स्वतंत्रता सेनानी मृदुला साराभाई की जीवनी | Mridula Sarabhai Biography in Hindi

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स्वतन्त्रता सेनानी मृदुला साराभाई की जीवने | Mridula Sarabhai Biography in Hindi
स्वतन्त्रता सेनानी मृदुला साराभाई की जीवने | Mridula Sarabhai Biography in Hindi

मृदुला साराभाई (Mridula Sarabhai) का जन्म 6 मई 1911 को अहमदाबाद में हुआ था | उनके पिता का नाम अम्बालाल और माता का नाम सरला देवी था | उनके पिता अम्बालाल ने “केलिको मील” उत्तराधिकार में प्राप्त की थी तथा उसे इस मिले को देश की प्रथम श्रेणी की कपड़ा मिल बना दिया था | उनकी माता सरला देवी राजकोट के प्रतिष्टित अधिवक्ता हरिलाल गौशालिया की पुत्री थी | अम्बालाल ने अपने बच्चो की शिक्षा के लिए अपने घर पर ही एक विद्यालय खोल दिया तथा इंग्लैंड से दो शिक्षक बुलवाए जिनमे एक शिक्षक कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का स्नातक था | इन शिक्षको के अतिरिक्त उन्होंने अपने बालको को संगीत , नृत्य , मिटटी के बर्तन बनाना ,बढाई गिरी तथा विविध विषयों की शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए अनेक प्रख्यात भारतीय शिक्षाविद शिक्षको की नियुक्ति की |

विद्यालय की शिक्षा समाप्त करने के बाद मृदला (Mridula Sarabhai) ने असहयोग आन्दोलन के दौरान गुजरात विद्यापीठ में भर्ती हो गयी | मृदला के माता-पिता , बुआ , मौसी सभी गांधीजी के अनुयायी थे अत: मृदला बचपन से ही महात्मा गांधी से परिचित हो गयी थी | 1921 में अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन के समय उनकी आयु 10 वर्ष थी | उस समय मृदला ने कांग्रेस के प्रतिनिधियों के लिए एक प्याऊ लगाई थी | मृदला ने कांग्रेस की बाल सेना तथा अखिल भारतीय चरखा संघ के शिशु विभाग में काम किया था |

महात्मा गांधी की दांडी यात्रा में सम्मिलित होने के लिए उन्होंने महिलाओं को प्रेरित और प्रोत्साहित किया | महात्मा गांधी की प्रेरणा से ही उन्होंने विदेशी कपड़ो का बहिस्कार करने , मदिरालयो पर धरना देने तथा स्वदेशी वस्तुओ को अपनाने अजसी कार्यो का नेतृत्व किया | इसके लिए उन्हें तब गांधीजी ने अपने हाथो से उठाते हुए कहा “आज से तुम मेरी पुत्री हुयी ” | उसी समय गांधीजी ने उनका नाम मीरा रख दिया | फिर उनकी परीक्षा शूरू हो गयी और आश्रम में उन्हें शौचालय की सफाई का काम दिया गया |

मीरा ने सहर्ष इस कार्य को किया | बाद में उन्हें दैनिक कार्य में लगाया गया | भारत की जलवायु उनके अनुकूल नही थी फिर भी वे सब कुछ सहती रही और आश्रम के सभी कार्यो में हाथ बंटाती रही | सफेद खादी की सड़ी पहन कर उन्होंने आजन्म अविवाहित रहने का व्रत लिया और गांधीजी की सच्ची शिष्या बन गयी | स्वतंत्रता आन्दोलन में वे गांधीजी के निर्देशनुसार कार्य करती थी |

1942 में असहयोग आन्दोलन में वे जेल गयी | रिहा होने के बाद 1944 में हरिद्वार के पास “किसान आश्रम” खोला | महात्मा गांधी की हत्या के बाद कुछ वर्षो तक वे समाज सेवा तथा ग्रामीण कल्याण में लगी रही | बाद में वे भारत छोडकर चली गयी | गांधीजी के साथ हुए व्यवहार पर उन्हें गहरा कष्ट हुआ | गांधी शताब्दी वर्ष में वे जर्मनी में गांधी शताब्दी समारोह में शामिल हुयी | वे उस समय ऑस्ट्रिया में थी |

1980 से उन्हें वृद्धावस्था गुजारे अरु चिकित्सा हेतु आर्थिक सहायता भेजी जा रही थी | 22 नवम्बर 1981 को उनकी 90वी वर्षगांठ पर एक समारोह दिल्ली में आयोजित किया गया | 26 जनवरी 1982 को गणतन्त्र दिवस के मौके पर उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया गया | 20 जुलाई 1982 को वियना के निकट कैकिंग गाँव में उनका देहांत हो गया | मीरा बेन देश सेवा के पावन कार्य में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की असाधारण सहयोगिनी थी | देश उनकी सेवाओं को हमेशा याद रखेगा | भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास में उनका नाम अमर है |

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