Master Chandgi Ram Biography in Hindi | मास्टर चन्दगी राम की जीवनी

Master Chandgi Ram Biography in Hindi

Master Chandgi Ram Biography in Hindi

15 मार्च 1938 ई. को हिसार में जन्मे मास्टर चन्दगीराम (Master Chandgi Ram) के पिता चौधरी माडूराम एक मेहनती , इमानदार तथा धर्मपथ पर चलने वाले इन्सान थे | उनकी माता श्रवण देवी का निधन तभी हो  गया जब चन्दगीराम सिर्फ दो वर्ष के थे | मास्टर चन्दगीराम कुश्तीकला में निपुण थे उन्हें दो बार भारत केसरी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ | वे बहुत ही निश्चल और विन्रम स्वभाव के थे जिसके कारण देश के बच्चे बूढ़े सभी उनसे प्यार करते थे |

चन्दगीराम (Master Chandgi Ram) ने 1954 ई. में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात जालन्धर से आर्ट्स-क्राफ्ट्स का डिप्लोमा प्राप्त किया | 1957 ई. में उनकी नियुक्ति गर्वनमेंट हाईस्कूल मुंढाल में एक ड्राइंग मास्टर के रूप में हुयी | इनके चाचा श्री सदाराम अपना जमाने के माने हुए पहलवान थे जिनकी मौत 1954 ई.  में हो गयी थी | पहलवानी की वंश-परम्परा को बरकरार रखने के लिए उनके पिता ने इन्हें कुश्ती कला की ओर उकसाया | यह जानकर लोगो को काफी आश्चर्य होगा कि बचपन में चन्दगीराम हृष्ट-पृष्ट नही थे |

विद्यार्थी जीवन में उन्हें अपनी कमजोरी बहुत अखरती थी | वे शुरू से ही लम्बे कद के थे | बस फिर क्या था अध्यापक बनने के तुंरत बाद उन्होंने शरीर साधना शुरू कर दी | उनका सुगठित शरीर अपना और अपने देश का नाम ऊंचा करने का संकल्प – इन सबके संयोग से वह कुश्ती के क्षेत्र में उतर आये | अपने पिता को चन्दगीराम (Master Chandgi Ram) ने पांच वर्षो के अंदर कुश्ती क्षेत्र में ख्याति प्राप्त करने का वचन दिया था | तत्पचात उन्हें इसका अहसास हुआ कि कुश्ती एक कला है और बिना गुरु के इसमें पारंगत होना असम्भव है |

उस समय दिल्ली में दूर दूर तक चिरंजी का नाम चमक रहा था गुरु चिरंजी का सारा जीवन मल्लयुद्ध की पूजा और सेवा में गुजरा | सदाराम जी जो चन्दगीराम के चाचा थे उन्होंने भी अपना गुरु उन्ही को बनाया | दिसम्बर 1959 ई. में चन्दगीराम गुरु चिरंजी की शरण में आये और भारतीय संस्कृति और परम्परा के अनुसार उन्होंने गुरूजी के चरण छूकर पगड़ी बांधी | उनकी देखरेख में कुश्ती कला सीखने लगे | जिसके परिणामस्वरूप वे कुश्तीकला में निपुण हो गये |

सन 1961 ई. में भारत सरकार ने जाट रेजिमेंट में उन्होंने अपनी सेवा प्रदान की | 1957 ई, से 1961 ई. तक ड्राइंग मास्टर बनने के बाद सन 1962 ई. में वह जाट रेजिमेंट के बुलावे पर सेना में चले गये | सर्वप्रथम चन्दगीराम लाईट हेवी वेट वर्ग में शामिल थे | 1961 ई. में गुरूजी के साथ वह अजमेर आ गये , जहां महादेव मदने और अचम्भा हंचनाने को हराने के बाद भारतवर्ष के लाईटहैवी वेट चैंपियन बने | 1961 ई. में उन्होंने इंदौर के मशहूर पहलवान इसहाक को कोल्हापुर में केवल दो मिनट में चित्त कर दिया |

पहली जनवरी 1962 ई. को श्री मोहम्मद चार्ली कर्नाटक को , जो कोल्हापुर में हिन्द केसरी श्रीपत ख्च्नाले पहलवान के बराबर रहा था को सोलह मिनटों के भीतर ही उसे पराजित कर दिया | कुछ मिनटों में ही उन्होंने इंदौर में ही पाकिस्तान के गुलाम कादिर को 18 मिनट में ही पटखनी देकर पराजित किया | इस प्रकार इस सच्चे पहलवान ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक अकेले ही अपनी कुश्ती-कला के जौहर से सभी को मन्त्रमुग्ध कर दिया | चन्दगीराम ने अपने देश के सभी समकालीन पहलवानों से मुकाबला किया तथा धुल चटाई |

चन्दगीराम (Master Chandgi Ram) ने दो बार विवाह किया | दरअसल उनकी एक शादी बचपन में ही हो गयी थी जब वे सिर्फ सात वर्ष के थे | उनका विवाह प्राइमरी में प्रवेश पाते ही 7 वर्ष की आयु में हो गया था | उन दिनों देहातो में बाल-विवाह प्रथा की प्रथा थी | चन्दगीराम जब चौदह वर्ष के हुए तो उनके बड़े भाई टेकचंद की मृत्यु हो गयी तो गाँवों ने जातीय परम्परा के मद्देनजर बड़े भाई की पत्नी को भी इन्ही के घर बिठा दिया लेकिन चन्दगीराम से जब भी विवाह के बारे में प्रश्न किया जाता तो वे अक्सर कहते है

“बलवान बनने के लिए नियमित रूप से व्यायाम और ब्रह्मचर्य का पालन दोनों ही आवश्यक है | मै विवाहित हु (मेरी दो पत्नियाँ है) | मेरी शादी सात वर्ष की आयु में हो गयी थी पर मैंने अपने जीवन में विवाह को संयम का बाधक नही पाया | मेरे विचार में पहलवानी के लिए विवाहित जीवन अभिशाप नही वरदान है यदि उसका दुरुपयोग न किया जाए | पहलवान गृहस्थ आश्रम में रहकर भी ब्रह्मचारी रह सकता है |मै अपनी सफलता का सारा श्रेय अपनी धर्मपत्नी को देता हु”|

चन्दगीराम (Master Chandgi Ram) इश्वर के प्रति असीम श्रुद्धाभक्ति रखते थे | किसी भी तरह के नशा और मांसाहार से वे परहेज करते थे | वे बहुत हल्के भोजन का सेवन किया करते थे | उनकी धारणा है कि पहलवान को लम्बी सांस या दमखम बनाने के लिए शाकाहारी भोजन करना चाहिए | उनकी खुराक में लगभग पाँव भर घी , दो-ढाई किलो दूध , एक किलो फल , डेढ़ पाँव बादाम और हरी सब्जिया थी | उनकी अनुसार पहलवान का शरीर अत्यंत सुगठित ,ताकतवर ,हल्का वजन एवं फुर्तीला होना चाहिए क्योंकि बहुत वजन के पहलवान अधिक देर तक नही लड़ सकते | गामा पहलवान भी बहुत भारी नही थे परन्तु उसके बावजूद भी उन्होंने अपने ड्योढ़े और दुगुने भारी वजन के पहलवानों को मिनटों और सैंकड़ो में चित्त कर दिया था |

चन्दगीराम (Master Chandgi Ram) ने एक बार कहा था “मै इस देश के लगभग सभी पहलवानों से लड़ चूका हु और दो-दो, तीन-तीन बार उन्हें पराजित कर चूका हु अकेले महाराष्ट्र के मारुती माने से मेरी तीन घंटे की एक कुश्ती बराबर छूटी थी | झ्न्देलर , श्रीपत मेहरदीन , निर्मलसिंह , भीमसिंह , जीत सिंह से कई बार लड़ चूका हुआ | यो मेहरदीन से मै एक बार हार चूका हु “| मेहरदीन और चन्दगीराम एक दुसरे के प्रतिद्वन्दी थे | पहले भारत केसरी आयोजन में भी यही दोनों पहलवान फाइनल में पहुचे थे |

सन 1968 ई. में भारत में आयोजित की जाने वाली भारत केसरी कुश्ती प्रतियोगिता में मात्र 38 मिनट में चन्दगीराम ने मेहरदीन को पराजित कर दिया था तथा भारत केसरी की उपाधि प्राप्त की थी और दुसरी बार भारत केसरी के दंगल के फाइनल में मेहरदीन को आठ मिनट में ही अखाड़ा छोड़ दिया था और बिना लड़े ही पराजय मान ली थी | चन्दगीराम में घमंड का नामोनिशान तक नही था | वह कहते थे “जब मै लड़ने के लिए अखाड़े में जाता हु तो जनता के प्रोत्साहन और बच्चो की शुभकामनाये से मुझे विजय प्राप्त होती है” |

चन्दगीराम (Master Chandgi Ram) भाग्य से ज्यादा परिश्रम और साधना में विश्वास करते थे | चन्दगीराम विचार से मेहनती और आशावादी थे | उन्हें भाग्य पर कोई विश्वास नही था | उनका मानना था कि परिश्रम के बल पर प्रत्येक इन्सान सभी प्रकार की सफलता अर्जित कर सकता है फिर उन्होंने अपनी कुश्ती कला के कई संस्मरण सुनाये |

सेना के वीर अर्जुन उपाधि प्राप्त पहलवान उदयचंद से भी कुश्ती में उनकी भिडंत हुयी | इस कुश्ती का आयोजन सन 1959 ई. में उकलाना मंडी में हुआ था | इसका समय तीस मिनिट निश्चित हुआ और पुरे तीस मिनट में ताबड़तोड़ घमासान कुश्ती चली | गाँवों में ज्यादातर लाग-डाग की कुश्ती आयोजित की जाती थी | समय हो जाने पर रेफरी ने कुश्ती छुडानी चाही परन्तु दोनों पहलवानों ने इंकार कर दिया कि इन्हें लड़ने दिया जाए तथा समय सीमा से मुक्त रखा गया परन्तु 45 मिनट बीतने के बाद दोनों पहलवान थककर चूर हो गये और कुश्ती छोडकर एक दुसरे से गले मिलकर अखाड़ा छोड़ दिया |

चन्दगीराम (Master Chandgi Ram) ने अपनी कुश्तीकला के बल पर दुनिया में भारत का नाम रोशन किया इसलिए यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नही है कि वे भारत का गौरव है | सच है कि कुश्ती एक ऐसा खेल है जिस पर समुचित ध्यान दिया जाए तो क्रिकेट , हॉकी या फुटबाल की तरह यह भी भारत में लोकप्रिय साबित हो सकता है परंतु सरकार की उदासीनता की कारण अभी तक इस खेल को उपयुक्त स्थान नही प्राप्त हो सका है |

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