Johannes Kepler Biography in Hindi | जॉन केप्लर की जीवनी

Johannes Kepler Biography in Hindi

आजकल यह रीती हो गयी है की जीवन में बच्चो की असफलता के लिए लोग उनके माता पिता ने उसे ठीक शिक्षा नही दी | इस सिद्धांत के आधार पर जॉन केप्लर को बहुत बुरा होना चाहिए था क्योंकि उसके माता-पिता बहुत खराब थे | उसके पिता हेनरी बहुत भाग्यशाली सिपाही थे जो अपने सर्वाधीपति उर्तमबर्ग के ड्यूक की सेना में साधारण कर्मचारी था | बाद में अपने पुत्र की परवाह किये बिना वह होलैंड की फ़ौज में भर्ती हो गया | जॉन की माँ केथरीन भी अच्छी माता नहे थी | जॉन केवल तीन वर्ष का था तो वह चेचक से मरते मरते बचा और वह बीमारी से अच्छा हुआ तो मालूम हुआ कि उसकी दृष्टि पर इसका काफी प्रभाव पड़ा है और उसके हाथ भी बड़े कमजोर हो गये है | एक या दो दिन रहकर घर से भाग गयी | वह अपने पति की भांति ही थी | उसमे अपने पुत्र के लिए वह स्नेह न था जो एक माता को अपने पुत्र के लिए होना चाहिए |

अपने बारहवे वर्ष में जॉन एक दुसरी अनिष्टकारी बीमारी से मरते मरते बचा | इसके कारण और चेचक की पहली कमजोरियों से यह निश्चय किया कि उसे व्यापार में लगाना बेकार है विशेषत: ऐसे व्यापार में जिसमे हाथ की कुशलता की आवश्कता था किन्तु वह जर्मन लडको से बहुत अधिक तेज था इससे उसे पाठशाला भेजा जाने लगा | कुछ समय पश्चात उसके पिता सारा धन गंवा कर होलैंड आ गये | आजीविका के लिए उसने सराय खोली और जॉन को , इस कठिन काम में हाथ बंटाने के लिए , पाठशाला से अलग कर दिया | शायद बेचारा लड़का हाथ से अधिक काम न कर सकता था इसलिए उसे पुरोहित बनाने के विचार से फिर स्कूल भेज दिया | समय पर ही वह विद्यार्थियों को याजक-पद के लिए तैयार करने वाले विद्यालय में भर्ती हो गया |

उच्च परीक्षा के फलस्वरूप 17 वर्ष की अवस्था में वह ट्युबिंजन विश्वविद्यालय में जो जर्मनी में था प्रवेश पा गया | वहां पर उसने सबसे पहले कोपरनिकस के बारे में सुना | उसने उस  महान पुरुष की कृतियों का अध्ययन किया और उनसे इतना पुलकित हुआ कि उसने उसके मार्ग का अनुसरण करने का विचार किया इसलिए बड़ी अनिच्छा से उसने पुरोहित बनने का विचार छोडकर गणित-विज्ञान को अपनाया | केप्लर को गणित के प्रदर्शनों में अलौकिक सौन्दर्य की मोहिनी दिखाई पडती थी | उसे कोपरनिकस के गणित में इतना आनन्द आता था जितना कि ओर लोगो को Grand Canyon के डूबते सूर्य के समय देखने में आता था |

गणित में प्रतिभावान होने के कारण केप्लर को ग्रेटज विश्वविद्यालय में उच्च पदस्थ विज्ञान के अध्यापक का स्थान मिल गया जिसकी वृति अल्प थी | जब उसने काम करना प्रारम्भ किया उस समय वह विज्ञान के विषय में बहुत कम जानता था किन्तु इस क्षेत्र में जर्मनी में कुछ ही विद्वान उससे अधिक ज्ञान रखते थे | सोलहवी शताब्दी के प्रांरभ में यूरोप की शिक्षा की दशा बहुत अच्छी थी जिससे इस नवयुवक ने पहला काम प्राचीन ज्योतिष के अध्ययन का किया जैसा कि विद्वानों ने इस विषय में लिखा था विशेषकर यूनानी ज्योतिषी टोलेमी ने | किन्तु केप्लर इस स्थान पर अधिक दिनों तक न रहा | धार्मिक मतभेद के कारण उस विश्वविद्यालय छोड़ना पड़ा | उसने सौरमंडल पर किसी प्रकार से एक पुस्तक लिखी जिसकी प्रतिया गैलिलियो तथा डेनमार्क के ज्योतिषी टायको ब्राहे को भेजी |

टायको ब्राहे प्रथम आधुनिक ज्योतिषी था जिसने ग्रहों की गति के कुछ ठीक आंकड़े लिखे | टायको ने इस नवयुवक खगोलशास्त्री पर विशेष दया दिखाई और उसे प्राग आने के लिए निमंत्रित किया जहां वह सम्राट की सेवा में रहता था | उसने केप्लर को सम्राट से मिलाया और उसकी बड़ी प्रशंशा की | इसके फलस्वरूप यह नवयुवक टायको ब्राहे का सहायक नियुक्त हो गया और उसे राजकीय गणितज्ञ की उपाधि से विभूषित किया गया | केप्लर के लिए यह इश्वरप्रद्दत सहायता थी क्योंकि उस समय उसके पास एक पैसा भी न था और न वह कोई काम कर रहा था किन्तु राजकीय गणितज्ञ की उपाधि उसके वेतन से बड़ी थी | वास्तव में वह अपने जीवन पर्यन्त गरीब रहा | 26 वर्ष की आयु में उसने एक विधवा से विवाह किया जो जायदाद की उत्तराधिकारिणी भी किन्तु इससे उसे कोई आर्थिक लाभ न हुआ क्योंकि उस महिला की संबधियो से सफलतापूर्वक लडकर सब धन उससे दूर ही रखा |

इस बीच में राजकीय गणितज्ञ के रूप में पुन: उसका कार्य फलित-ज्योतिष ही था | उसे सम्राट और ड्यूक बैल्नेस्ताइन के लिए कुंडलिया या भाग्य के लेखे बनाने पड़ते थे | यह ड्यूक 30 वर्ष के युद्ध में , जो बाद में प्रारम्भ हुआ था सेनापति के रूप में संसार में प्रसिद्ध हुआ और भी बहुत से प्रसिद्ध लोग उसके यहाँ इसी फलित ज्योतिष के काम से आते थे | इस प्रकार केप्लर ने अपने वेतन की कमी की पूर्ति व्यक्तिगत कार्यो से होने वाली आय से कर ली | उसका कर्तव्य कर्म फलित ज्योतिष का क्षेत्र था किन्तु उसके वास्तविक कार्य का क्षेत्र खगोलशास्त्र ही था | गैलिलियो ने केप्लर द्वारा प्रेषित उपहार की उसकी प्रथम पुस्तक का बढ़ा स्वागत किया और 1610 में केप्लर को उस इतालियन खगोलशास्त्री के सुप्रसिद्ध दूरदर्शक यंत्र से देखने का प्रोत्साहक विशेषाधिकार प्राप्त हुआ | इस अनुभव ने केप्लर को प्रकाश विज्ञान का गम्भीर अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया , जिसका बहुमूल्य परिणाम निकला |

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