नूरजहाँ का जीवन परिचय | Nur Jahan Biography in Hindi

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नूरजहाँ का जीवन परिचय | Nur Jahan Biography in Hindi
नूरजहाँ का जीवन परिचय | Nur Jahan Biography in Hindi

नूरजहाँ (Nur Jahan) की गाथा महत्वकांक्षा , शक्ति , सत्ता लिप्सा , दरबारी शान-ओं-शौकत  एवं सहनशीलता की एके लम्बी एवं रोचक कहानी है | रजिया सुल्ताना , रानी दुर्गावती , चाँदबीबी अदि मध्यकालीन महिलाओं की भांति नूरजहाँ भी अपने पति रुपया पुरुष के सहारे सत्ता के सिंहासन पर आरूढ़ हो सकी | नूरजहाँ (Nur Jahan) ने तो अपनी वाक्पटुता , आकर्षण एवं व्यक्तिगत गुणों के कारण भारत के सर्वोच्च शक्तिमान बादशाह हिन्द नूरुद्दिन मुहम्मद जहांगीर को अपनी उंगलियों पर नचाया |

नूरजहाँ (Nur Jahan) का जन्म 1577 में कांधार (अफगानिस्तान) में हुआ था | उनके पिता का नाम मिर्जा ग्यासबेग ने उसे अल्लाह ताला की मैहर मानकर उसका नाम मेह्रुनिस्सा रख दिया था | अपने पिता की मृत्यु के बाद ग्याबसेब अपनी पत्नी के साथ हिन्दुस्तान आये थे | यही उन्हें कन्यारत्न की प्राप्ति हुयी थी | हिन्दुस्तान उन्हें बहुत पसंद आया | पर्वत ,झरने ,झीले , बाग़ ,नदियाँ आदि रमणीक स्थल देखकर वे ठगे से रह गये |

यद्यपि ईरान भी खुबसुरत देश था परन्तु हिन्दुस्तान की खूबसूरती ने उन्हें मोह लिया | उस समय कश्मीर का राजा युसूफ शाह था जो कि संगीत , कला ,साहित्य में विशेष रूचि लेता था | उसकी बेगम का नाम था “हब्बा खातून” जिसके रसीले गीत पुरे कश्मीर में गूँजते थे | युसूफ शाह प्रशासन के प्रति उदासीन थे अत: कश्मीर में भ्रष्टाचार का बोलबाला था अत: ऐसे वातावरण में वे अधिक दिन तक नही रह सके और आगरा की ओर चल दिए |

कांधार के ईमाम ने आगरा के ईमाम को एक सिफारशी पत्र दिया था अत: वे जल्द ही आगरा के अमीरों , वजीरो , मनसबदारो ,जमीरदारो आदि के सम्पर्क में आ गये तथा धीरे धीरे बादशाह तक पहुच गये | मुगल दरबार में ईरानियो की सुन्दरता और चतुरता का सम्मान किया जाता था | ग्यासबेग ने बड़े जतन से बचाकर रखा हुआ हीरा “दिलफरेब” बादशाह अकबर के हुजुर में पेश किया | इस भेंट से अकबर बहुत प्रसन्न हुआ तथा ग्यासबेग को अपने दरबार में नियुक्त कर लिया |उनके सुझावी से राज्य को काफी लाभ हुआ | धीरे धीरे मिर्जा ग्यासबेग दरबार-ए-आजम से दरबार-ए-ख़ास तक पहुच गये | इसी के साथ उनकी बेगम अस्मत और उनकी मुत्री मेहरुनिस्सा भी शाही महलो में आने जाने लगी | इसी बीच मेह्रुनिस्सा अन्य शहजादियो तथा बेगमो के साथ घुल मिल गयी |

एक बार शहजादे सलीम में मेह्रुनिस्सा को लाहौर में रावी नदी में नौका विहार करते हुए देखा था | उसी समय सलीम ने मेहरुनिस्सा को अपने मनमंदिर में बसा लिया था | अकबर अधिक शिक्षित नही था परन्तु उसने अपने दरबार में नौ रत्न नियुक्त किये हुए थे | वह विद्वानों का बहुत आदर करता था | शहजादा सलीम एक शिक्षित युवा राजकुमार था | कला पारखी एवं ऊँचे दर्जे का चित्रकार था | उसने अपने ख्वाबो की मल्लिका मेहरुनिस्सा के कई सुंदर चित्र बना रखे थे | यह बात जब अकबर को पता चली तो उनका माथा ठनका और मिर्जा ग्यास को अपना दरबारी मानते हुए उन्होंने 1594 में के बहादुर अफगान नौजवान अलीकुली खा से 17 वर्षीय मेह्रुनिस्सा का निकाह करवा दिया | शहजादा सलीम हाथ मलता रह गया परन्तु अपने पिता के विरुद्ध उसके मन में नफरत की आग भडक उठी |

1605 ई. में शहजादा सलीम दिल्ली के सिंहासन पर बैठा | उसका नाम हो गया नुरुद्दीन मुहम्मद जहांगीर पादशाह गाजी | उसके मन में मेहरुल्निस्सा की आग सुलग रही थी | उधर बंगाल के सूबेदार शेर अफगान (अली कुली खा का नया नाम) बंगाल का शासन ठीक चला पाने में असमर्थ हो रहा था | जहांगीर अपनी मेह्रुनिस्सा को किसी भी कीमत पर पाना चाहता था अत: उसने बंगाल के सूबेदार को शाही अवज्ञा अरु बेअदबी मानकर मुगल सेना भेजकर उसे मरवाने की योजना बनाई और वह सुगमतापूर्वक मेह्रुनिस्सा को पा सके | योजनानुसार 30 मई 1607 ई. को जहाँगीर के निर्देशानुसार मेहरुलनिस्सा के पति शेर अग्फान को मार दिया गया तथा मेह्रुनिस्सा को आगरा के शाही हरम में ले जाया गया |

कुछ समय बाद मई 1611 में जहांगीर ने मेहरुलनिस्सा से विवाह कर लिया यह उसका 18व विवाह था | जहाँगीर ने उसे “नूरमहल”के खिताब से सम्मानित किया जो बाद में नूरजहाँ में परिवर्तित कर दिया गया | नूरजहाँ (Nur Jahan) जल्द ही शाही महल के बाढ़ भी अपने आकर्षण एवं प्रभाव के कारण चर्चा का विषय बन गयी | प्रशासकीय मामलो में उसकी पकड़ अच्छी थी | दरबार में बादशाह के पीछे महीन पर्दे में नूरजहाँ बैठती थी और जहांगीर के कंधे पर अपनी हथेली की अंगुलियों से समस्त सल्तनत की बागडोर थामे रहती थी |

नूरजहाँ (Nur Jahan) की महत्वकांक्षा असीमित थी | वह अपने वर्तमान तथा भविष्य के प्रति सदैव जागरूक थी | बादशाह तो शराब और अफीम के नशे में रहते थे और वे धीर धीरे धीरे निष्क्रिय होते जा रहे थे | मुगल साम्राज्य में सता परिवर्तन की सम्भावना बढती जा रही थी | जहांगीर का तीसरा बीटा खुर्रम अत्यंत लोकप्रिय तथा सक्रिय था अत: उसी को बादशाह ने उत्तराधिकारी बनाने का निर्णय लिया गया | नूरजहाँ को पक्का विश्वास था कि खुर्रम ही हिंदुस्तान का बादशाह होगा | उसे विश्वास था कि उसकी पुत्री लाडली बेगम से खुर्रम का निकाह हो जाएगा और उसकी अपनी बेटी मलिका-ए-आलिया बबन जायेगी परन्तु खुर्रम नूरजहाँ के भाई आसिफ खा की पुत्री बानू बेगम को दिल दे चूका था और उनकी शादी भी तय हो गयी थी |

नूरजहाँ (Nur Jahan) इससे निराश हो गयी फिर उसने जहाँगीर के बड़े पुत्र खुसरो की ओर दृष्टि डाली तथा उसे जेल से छुडवाने के लिए लाडली बेगम से शादी की शर्त रख दी परन्तु खुसरो तैयार नही हुआ | इससे नूरजहाँ बौखला उठी किन्तु करती भी क्या ? नूरजहाँ ने जहागीर को शराब एवं अफीम के नशे में इतना डुबो दिया था कि वह उनकी अंगुलियों के इशारे पर नाचता था|

नूरजहाँ (Nur Jahan) कलात्मक प्रकृति की महिला थी | चित्रकारी , पच्चीकारी ,पाकशास्त्र ,वस्त्र आभूषण आदि सभी विद्याओं में सिद्ध हस्त थी | जहाँगीरी काल में सिक्को पर नूरजहाँ का चित्र बना था | वे हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों धर्म के लोगो का आदर करती थी | जहागीर के अंतिम समय में नूरजहाँ ने उनके बड़ी सेवा की | 28 अक्टूबर 1629 को जहागीर की मृत्यु हो गयी | 58 वर्ष की आयु में 22 वर्ष उन्होंने मुगल सिंहासन की शोभा बढाई | अंत में रावी नदी के तट पर उन्हें शाही  शान-ओ-शौकत के साथ दफना दिया गया |

इसके बाद शाहजहाँ आगरा की गद्दी पर बैठा परन्तु उसने अपनी राजधानी दिल्ली को बनाया | लाल हवेली (लाल किला) बनवाया उसके आस-पास शहर बसाया जिसका नाम रखा शाहजहाँबाद कालान्तर में उसकी बेटी ने चाँदनी चौक नामक रमणीक बाजार बनवाया | इधर नूरजहाँ काफी शिथिल हो चली थी | उसकी देखरेख के लिए शाहजहाँ ने अपने श्वसुर तथा नूरजहाँ के भाई आसफ खा को नियुक्त किया | वह अधिकतर लाहौर में रहती थी तथा किसी जलसे या समारोह में शामिल नही होती थी | 18 दिसम्बर 1645 को नूरजहाँ (Nur Jahan) का निधन हो गया | उन्हें भी अपने पति बादशाह जहांगीर के बगल में दफना दिया गया |

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