बुद्धकाल के चिकित्सक जीवक की जीवनी | Jivaka Komarabhacca Biography in Hindi

0
158
बुद्धकाल के चिकित्सक जीवक की जीवनी | Jivaka Komarabhacca Biography in Hindi
बुद्धकाल के चिकित्सक जीवक की जीवनी | Jivaka Komarabhacca Biography in Hindi

प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति की परम्परा को जीवंत बनाते हुए उसके विकास का कार्य करने वाले प्रमुख चिकित्सको में जीवक का नाम विशेष रूप से ख्याति प्राप्त है | जीवक (Jivaka) ने अपनी असाधारण प्रतिभा से न केवल रोगों के लक्षणों की खोज की वरन कई कठिन दुसाध्य रोगों का भी उपचार किया |

जीवन (Jivaka) महात्मा बुद्ध के समकालीन थे |उन्होंने महात्मा बुद्ध के साथ साथ उनके शिष्यों का उपचार भी किया था | उनके जन्म के संबध में जो अनुश्रुति है वह कुछ ऐसी है कि वैशाली की नगरवधु आम्रपाली की तरह सालवती नामक गणिका थी | राजकुमारों के साथ अभिसार के बाद जब वह गर्भवती हो गयी तो उसने लोगो से मिलना-जुलना छोडकर निश्चित समय के बाद एक पुत्र को जन्म दिया | अपने व्व्यसायिक लाभ के लिए उसने पुत्र को त्यागने का निश्चय किया |

अपनी एक दासी को बुलाकर उसे एक कूड़े के ढेर पर फिकवा दिया |ऐसे में राजा बिम्बिसार के पुत्र अभय की जब उस पर दृष्टि पड़ी तो उसने देखा कि कौओं का एक दल उस बालक को नोंचने में लगा हुआ है | राजकुमार की आज्ञा पाकर सेवको ने उसे महल पहुचा दिया | वह बालक इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहा , यह एक आश्चर्य का विषय था | राजकुमार अभय के लालन-पालन में वह बालक बड़ा हुआ और उसका नाम रखा गया था जीवक |

राजकुमार के यहा पालित-पोषित होने के कारण उसे कौमारभृत्य जीवक कहा जाने लगा | जीवक ने बड़े होने पर तक्षशिला जाकर आयुर्वेद पढने की इच्छा जाहिर के | तक्षशिला विश्वविद्यालय में कठोर परिश्रम ,सतत अध्ययन तथा लगन शीलता के द्वारा जीवक के श्रेष्ठ वैद्यक की उपाधि ग्रहण की | उनके गुरु प्रसिद्ध वैद्यराज आत्रेय तथा पुनर्वसु थे | ऐसा कहा जाता है कि वैद्यक की उपाधि ग्रहण करने के बाद उनकी प्रवीणता की परीक्षा लेने के ध्येय से उनके गुरु ने जीवक से कहा “तक्षशिला विश्वविद्यालय की योजन-भर भूमि से तुम ऐसी वनस्पतिया उखाड़ लाओ ,जो किसी उपयोग की ना हो ”

जीवक (Jivaka) ने पुरी इमानदारी से तक्षशिला की योजन-भर भूमि से लगी हुयी वनस्पतिया छान मारी उन्हें कोई वनस्पति व्यर्थ नही लगी | सभी वनस्पतिया किसी न किसी रोग के काम आने वाली थी | इस तरह जीवक ने चिकित्सा शास्त्र में प्रवीणता हासिल कर ली | आचार्य ने उन्हें शिक्षा पूर्ण करने को कहा |

जीवक (Jivaka) ने आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्दति को नया रूप प्रदान किया |सर्वप्रथम जब वे सरयू नदी के तट पर पहुचे तो वहा के कुछ प्रसिद्ध चिकित्सको में से उनकी भेंट देवदत्त से हुयी | देवदत्त ने उन्हें एक नगर सेठ की ऐसी पत्नी का उपचार करने की चुनौती दी ,जिसके सिर में भयानक दर्द रहा करता था | उसने यह सोच लिया था कि यह दर्द तो उसकी मृत्यु के साथ ही जाएगा | युवा जीवक सेठ की पत्नी के पास उपचार हेतु पहुचे तो उनकी अवस्था देखकर पत्नी ने अनुभवहीन समझकर उनसे उपचार  करने से मना कर दिया किन्तु जीवक ने विन्रमतापूर्वक उन्हें उपचार हेतु तैयार किया

गाय के पुराने घी से बनी हुयी औषधि उन्होंने सेठ पत्नी के नाक में जैसे ही डाली वैसे ही मुंह से निकलती हुयी उस औषधि से सेठ पत्नी के सात साल पुराने रोग को समाप्त कर दिया | स्वस्थ होने पे न केवल अयोध्या के वैद्यो वरन सेठ पत्नी ने भी उन्हें सम्मानित किया | नगर सेठ ने जीवकजी को इस हेतु बहुत सी स्वर्ण मुदाये तथा यात्रा हेतु घोड़ाघाडी भी दी |धन प्राप्त कर वे राजकुमार अभय के राजमहल में ही रहने लगे | पास में ही उन्होंने एक घर बनवा लिया

उस समय राजा बिम्बिसार भगन्दर की बीमारी से ग्रसित थे | उनके गुदाद्वार के पास फोड़ा हो गया था जिससे इतना अधिक रक्त बहता था कि उनकी धोती भीग जाती थी | वे सभी के उपहास का केंद्र बन गये थे | हारकर उन्होंने जीवकजी से अपना उपचार करवाया | जीवक ने उनके जख्म पर जो लेप लगाया था उससे कुछ ही समय में उनकी बीमारी जाती रही |इसी तरह उन्होंने राजगृह के एक सेठ की उन्होंने शल्यक्रिया की | एक रोगी के पेट की उलझी हुयी गांठो को खोलकर सिलाई क्र औषधि लेपन से स्वस्थ कर दिया |

राजगृह के एक सेठ का उपचार करते हुए जीवक उनके मस्तिष्क की शल्यक्रिया भी की | जीवक ने उसे सात महीने तक एक करवट ,फिर सात महीने दुसरी करवट लेकर सोने की शर्त रखी | शल्यक्रिया करते हुए उन्होंने सेठ को चारपाई से मजबूत बांधकर उनके कपाल को चीरकर दो जन्तु निकाले | कपाल की चमड़ी को पुन; सी दी गयी | सात दिन गुजरने पर सेठ छठपठाने लगा | इस पर जीवन ने कहा दुसरी करवट लो“”| बमुश्किल सेठ ने सात दिन इस तरह लेटकर गुजारे | जीवन ने सात महीने की बात इसलिए की थी ताकि वे मानसिक रूप से उसकी मजबूती देखना चाहते थे | उनके उपचार की यह पद्दति मनोवैज्ञानिक थी |सेठ पूर्णत: स्वस्थ हो गये |

जीवक (Jivaka) का नाम प्राचीन भारतीय शल्यचिकित्सको में सर्वप्रमुख ररहेगा | कई असाध्य तथा जटिल रोगों की चिकित्सा करके उन्होंने चुनौतियों को भी स्वीकार | उनकी चिकित्सा पद्दति ने देश में ही नही अपितु चीन ,लंका आदि देशो में भी प्रसिद्धि अर्जित की | प्राचीन भारतीय श्रेष्ठ चिकित्सको में जीवक का नाम सदा अमर रहेगा |

BiographyHindi.com के जरिये प्रसिद्ध लोगो की रोचक और प्रेरणादायक कहानियों को हम आप तक अपनी मातृभाषा हिंदी में पहुचाने का प्रयास कर रहे है | इस ब्लॉग के माध्यम से हम ना केवल भारत बल्कि विश्व के प्रेरणादायक व्यक्तियों की जीवनी से भी आपको रुबुरु करवा रहे है

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here