Lord Mahavira Biography in Hindi | भगवान महावीर की जीवनी

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Lord Mahavira Biography in Hindi
Lord Mahavira Biography in Hindi

महावीर (Lord Mahavira) वैशाली के राजा सिद्धार्थ और रानी त्रुश्ला के पुत्र थे | उनका जन्म 599 ईसा पूर्व चैत्र शुक्लपक्ष की 13वी तिथि को वैशाली के कुंडग्राम में हुआ था | बचपन से ही उनकी महानता प्रकट हो गयी थी | अक्सर वे ध्यान में मग्न हो जाते थे | कभी कभी आत्मचिन्तन में लीन होकर बैठे रह जाते थे | राजकुमार के रूप में समृधि के सब साधन उन्हें उपलब्ध थे परन्तु वे विरक्त ही रहते थे | सांसारिक पदार्थो से वे आरम्भिक अवस्था से ही विमुख रहे |

30 वर्ष की उम्र में उन्होंने राजसी ठाट-बाट छोड़ दिया तथा सन्यासी बन गये | आध्यात्मिक खोज में वे 12 साल तक साधू रूप में विचरण करत रहे | 12 वर्ष का समय उन्होंने अधिकतर ध्यान में व्यतीत किया तथा पृथ्वी पर स्थिर हर जीवित प्राणी का सम्मान करते हुए समय बिताया | मनुष्य , पशु , वनस्पतिया कुछ भी हो वे प्रयत्न करत थे कि उन्हें नुकसान न पहुचे | एक स्थिति में आकर तो उन्होंने सांसारिक वस्तुओ के साथ अपने शरीर के कपड़े तक त्याग दिए थे तथा अत्यंत कठोर तपश्चर्या का पालन किया |

महावीर (Lord Mahavira) ने तप करते हुए “इन्द्रियों का संयम” साध लिया | मन-इन्द्रियों का संयम करते हुए अत्यंत साहस तथा वीरता का परिचय दिया अत: वे महावीर कहलाये | यह वह स्वर्णिम काल था उनकी आध्यात्मिक यात्रा का जिसके अंत में उन्होंने परम अवस्था अरिन्ह्त को प्राप्त किया | उनकी कठोर दिनचर्या में हर छोटे से छोटे कार्य में अत्यंत सावधानी रहती थी | चलने , बोलने , खाने-पीने यहाँ तक कि सोचने तक में वे अत्यंत संयम बरतते थे |

काम ,क्रोध अहंकार सब पर विजय पा ली थी उन्होंने | उनका जीवन नितांत शुद्ध एवं पवित्र था जिस पर जगत की कोई भी अशुध्ही अपना दाग नही छोड़ सकती थी | वे नितांत निर्भय थे तथा कोई बाधा उन्हें हरा नही सकती थी | कोई भी आकर्षण उन्हें बाँध नही सकता था | भूख-प्यास नींद सब पर विजय पा ली थी | उनका हृदय जल की तरह पवित्र था | हाथी एवं शेर की तरह शक्तिशाली था | उनका ज्ञान सागर की तरह गहरा था | वे चन्द्रमा की तरह शांत-शीतल तथा सूरज की तरह तेजी से चमकने वाले थे |

12 वर्ष की तपस्या के बाद बैशाख मॉस के शुक्ल पक्ष की दशमी को कैवल्य ज्ञान प्राप्त कर लिया था | कैवल्य ज्ञान वह अहर्त अवस्था है जिसमे व्यक्ति सर्वज्ञ हो जाता है | इस परमज्ञान को पाकर उन्होंने उस ज्ञान का प्रचार-प्रसार शरू किया | महावीर ने पहले से प्रचलित जैन धर्म को जाना समझा और उसमे अपने ज्ञान एवं अनुभव से ओर जोड़ा ,संवारा सुधरा इसलिए वे जैन धर्म के 24वे तथा अंतिम तीर्थंकर थे | जीवन के बाद का समय उन्होंने नंगे पैर घूमते हुए व्यतीत किया तथा जाति एवं मत के भेदों को भुलाकर सबको जैन दर्शन की शिक्षा दी |

महावीर (Lord Mahavira) के अनुसार 8 अंग है धर्म के जो जीवन का उन्नयन कर सकते है | यदि कोई स्वयं को मुक्त करना चाहता है जो उसे सम्यक श्रुद्धा  ,सम्यक ज्ञान तथा सम्यक आचरण का आश्रय लेना चाहिए | सम्यक आचरण के अंतर्गत -अहिंसा , सत्य , ब्रह्माचर्य ,अपरिग्रह आते है | अंतिम लक्ष्य मोक्ष पाने के लिए इनको जीवन में उतारना जरुरी है | महावीर (Lord Mahavira) के अनुयायी साधू ,साध्वी , श्रावक और श्राविकाए थी | 72 वर्ष के उम्र में महावीर ने पावापुरी में दिवाली के दिन निर्वाण प्राप्त किया |

 

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