पंडित जवाहरलाल नेहरु की जीवनी | Jawaharlal Nehru Biography in Hindi

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Jawaharlal Nehru Biography in Hindi
Jawaharlal Nehru Biography in Hindi

जवाहरलाल (Jawaharlal Nehru) देश की आत्मा थे | उन्होंने कहा था “मुझे मेरे देश की जनता ने , मेरे हिन्दुस्तानी भाइयो और बहनों ने , इतना प्रेम और इतनी मुहब्बत दी है कि चाहे मै जितना कुछ करू वह उसके छोटे से हिस्से का बदला नही हो सकता | सच तो यह है कि इसके बदले कुछ देना नुमकिन नही है | इस दुनिया में बहुत से लोग , जिनको अच्छा समझकर , बड़ा मानकर , उनका आदर किया गया , पूजा गया लेकिन भारत के लोगो ने , छोटे से बड़े , अमीर और गरीब , सब तबको के बहनों और भाइयो ने मुझे जितना प्यार दिया उसका बयान करना मेरे लिए मुश्किल है और जिससे मै दब गया हु “|

इस बात से पता चलता है कि जिसने यह बात कही है वह कितना बड़ा होगा | इतना प्रेम संसार के इतिहास में शायद ही बहुत थोड़े लोगो को जनता से मिला हो | यह बात जवाहरलाल ने कही है | इसमें संदेह नही कि वह संसार की जनसंख्या के सातवे हिस्से की जनता के दिलो पर लगभग आधी शताब्दी तक छाए रहे या यों कहे कि उसमे बेताज बादशाह बने रहे | भारत के स्वाधीनता संग्राम के समय सम्भवत: सबसे अधिक ऐसे व्यक्तियों ने जन्म लिया जो वास्तव में महान थे जैसे गांधीजी |

गांधीजी का जीवन भारतीय इतिहास का ऐसा भाग है जो उससे अलग ही नही सकता | इसी तरह नेहरु (Jawaharlal Nehru) का जीवन ,विशेष रूप से स्वाधीनता प्राप्ति के बाद का काल ऐसा है जो किसी के चाहने पर भी भारतीय इतिहास से पृथक हो ही नही सकता | वह जीवन इतना व्यापक है कि चांदनी रात और छोर हीन चन्दोबे की तरह भारतीय आकाश पर छाया हुआ है | किसी का निजी जीवन हो तो उसका जीवन वृत दस-पांच पन्नो में संक्षेप में दिया जा सकता है परन्तु जवाहरलाल जी की पत्नी कमला का देहांत हो जाने के बाद उनका अपना तो कुछ रहा ही नही , जो कुछ था वह सब जनता का था और जनता का ही इतिहास या जीवन हो सकता है उससे कम क्या हो सकता है |

जवाहरलाल जी (Jawaharlal Nehru) का कहना था कि उनके पिता मोतीलाल नेहरु मजहबी आदमी नही हते | उन्हें बहुत से पुराने रिवाज पसंद नही थे | उन्होंने उन्हें तोड़ा और बिरादरी से निकाल दिए गये | उन्हें पढने लिखने की बजाय खेलकूद का बहुत शौक था पर वह पढाई में होशियार थे | एक बार वो बी.ए. की परीक्षा में बैठे | पहला पर्चा दिया पर समझा कि अच्छा नही हुआ इसलिए बाकी पर्चे किये ही नही और ताजमहल की सैर करने चले गये | वह पर्चा ठीक हुआ था इसलिए अन्य पर्चो में न बैठने के लिए अध्यापक उन पर बिगड़ा |

ऐसे विद्रोही पिता के घर जवाहरलाल (Jawaharlal Nehru) का जन्म 14 नवम्बर 1889 को हुआ था | हर अच्छा बेटा अपने माता-पिता का आदर करता है | नेहरु जी ने अपने पिता के बारे में कहा है “वह इरादे के बड़े पक्के आदमी थे | मै उनकी बहुत इज्जत करता हु | मै उन्हें बल ,साहस और होशियारी की मूर्ति समझता हु | दुसरो के मुकाबले उन्हें बहुत ही बढ़ा चढ़ा पाटा था | मै अपने दिल के मंसूबे को बाँधा करता था कि बड़ा होने पर पिताजी की तरह होऊंगा”|

जवाहरलाल जी (Jawaharlal Nehru) के चाचा नन्दलाल जी की तरह मोतीलाल जी की वकालत भी खूब चमकी | उन्होंने खूब पैसा कमाया और खूब शान से रहने लगे | इलाहबाद में के बड़ी कोठी खरीदी और उसे नये सिरे से बनवाया | सारा परिवार उसमे रहने लगा | उसका नाम है आनन्द भवन | इलाहाबाद का नाम हमारे देश हमारे देश के सभी आदमी जानते है क्योंकि यहाँ देश की तीन नदियाँ मिलती है उनका संगम होता है | यह दृश्य जवाहरलाल नेहरु (Jawaharlal Nehru) जीवन भर नही भूले | नेहरु जी ने लिखा है “जहा मैंने बचपन बिताया , वहा हमेशा से ही मैंने गंगा को देखा | मेरे दिल में गंगा के लिए हमेशा मुहब्बत रही है “|

बालक जवाहरलाल (Jawaharlal Nehru) ग्यारह वर्ष की आयु तक इकलौते रहे | दुसरी दो बहने स्वरूप (विजयलक्ष्मी) और कृष्णा बाद में पैदा हुयी | इतने दिनों माँ-बाप का सारा दुलार जवाहर को ही मिला | शाम के वक्त बहुत से मित्र जवाहर के पिता से मिलने आते थे | वे लोग खूब गप्पे हांकते , खूब हंसते घर हंसी से भर देते थे | पिताजी खूब हंसते , उनकी हंसी एक मशहूर बात हो गयी थी | बालक जवाहर पर्दे की ओंट से उन्हें झांकते थे | यह जानने की कोशिश करते थे कि ये बड़े लोग क्या बाते करते है |

मोतीलाल जी कभी कभी गुस्सा भी बहुत जल्दी हो जाते थे | एक बार जवाहरलाल जी की पिटाई हो गयी | बाद में शरीर पर क्रीम और मरहम लगाये गये | जवाहर जी के जीवन में पन्द्रहवी बहार आयी तो दिल में अंग्रेजी रहन सहन के प्रति आकर्षण पैदा हुआ | अब तक जवाहरलाल की पढाई घर पर ही हुयी थी | पहले अंग्रेज दाईया रखी गयी | वे उन्हें उठना-बैठना सिखाती और घुमाती | बाद में दुसरे अध्यापक आये | दस वर्ष की उम्र में ब्रुक्स नाम के अंग्रेज उन्हें पढ़ाने के लिए रखे गये | वह अंग्रेजी पढाते |

एक पंडित जी संस्कृत पढ़ते थे | पिताजी के मुंशी मुबारक अली से बालक जवाहर घंटो कहानिया सुनता | मुंशी जी गदर की कहानिया सुनाते थे | घर की बड़ी औरते रामायण ,महाभारत और पुराणों की कहानिया सुनाती थी | उन दिनों जवाहर के दिल में नई उमंग और विचार उठने लगे थे | इन दिनों वह अखबार भी पढने लगे थे | चचेरे भाइयो की बाते भी सुनते | अफ्रीका के कुछ लोगो ने आजाद होने का यत्न किया , उन्होंने आजादी की लड़ाई शुरू की | खबरे अखबारों में छपने लगी |

जवाहर लाल (Jawaharlal Nehru) ने सोचा , हम लोग अंग्रेजो के खिलाफ क्यों नही लड़ते ? क्यों नही अपने देश को आजाद करवाते ? क्यों नही उनको यहा से भगा देते ? किशोर जवाहर सोचता “मै भी अपने देश को आजाद करवाऊंगा मै भी अपने देश को अंग्रेजो के अत्याचारों से छुट्टी दिलवाऊंगा” नेहरु जी का कहना था कि मुझे सदा इन्कलाब में दिलचस्पी रही है | उनके दिल में देश को आजाद करवाने के विचार पनपे | वह बहादुरी की बड़ी बड़ी बाते सोचते | इन्ही दिनों जवाहरलाल अपने पिताजी के साथ इंग्लैंड गये | माताजी और बहन स्वरूप भी साथ थी |

मई 1905 को वे लोग लन्दन पहुचे | मोतीलाल जी ने लन्दन का प्रसिद्ध हेरो स्कूल देखा | स्कूल पसंद आया | वह अपने जवाहर को ऐसे विद्यालय में पढाना चाहते थे सो उन्हें वहा पढने के लिए भर्ती करवा दिया | परिवार के लोग यूरोप घुमने चले गये | वहा से वे भारत लौट आये | जवाहरलाल को अकेलापन महसूस होने लगा | सब आदमी नये थे घर की याद आती थी | माँ-बाप का प्यार याद आता था पर कुछ दिन बाद स्कूल में ओर खेलो में मन लगने लगा | नये साथियों से भी जान पहचान हो गयी |

दप साल बाद इंग्लैंड के प्रसिद्ध कैम्ब्रिज कॉलेज में पढने लगे | यहा आकर उन्हें प्रसन्नता हुयी | कैम्ब्रिज में तीन साल रहे | कैम्ब्रिज की शिक्षा पुरी करके बैरिस्टर बनने के लिए वह कानून पढने लगे | दो वर्ष कानून पढ़ा और बैरिस्टर बनकर भारत आये | हिंदुस्तान में आने के बाद उनका मन कुछ उखड़ा सा रहता | बकालत शुरू की पर अदालत , क्लब ,दोस्त और प्रतिदिन के कामो में मन न लगता | उस समय तिलक आदि जोशीले गरम दल के नेता जेलों में बंद थे | जवाहर चाहते थे कि देश की आजादी का काम ओर तेजी से चले |

जवाहरलाल (Jawaharlal Nehru) 1916 में पहली बार गांधीजी से मिले | वह गांधी जी के कामो के बारे में पहले ही पढ़ और सुन चुके थे और उनकी तारीफ़ करते थे | इसके बाद तो अंग्रेजो ने नये नये कानून बनाये जो देश को अपमानित करने वाले थे जिनके खिलाफ नेताओ ने अपन विरोध प्रकट किया | उस तरह आजादी की लड़ाई तेज होती गयी और लोगो को जेल में ठूसा जाने लगा |जल्द ही हम आपको नेहरु की की राजनीति में प्रवेश लेने से लेकर उनके प्रधानमंत्री बनने तक के सफर के बारे में ब्तायंगे |

1916 में नेहरु जी का विवाह दिल्ली में कमला जी से बहुत ही धूमधाम से हुआ | उस समय सारा परिवार राजनीति में हिस्सा ले रहा था और कमला जी का स्वास्थ्य ठीक न रहता था पर नेहरु जी गांधीजी की आदेशो के अनुसार आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेते रहे | कई बार जेल गये – बरसों जेल में बिताये | आजादी की लड़ाई के इन लम्बे सालो में नेहरु जी , दुसरे नेताओं ने बल्कि यों कहिये कि देश की जनता ने अनेक कष्ट सहे  मारे सही , जुल्म सहे और आखिर वह दिन आया जब देश आजाद हुआ |

देश की आजादी के घोषणा सन 1929 की लाहौर कांग्रेस में 26 जनवरी को की गयी थी | नेहरु जी इस अधिवेशन के अध्यक्ष थे | गांधीजी की देश की आजादी की लड़ाई के प्राण थे तो जवाहर उसकी आशा | गुरुदेव रविन्द कहा करते थे “जवाहर लाल साहसी है | वह अपनी बात के पक्के है वह घबराते नही | दृढ़ निश्चय करके उसे बदलते नही | वह सबके प्यारे बनेंगे | वह देश के सबसे बड़े नेता बनेंगे”| गांधीजी कहा करते थे “मेरे मरने के बाद जवाहरलाल मेरा काम सम्भालेंगे मेरे असली वारिस होंगे”|

आजादी के बाद देश की बागडोर उनके हाथो में रही | उन्होंने देश में लोकतंत्र की नींव रखी , उसे दृढ़ बनाया | उन्होंने साम्प्रदायिकता को दूर करने के लिए राजनीति से धर्म को अलग किया | संसार के झगड़ो को दूर करने के लिए यत्न किये और किसी गुट में शामिल नही हुए | अंतर्राष्ट्रीय संबंधो में उन्होंने “पंचशील” की निति का प्रचार किया | नेहरु जी ने अपनी जीवनी में लिखा “जीवन के बड़े बड़े पुरुस्कार निराशा ,कठोर व्यवहार और जुदाई के बाद ही मिलते है “|

ठीक है कठिनाइयो के बाद आजादी मिली पर हमे इसकी रक्षा के लिएओर कई मुसीबते उठानी पड़ी | बेशक आजादी अनेक कष्टो के बाद मिली | अंग्रेजो के कारण अनेक कष्ट सहने पड़े परन्तु फिर भी उन्हें अंग्रेजो से शत्रुता नही थी | विश्व विख्यात दार्शनिक  बार्टन्द रसेल ने लिखा है “यह बड़े आश्चर्य की बात है कि आजादी के बाद नेहरु जी के दिल में उस राष्ट्र के प्रति रत्ती भर भी द्वेष और कडुवाहट नही थी जिसने उनके देश को गुलाम बनाकर रखा था और उन्हें कैद किया था “|

नेहरु जी देश को आजाद कराने के बाद भी चैन से नही बैठे क्योंकि देश को उंचा लाने का सबसे बड़ा काम तो अभी बाकी था | इस काम को उन्होंने सच्ची लगन और दूरदर्शिता से किया | देश की सबसे बड़ी समस्या गरीबी उनके सामने थी | इसके हल के लिए और देश को संवारने के लिए पंचवर्षीय योजनाये बनाई गयी | इससे भारत में नये युग का पदार्पण हुआ | नेहरु जी ने इस काम में देश का मार्गदर्शन किया | नये नये कारखाने , बड़े-बड़े पन-बिजलीघर , बाँध और सार्वजनिक विकास की योजनाये बनी | नेहरु ही ने इस काम में कड़ी मेहनत की |नेहरु जी के प्रसिद्ध लेखक और विचारक भी थे | उनकी चर्चित पुस्तके है “विश्व इतिहास की झलक” “भारत की खोज” “पिता के पत्र पुत्री के नाम”| नेहरु जी विश्व शान्ति के पक्षधर थे | 1962 में कम्युनिस्ट चीन जैसे मित्र देश द्वारा भारत पर अप्रत्याक्षित आक्रमण से उनको बहुत दुःख पहुचा |

आजादी के आबाद 20-22 वर्षो में नेहरु जी जनता के दिलो के ओर करीब हो गये , वह सबके प्यारे बन गये परन्तु 27 मई 1964 को जुदाई की दुखड घड़ी आई और नेहरु जी सारे राष्ट्र को अकेला छोडकर स्वर्ग सिधार गये | भारतवासी उनके निधन के बाद भी उन्हें नही भूले | उनसे लोगो ने कितनी मुहब्बत की ,इसका जिक्र करते हुए उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा है “मुझे मेरे देश की जनता ने , मेरे हिन्दुस्तानी भाइयो और बहनों ने इतना प्रेम और मुहब्बत दी है  चाहे जितना कुछ करू वो उनके छोटे से हिस्से का बदला नही हो सकता सच तो यह है कि प्रेम इतनी कीमती चीज है कि इसके बदले कुछ देना नुमकिन नही “|

उन्हें  इस देश के लोगो से ही नही बल्कि इस देश की पवित्र मिटटी और गंगा-यमुना से भी प्यार था | तभी तो वसीयत में नेहरु जी ने इच्छा प्रकट करते हुए लिखा था “जब मै मर जाऊ तो मेरी अस्थियाँ इलाहाबाद भेज दी जाए | इनमे से मुट्ठी भर गंगा में डाल दी जाए | इसके पीछे मेरी कोई धार्मिक भावना नही है | मुझे बचपन से गंगा और यमुना से लगाव रहा है और जैसे जैसे बड़ा हुआ , यह लगाव बढ़ता गया | मेरी भस्म के बाकी हिस्से का क्या किया जाए , मै चाहता हु उसे हवाई जहाज में उंचाई पे ले जाकर बिखेर दिया जाए , उन खेतो पर , जहा भारत के किसान मेहनत करते है ताकि वह भारत की मिटटी में मिल जाए और उसी का अंग बन जाए”|

आज भारत और नेहरु दो अलग चीज नही , उन्हें कौन पृथक कर सकता है ? वह घुल मिलकर एकाकार हो गये है | भारत के इस अमूल्य रत्न को सन 1955 में “भारत-रत्न” से विभूषित करना वस्तुत: इस अलंकार को ही शोभा बढाना था | जिस व्यक्ति के हाथो में 18 वर्ष प्रधानमंत्री के रूप में देश की बागडोर रही , जिसने इस प्राचीन देश को नया रूप दिया , नये कामो की नींव डाली और नीतियों को नई दिशा दी वह व्यक्ति भारत रत्न तो था ही परन्तु जिसने संसार भर से तनाव दूर करने के लिए अपनी सारी शक्ति लगा दी , क्या वह एक देश की सीमाओ से बंधा रह सकता है ? वस्तुत: वह तो विश्व-वंध्य और विश्व रत्न है |

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