थे | जे.आर.डी. के जीवन में विमान उड़ाने का शौक यही से पैदा हुआ क्योंकि उनके मकान के पास ही इंजिनियर का मकान था जिसके पास अपना विमान था और वह विमान खड़ा करने के लिए समुद्र के किनारे एक शैड बना चूका था |

जे. आर.डी. (J.R.D. Tata) अपने बचपन के संबध में चर्चा करते हुए कहते है कि “मेरा बचपन और मेरी किशोरावस्था साधारण मध्यम वर्ग के पारसी की तुलना में भिन्न ढंग से हुयी चूँकि मेरे पिता ने फ्रेंच महिला से विवाह किया था इसलिए मैंने अपना प्रारम्भिक जीवन आधा पेरिस और आधा बम्बई में बिताया ” | 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध आरम्भ हो चूका था | उस समय जहांगीर की आयु दस वर्ष थी | पेरिस पर जर्मनी के विमान बम वर्षा करने के लिए उमड़ते हुए आते और बम गिराकर चले जाते | सायरन बजाकर लोगो को चेतावनी दी जाती थी कि वे तहखानो में चले जाए परन्तु जहांगीर अपने मकान के छज्जे पर खड़ा होकर विमानों की उडान और गिरते हुए बमो के रोमांच में खोया रहता था |

पन्द्रह वर्ष की आयु तक उनकी पढाई का सिलसिला प्रारम्भ नही हो सका था | उसके बाद उन्हें पेरिस में के बढिया पब्लिक स्कूल में दाखिल किया गया | जे.आर.डी.की माता की मृत्यु हो जाने पर इंग्लैंड के एक स्कूल में भर्ती करा दिया गया | जे.आर.डी. कहते थे कि मुझे यह बात बड़ी विचित्र लगती है कि पेरिस में मुझे मिस्त्र निवासी बताया जाता था और इंग्लैंड में फ़्रांस का | जे.आर.डी. इंग्लैंड से इंजीनियरिंग की उपाधि लेने के बाद भारत लौट आये और टाटा उद्योग में काम करने लगे |

जे.आर.डी. (J.R.D. Tata) ने जमशेदपुर के इस्पात कारखाने में काम आरम्भ किया तो उनके कानो में कार्लाइल का वह भाषण गूंज रहा था “जिस राष्ट्र के पास इस्पात होगा उसी के पास सोना रहेगा” | इस्पात कारखाना लगाने वाले जमेशद जी के नाम से जमेशदपुर बसा है | जब जे.आर.डी. वहा पहुचे तो यह एक विशाल नगर बस चूका था | उनके वहा जाने से एक वर्ष पूर्व गांधीजी वहा गये थे | उनके स्वागत के लिए जमेशदपुर की सडको पर फूलो की पंखुड़िया बिखेर दी गयी थी | जिन दिनों जे.आर.डी. जमशेदपुर में इस्पात कारखाने के विभिन्न विभागों के काम का प्रशिक्षण ले रहे थे उन्ही दिनों उनके पिता आर.डी.की फ़्रांस में मृत्यु हो गयी | जे.आर.डी. अंतिम समय वहा न पहुच सके |

पिता के देहांत के समय कम्पनी पर काफी कर्ज था | इसके साथ ही उन पर चार भाई बहनों की देखभाल का आर्थिक बोझ भी आ पड़ा | अभी तक जिस युवक पर कोई दायित्व न रहा था अचानक सब कुछ बदल जाने पर 22 वर्ष की आयु में ही वह एक प्रबुद्ध और अनुभवी व्यक्ति के रूप में बदल गया | जे.आर.डी (J.R.D. Tata) ने ये स्वीकार किया कि मुझे जोखिम उठाना पसंद है | उनका यह स्वभाव इस स्थिति में काम आया और उन्होंने स्थिति को देखते हुए कम्पनी से केवल 750 रूपये प्रतिमास वेतन लेना स्वीकार किया जबकि उनके पिता तीन लाख रूपये प्रतिवर्ष कम्पनी से लेते थे और उनके लिए तीन हजार प्रति माह वेतन निश्चित कर गये थे परन्तु उन्होंने कर्जे को देखकर ऐसा नही किया |

15 दिसम्बर 1930 को जे.आर.डी. ने थेली नामक एक सुंदर लडकी से शादी की | 34 वर्ष की आयु में जे.आर.डी. को टाटा संस का अध्यक्ष बना दिया गया – उस समय सर दोराब और नौरोजी टाटा की मृत्यु हो चुकी थी | पहले पहले विमानों में उड़ना न तो इतना सुरक्षित था और न लोगो में सुरक्षा की दृष्टि से उनमे आस्था थी परन्तु जब 1920 में लिंडबर्ग और किंग्सफोर्ड स्मिथ ने विमान में उड़ान भरकर अटलांटिक महासागर को पार किया तो विमानों में यात्रियों को लाने ले जाने की सम्भावनाये पैदा हुयी | जे.आर.डी की विमान चालन में रूचि बचपन से ही थी | उन्होंने जिस व्यक्ति से विमान चलाने का प्रशिक्षण लिया वह वास्तव में विमान चलाने का प्रशिक्षक नही था |

जे.आर.डी. (J.R.D. Tata) ने विमान द्वारा करतब दिखाना भी सीखा | विमान चलाने का लाइसेंस मिल जाने के तीन महीने के भीतर ही उन्होंने लन्दन में एक विमान खरीद लिया | 19 नवम्बर 1929 को आगा खा ने 500 पौण्ड का पुरुस्कार उस व्यक्ति को देने की घोषणा की कि जो व्यक्ति पहली बार अकेला भारत से इंग्लैंड या इंग्लैंड से भारत एक विमान उडाएगा | तीन व्यक्ति इसके लिए तैयार हुए – एक मनमोहन सिंह , दुसरे थे 18 वर्षीय एस.जी.इंजिनियर और तीसरे थे जे.आर.डी.टाटा |

टाटा ने 3 मई 1930 को करांची से उड़ान भरी और विजय प्राप्त की | उनका कहना था कि विमान चालक में तुंरत निर्णय लेने की योग्यता होनी चाहिए ,उसके हाथ घुड़सवार की तरह स्थिर होने चाहिए | सही निर्णय के साथ उसका स्वभाव संयत होना चाहिए | सम्भवत: इन्ही गुणों के कारण उन्हें के विशाल औद्योगिक उपक्रम में प्रबंध चलाने में सहायता मिली | जे.आर.डी. ने पायलट का लाइसेंस लेने के एक वर्ष बाद विश्व की के महान विमान सेवा की नींव रखी जो पहले टाटा एयरलाइन्स और बाद में एयर इंडिया इंटरनेशनल कहलाई |

पहली विमान सेवा डाक ले जाने के रूप में 15 अक्टूबर 1932 को करांची से आरम्भ हुयी | विमान स्वयं जे.आर.डी. ने उड़ाया | जे.आर.डी. उन दिनों को याद करते हुए कहते है “उन दिनों हमे बड़े साहस से काम लेना पड़ता था | विमान में और भूमि पर ऐसे उपकरण नही थे जिनसे रास्ता ढूंढने में सहायता मिल सके | विमान में रेडियो भी नही था और सच्चाई यह है कि बम्बई में हवाई अड्डा भी नही था | हम जुहू के मैदान में हवाई जहाज उतारते थे जिसके आगे समुद्र था जब समुद्र में ज्वार आता था तो हवाई जहाज पानी में डूब जाता था इसलिए हमे पूना में हवाई अड्डा बनाना पड़ा” |

टाटा एयरलाइन्स का आरम्भ 1933 में हुआ जिसमे यात्रियों को लाने ले जाने का काम प्रारम्भ हुआ हालंकि डाक लाने ले जाने में आमदनी बहुत कम होती थी परन्तु रात्रि सेवा आरम्भ होने के बाद इसमें वृद्धि हुयी | आरम्भ में आय कम होने के कारण जे.आर.डी. अपना अधिक समय विमान सेवा में देते थे जबकि उनकी अन्य कम्पनिया अधिक मुनाफा दे सकती थी परन्तु वे भविष्य की बात सोचते थे और उनका कहना था कि विमानों में परिचारकाये उन्होंने ही सबसे पहले रखी .दुसरी कम्पनियों में परिचारक होते थे |

एयर इंडिया का आरम्भ 1948 में हुआ | जे.आर.डी. इसके अध्यक्ष थे | उसके बाद विमान सेवाओं में बहुत विस्तार हुआ | जे.आर.डी. को तीन बार टाटा एंड संस का अध्यक्ष चुना गया | पहले पहल जब 1938 में अध्यक्ष बनाया गया तो कम्पनियों की परम्परा यह थी कि ऊँचे पदों के लिए वरिष्ट व्यक्तियों को ही चुना जाता था | उस समय तक टाटा उद्योगों में इस्पात ,विमान सेवाए ,बिजली उत्पादन ,बीमा कम्पनी ,सीमेंट ,तेल साबुन और कपड़ा उद्योग शामिल हो चुके थे |

जे.आर.डी. (J.R.D. Tata) का विचार था कि टाटा को वह काम करना चाहिए जिसमे देश का हित हो इसलिए उन्होंने कभी इस बात की ओर ध्यान नही दिया कि जिस उत्पादन में कम्पनी को अधिक लाभ हो उसी की ओर अधिक ध्यान लगाया जाए वरन उनका कहना था कि जिस उत्पादन की भारत को अधिक आवश्यकता है उधर ध्यान देना चाहिए | जे.आर.डी. अमेरिका के इस्पात उद्योग में शिरोमणि एंड्रयू कारगेनी की तरह सोचते रहे कि जिस क्यक्ति के पास धन है उसे सीधे साधे ढंग से बिना दिखावे के रहना चाहिए |

कारगेनी का कहना था कि धनी व्यक्ति को अपनी कमाई लोगो में बाँटनी चाहिए | उनका काम करना का ढंग यह था कि वे एक बार निर्णय लेने पर काम पूरा करने का दायित्व दुसरो पर छोड़ देते थे तब तक किसी प्रकार का दखल नही देते थे जब तक कि वह भूल न करने लगे | उनका यह प्रयत्न रहता था कि सभी उत्पादनों का स्तर सही रखा जाए | जे.आर.डी. यथावसर विनोद करने से भी नही चुकते थे |

जनवरी 1944 में भारत के आर्थिक विकास की योजना के नाम से एक दस्तावेज प्रकाशित हुआ | इस पर पांच  प्रमुख उद्योगपतियों और तीन तकनीकी विशेषज्ञो के हस्ताक्षर थे | उद्योगपतियों में जे.आर.डी.टाटा , घनशयामदास बिडला ,अहमदाबाद की कपड़ा मिलो के कस्तूरभाई लालभाई ,बम्बई के पुरुषोत्तम दास-ठाकुर दास और दिल्ली के श्रीराम थे | इस योजना को टाटा-बिडला अथवा बम्बई योजना के नाम से जना जाता है | इस योजना का प्रभाव यह हुआ कि वायसराय की कार्यकारिणी ने योजना विभाग का कार्य देखने के लिए सर आर्देशर को सदस्य बना लिया |

इस योजना के संबध में जे.आर.डी. (J.R.D. Tata) का यह कहना था कि परिवार नियोजन के सम्बन्ध में इस पर विशेष ध्यान नही दिया गया | इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वे भारत के भविष्य के प्रति कितने चिंतित थे | उसके बाद जे.आर.डी. तथा कुछ अन्य व्यक्ति विदेशो के भ्रमण के लिए निकले | इस शिष्टमंडल में जे.आर.डी. प्रमुख सदस्य के रूप में भाग ले रहे थे | द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो चूका था | सबसे पहले शिष्टमंडल जर्मनी पहुचा | जर्मनी स्थित अंग्रेज अफसर ने शिष्टमंडल से पूछा “अप क्या देखना चाहते है ?”

जे.आर.डी. (J.R.D. Tata) ने कहा “मै हवाई जहाज से जर्मनी में हुए युद्ध विनाश को देखना चाहता हु जिससे हमारा देश भारत बच गया” | अफसर को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ परन्तु शिष्टमडंल के लिए विमान प्रबंध कर दिया गया | इस प्रकार स्पष्ट है कि जे.आर.डी जो भी कार्य करते थे उनके विचारों में देश की भलाई सर्वोपरि रहती थी | 1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो जे.आर.डी. ने टाटा संघठन के सारे संसाधन सरकार को पेश करने की योजना रखी थी |

चीन से युद्ध के तीन वर्ष बाद पाकिस्तान से लड़ाई छिड़ने पर जे.आर.डी. ने देश के उद्योगपतियों की ओर से फिर सब प्रकार का सहयोग देने का प्रस्ताव रखा था | इस प्रकार देश पर कोई भी संकट आया , जे.आर.डी उसके समाधान में सहयोग करने के लिए तैयार रहे | उन्होंने जवाहरलाल नेहरु , लालबहादुर शास्त्री ,इंदिरा जी और राजीव गांधी अदि सभी के साथ सहयोग किया और नेहरु परिवार के साथ तो उनके घनिष्ट सम्बन्ध रहे |

नेहरु परिवार के साथ मित्रता का एक विशेष कारण यह था कि नेहरु जी और जे.आर.डी दोनों आधुनिक विचारो और मशीनों में विश्वास रखने वाले और विज्ञान के पुजारी थे | गांधीजी की अपेक्षा नेहरु के विचारो से उनका साम्य अधिक  था और मित्रता भी | भारत के विभाजन के बाद जिस समय लाखो शरणार्थी भारत आने लगे तो जे.आर.डी. ने नेहरु जी को सुझाव दिया था कि ऐसी राष्ट्रीय विपत्तियों का मुकाबला और जनता की सहायता करने के लिए प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कोष की स्थापना की जाए |

कोई भी व्यकित हो अपने जीवन के अंतिम दिनों में कुछ विभिन्न प्रकार के विचार रखने लगता है परन्तु जे.आर.डी को परलोक के संबध में कोई विश्वास नही था | उनका कहना था कि भारतीय होने के नाते मुझे इस बात का गर्व है कि मै पारसी हु | यह बात अलग है कि वे पारसी धर्म की कुछ बातो और रीती रिवाजो से पुरी तरह सहमत नही थे | इसके साथ ही वे धर्म के उस रूप में भी विश्वास नही रखते थे जिसका निर्माणधर्म के पुरोहितो ने किया है | इसके विपरीत वे यह मानते थे कि यही धर्म शताब्दियों तक भारतीयों की फुट और पिछड़ेपन के लिए जिम्मेवार रहा है |

1970 के दशक में उनका अरविं आश्रम के प्रति स्नेह बढने लगा परन्तु वे किसी भी धार्मिक सभा बुलाने पर यह कहा करते थे कि मै इश्वर की भक्ति अथवा उसका ध्यान करने की बजाय कठोर परिश्रम में अधिक विश्वास करता हु | उनका शरीर वृद्धावस्था से दुर्बल हो रहा था परन्तु उत्साह पहले से कही अधिक था | जे.आर.डी. टाटा (J.R.D. Tata) प्रतिवर्ष अवकाश बिताने के लिए स्विटजरलैंड जाया करते थे | 1993 में भी वे वहा आराम करने गये थे परन्तु 30 नवम्बर के दिन आयुभर भाग्य से लड़ने वाल वह कर्मठ सेनापति सदैव के लिए गहरी निद्रा में सो गया | उनकी मृत्यु को राष्ट्रीय शोक दिवस के रूप में सारे भारत में मनाया गया | भारत रत्न जे.आर.डी (J.R.D. Tata) का नाम उनके कार्यो के कारण भारत के इतिहास में लौह अक्षरों में अंकित रहेगा |

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