Meghnad Saha Biography in Hindi | वैज्ञानिक मेघनाथ साहा की जीवनी

Meghnad Saha Biography in Hindi

डा.मेघनाथ साहा (Meghnad Saha) भौतिकी तथा खगोल भौतिकी के महान भारतीय वैज्ञानिकों  में विशेष अग्रगण्य है | गुलाम भारत के इस महान वैज्ञानिक ने शिक्षा तथा सामाजिक क्षेत्रो में भी अपनी उल्लेखनीय सेवाए दी | देश की अर्थव्यवस्था में सुधार लाने पर गरीबी हट सकती है ऐसा उनका विशवास था |

मेघनाथ साहा (Meghnad Saha) का जन्म 6 अक्टूबर 1893 को पूर्वी बंगाल के ढाका जिले के सेवराताली गाँव के एक विपन्न परिवार में हुआ था | पिता जगन्नाथ साहा और माता भुवनेश्वरी साहा की वे पांचवी सन्तान थे | गाँव की प्राथमिक विद्यालय में पढाई करने के साथ साथ वे पिता के साथ दूकान में उनकी मदद किया करते थे | आगे की पढाई के लिए उनको 11 किमी की दूरी पर स्थित विद्यालय जाना पड़ता था | 1905 में विद्यालय में पढ़ते हुए उन्होंने बंग-भंग के दौरान विरोध प्रकट करते हुए शाळा निष्कासन का दंड भी भोगा था |

1909 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करते हुए पुरे प्रांत में प्रथम स्थान प्राप्त किया था | 1911 में विज्ञान के इंटर परीक्षा उत्तीर्ण की | कलकत्ता के Presidency College से जगदीश चन्द्र बसु ,प्रफुल्लचन्द्र रॉय जैसे वैज्ञानिकों से शिक्षा ग्रहण की | 1913 में Bsc तथा 1915 में Msc की परीक्षा उतीर्ण की | वे Indian Finance की प्रतियोगी परीक्षा में शामिल होना चाहते थे किन्तु उग्र राजनितिक विचारधारा के कारण उन्हें वंचित रखा गया | अब उन्होंने गणित और भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में शोधकार्य करने का निश्चय किया |

1916 में University of Science कॉलेज में गणित के प्राध्यापक नियुक्त हुए | प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर देवेन्द्रमोहन बसु को जर्मनी में नजरबंद किये जाने पर उन्होंने भौतिक विज्ञान का भी आध्यापन भार ले लिया | ऊष्मा और Thermodynamics पढाते पढ़ाते उन्होंने ऊष्मा पर गहन अध्ययन करते हुए महत्वपूर्ण पुस्तको का लेखन कार्य भी कर डाला | उनके शोध निबन्ध इंग्लैंड के Philosophical Magazine तथा अमेरिका की Physical Review नामक प्रतिष्टित पत्रिकाओं में भी छपे |

डा.साहा (Meghnad Saha) ने जिस नवीन सिद्धांत का प्रतिपादन किया , उसमे यह प्रमाणित किया कि अधिक ऊँचे तापक्रम पर तथा कम दबाव पर सूर्य के वर्णमंडल के परमाणु Ionized होते है | इसी कारण सूर्य के वर्णमंडल के रश्मिचित्रों में कुछ रेखाए मोटी दिखाई पडती है | डा.साहा का यह सिद्धांत तारो के रश्मिचित्रों से उसकी दूरी नापने में बहुत सहायक सिद्ध हुआ | सितम्बर 1919 में डा.साहा (Meghnad Saha) शोधकार्य पूर्ण करने के उद्देश्य से यूरोप गये | वहा के प्रो.फाउलर की प्रयोगशाला में एवं इसके पश्चात कैम्ब्रिज की केवेंदिश प्रयोगशाळा में शोधकार्य किया | फिर जर्मनी जाकर प्रो.नर्स्त की प्रयोगशाला में कार्य किया |

उनके भौतिक संबंधी सिद्धांतो की सभी वैज्ञानिको ने प्रसंशा की | जर्मनी ने जिन प्रयोगों को प्रारम्भ किया था ,भारत आने पर एक सम्पन्न प्रयोगशाळा के अभाव में उनके सामने कठिनाइया आयी | देश-विदेश में वैज्ञानिक व्याख्यान देते हुए उन्होंने अपने प्रतिभा का लोहा मनवाया | 1927 में लन्दन की रॉयल सोसाइटी में अन्तरिक्ष किरण सिद्धांत संबधी कार्य हेतु फेलो निर्वाचित किया | तत्पश्चात इटली में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय भौतिक विज्ञान सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधत्व किया |वहा से उन्होंने वैज्ञानिकों के साथ नोर्वे जाकर पूर्ण सूर्यग्रहण की जांच की |

इंग्लैंड की खगोल सभा के साथ साथ उन्हें बंगाल की रॉयल एशियाटिक सोसाइटी का फेलो भी निर्वाचित किया गया | बम्बई अधिवेशन में उन्होंने ब्रह्मांड तथा सृष्टि की उत्पत्ति और असंख्य नक्षत्रो के बारे में सिद्धांतो का प्रतिपादन किया | उनके प्रयत्नों से ही 7 जनवरी 1935 को कलकत्ता के National Institute of Science की स्थापना की | 1935 में ही अमेरिका के कार्नेगी ट्रस्ट द्वारा उन्हें उर्ध्व वायुमंडल संबधी कार्य के लिए फेलोशिप दी गयी | उन्होंने ये सिद्ध किया कि प्रकाश का दबाव सब पदार्थो पर एक सा नही पड़ता | पदार्थ के अणुओ पर यह दबाव कम या ज्यादा पड़ता है |

सूर्य के तापक्रम के कारण सूर्य के प्रकाश में कुछ रंग चमकदार और तेज होते है | यदि किसी तत्व के परमाणु उन्हें के आस-पास शोषण करने लगे , तो परमाणु ऊर्जा अवशोषण द्वारा उर्जित होते है | प्रकाश विज्ञान तथा तापयापन सिद्धांत की इस खोज ने विकिरण दबाव ,धातु ,लवणों के रंग संबधी महत्वपूर्ण खोजे की | डा.साहा 1945-47 तक आणविक अनुसन्धान समिति के अध्यक्ष तथा 1948 में परमाणु शक्ति अनुसन्धान आयोग के अध्यक्ष रहे | विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के गठन एवं राष्ट्रीय पंचाग के निर्माण का श्रेय उन्ही को जाता है |

डा.साहा (Meghnad Saha) को सम्पूर्ण भारतवर्ष उनकी विज्ञान संबधी खोजो तथा सामजिक ,आर्थिक एवं शैक्षिक सुधार के लिए सदा स्मरण रखेगा | विज्ञान के इस महान साधक का देहावसान 15 फरवरी 1956 को हो गया |

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