Naushad Ali Biography in Hindi | संगीतकार नौशाद अली की जीवनी

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Naushad Ali Biography in Hindi | संगीतकार नौशाद अली की जीवनी
Naushad Ali Biography in Hindi | संगीतकार नौशाद अली की जीवनी

लगभग आधी सदी तक हिंदी फिल्मो में श्रुति-मधुर और हृदयस्पर्शी संगीत देने वाले जन्नतनशीं नौशाद अली (Naushad) मूलतः कला और अदब के शहर लखनऊ के निवासी थे | उनके पिता वहीद अली कोर्ट में क्लर्क थे | बचपन से ही नौशाद (Naushad) को संगीत का बहुत शौक था एयर वो बाराबंकी में देव शरीफ पर लगने वाले सालाना मेले में महान कव्वालो को सुनने जाया करते थे | नौशाद (Naushad) ने हिन्दुस्तानी संगीत कई दिग्गजो उस्ताद गुरबत अली , उस्ताद युसूफ अली ,उस्ताद बब्बन साहेब जैसे कलाकारों से सीखा |

इसके बाद वो लखनऊ के रॉयल थिएटर में काम करने लगे गये , जहा उन्हें वादकों की टीम में शामिल कर लिया गया था | यही से उन्होंने संगीतकार बनने की प्रेरणा ली थी | नौशाद (Naushad) मूक फिल्मो के दौर से ही सिनेमा के काफी फेन रहे है और 1931 में भारतीय सिनेमा को एक 13 साल के लडके में संगीत की साधना दिखी लेकिन उनका परिवार इस्लामिक कारणों से संगीत के विरोध में था और उनके पिता ने उनको धमकी थी कि अगर घर में रहना है तो संगीत छोड़ना होगा | नौशाद (Naushad) 1937 के अंत में अपनी किस्मत आजमाने लखनऊ से मुम्बई भाग आये |

संगीत के प्रति अविचलित निष्ट और कलाजगत को कुछ उत्कृष्ट देने की लालसा उन्हें फिल्म नगरी बम्बई ले आयी | जब उन्होंने फिल्मो में संगीत देने का निश्चय किया तो उन्हें शास्त्रीय संगीत का ज्ञान तथा लोक संगीत की असाधारण जानकारी आधारभूत खजाने में प्राप्त थी | संगीत से सजी उनकी पहली फिल्म “माला” थी किन्तु उन्हें असाधारण ख्याति तथा लोकप्रियता मिली फिल्म “रतन” के गानों से | इस फिल्म का निर्माण लाहौर के निवासी अभिनेता करण दीवान के भाई जैमिनी दीवान ने किया था |

“रतन” के गानों का यह आलम था कि इस मोहक संगीत के कारण फिल्म में थिएटर में लगातार तीन बरस तक चलने का रिकॉर्ड बनाया | दस गीतों से सजी इस फिल्म में पांच गीत जोहराबाई अम्बालावाली ने गाये थे | इनमे एक गीत जोहरा तथा करन दीवान के सम्मिलित स्वरों में था | “सावन के बादलो उनसे ये जा कहो” – इन बोलो वाले इस गीत में प्रेमजन्य मादकता तथा वियोगजन्य अवसाद के स्वर एक साथ मुखरित हुए | जोहरा के अन्य गीत “रुमझुम बरसे बादरवा मस्त हवाए आयी ” ,”अंखिया मिला के जिया भरमा के ” , “परदेसी बालम आ बादल आया ” तथा “आई दीवाली आई दीवाली” |

उसी युग की एक प्रख्यात गायिका अमीरबाई कर्नाटकी ने “रतन ” में जो दो गीत गाये वे भी जन जन के प्रिय बने | इसमें एक “ओ जाने वाले बालमवा लौट के आ” कर्नाटकी और श्याम कुमार के सम्मिलित स्वरों में था जबकि नायिका द्वारा संयोग के पश्चात वियोग को व्यक्त करने वाले करुणासक्ति गीत “मिल के बिछड़ गयी अंखिया” को अमीरबाई की जगह नायिका की ननद की भूमिका में आयी एक अल्पख्यात गायिका अभिनेत्री मंजू ने गाया था |

रतन के बाद नौशाद (Naushad) को कुंदनलाल सैगल की फिल्म शाहजहाँ में संगीत देने का एक ओर अवसर मिला | वर्षो से उनकी अभिलाषा सैगल द्वारा अभिनीत फिल्म में संगीत देने की थी | शाहजहा सैगल की अंतिम (परवाना) से पहली फिल्म थी जो 1946 ने आयी थी | नौशाद ने “गम दिए मुस्तकिल “”हम जीकर क्या करेंगे जब दिल ही टूट गया ” “चाह बर्बाद करेगी हमे मालुम न था ” जैसे हृदय स्पर्शी और हृदय द्रावक गीतों एके धुनें तैयार की |

अपने संस्मरण में उन्होंने सैगल के गायन के बारे में एक तथ्य कहा था कि उनके अनुसार सैगल के मन की धारणा बद्धमूल हो गयी थी कि बिना शराब अक एक जाम पिए वे अच्छा गा नही सकते किन्तु नौशाद ने बिना पिए सैगल से को पंक्ति गवाई वह उससे श्रेष्ठ थी जिसे मदिरा का जाम पीकर सैगल ने गया था | अंतत: सैगल का यह भ्रम टूट गया कि बिना पिए वो अच्छा नही गा सकते किन्तु तब तक शराब ने उनके तन को जर्जर कर दिया और अब सम्भलजाने पर भी बात बनने वाली नही थी | अगले ही बरस 18 जनवरी 1947 को सैगल का निधन हो गया |

नौशाद (Naushad) ने हास्य अभिनेत्री उमा देवी (टुनटुन) को फिल्म लाइन में गायिका के रूप में ब्रेक दिया | फिल्म दर्द में उनके गाये प्रसिद्ध गीत “अफसाना लिख रही हु दिले बेकरार का ” को आज भी श्रोता समाज द्वारा पसंद किया जाता है | यह दुसरी बात है कि बाद में उमा देवी हास्य अभिनेत्री बन गयी | नौशाद को नूरजहाँ द्वारा अभिनीत फिल्म “अनमोल घड़ी” के लोक्रप्रिय संगीत के कारण सदा याद किया जायेगा | उनके द्वारा इस फिल्म में दिए संगीत में जो लज्जत मधुरता और आकर्षण था वो काल की सीमा का अतिक्रमण क्र आज कई दशको के बाद भी उतना ही दिलकश और मोहक है |

यो तो नौशाद (Naushad) द्वारा संगीतबद्ध किये गये गीतों की विवेचना पर्याप्त स्थान ले सकती है किन्तु समाहार रूप से इतना ही कहना पर्याप्त है कि “आन ” “अंदाज” “बैजू बावरा” आदि पचासों फिल्मो के गीत उनकी संगीत साधना के परिचायक है | भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया और यथासमय वे दादा साहेब फाल्के पुरुस्कार से भी सम्मानित हुए | 05 मई 2006 को मुम्बई में नौशाद का देहांत हो गया | वो अपने पीछे अपने छ बेटियों और तीन बेटो को छोडकर गये जो भी संगीत के क्षेत्र में सक्रिय है |

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