Panna Dai Biography in Hindi | वीरांगना पन्ना धाय की जीवनी

Panna Dai Biography in Hindi

Panna Dai Biography in Hindi

मेवाड़ में अनेक बहादुर और साहसी राजा हुआ है | इनमे एक थे राणा संग्राम सिंह | राणा संग्राम सिंह वीर अवश्य थे किन्तु उनमे मित्र और शत्रु को परखने की क्षमता का अभाव था | राणा संग्राम सिंह को अपनी प्रशंशा सुनना बड़ा अच्छा लगता था | उनकी प्रशंशा करके उनसे कुछ भी कराया जा सकता था | राणा संग्राम सिंह का एक सेवक था – बनबीर | बनबीर बड़ा धूर्त , चालाक और महत्वाकांक्षी प्रकृति का व्यक्ति था | उसने राणा संग्राम सिंह की इस कमी का लाभ उठाया और उनकी झूठी सच्ची प्रशंशा करके उनका विश्वासपात्र बन बैठा |

राणा संग्राम सिंह राज्य और परिवार के सभी विषयों पर बनबीर से विचार-विमर्श करते थे और उनके सुझाव को बड़ा महत्व देते थे | राणा संग्राम सिंह का विश्वासपात्र होने के कारण राजा के सेवको में बड़ी तेजी से बनबीर का प्रभाव बढने लगा | धीरे-धीरे बनबीर इतना प्रभावशाली हो गया कि राजपुरोहित , सेनापति और महामंत्री तक उससे भयभीत रहने लगे | बनबीर ने अपनी स्थिति का लाभ उठाया और अपने जैसे दुष्ट बेईमान और धूर्त राजकीय कर्मचारियों का एक दल बना लिया | इस दल के लोग मेवाड़ की प्रजा का खुलकर शोषण करते थे एवं भोले-भाले लोगो पर अत्याचार करते थे किन्तु बनबीर के प्रभाव के कारण उन्हें कोई कुछ नही कह पाता था |

इसी समय बनबीर की सेवाओं से प्रसन्न होकर राणा संग्राम सिंह ने बनबीर को मेवाड़ का महामंत्री बना दिया | इससे बनबीर की शक्ति ओर बढ़ गयी और वह राणा संग्राम सिंह के बाद मेवाड़ का सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति बन बैठा | कुछ समय बाद राणा  संग्राम सिंह की मृत्यु हो गयी | राणा संग्राम सिंह के इकलौते पुत्र उदय सिंह को युवराज घोषित कर दिया गया तथा बनबीर अपने प्रभाव के द्वारा उदयसिंह का संरक्षक बन बैठा | बनबीर अत्यंत महत्वकांक्षी व्यक्ति था | वह एक साधारण सेवक से मेवाड़ का महामंत्री बना था किन्तु उसका उद्देश्य अभी पूरा नही हुआ था |

वह तो मेवाड़ का शासक बनना चाहता था | इस समय मेवाड़ की परिस्थितिया भी ऐसी थी कि बनबीर को अपना स्वप्न साकार होते दिखाई दिया | उसके रास्ते का बस एक ही काँटा था युवराज उदय सिंह | एक दिन बनबीर ने अपने सहयोगियों को एक गुप्त स्थान पर एकत्रित किया और उनसे विचार विमर्श किया | बनबीर ने अपने सहयोगियों को लालच दिया यदि वह मेवाड़ का शासक बन जाएगा तो उन्हें उच्च पद देगा | बनबीर के साथी भी उसकी तरह धूर्त और लालची थे अत: उसकी बातो में आ गये और सभी ने मिलकर एक भयानक निर्णय लिया – युवराज उद्यिसंह की हत्या का निर्णय |

बनबीर के सहयोगियों में एक राजकीय सेवक कट्टर राजभक्त था | वह बाहर से तो बनबीर से मिला हुआ था किन्तु भीतर ही भीतर राजपरिवार का हित चाहता था | इस सेवक ने जब युवराज उद्यिसंह की हत्या के संबध में सुना तो सीधा पन्ना (Panna Dai) के पास पहुचा और उसे सारी बात बताई | पन्नाधाय युवराज उदयसिंह की धाय थी और उसे अपने पुत्र की तरह स्नेह करती थी | पन्ना को जब युवराज उदयसिंह की हत्या का षडयंत्र की जानकारी मिली तो वह कुछ समय के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ सी हो गयी | अंत में उसने युवराज को बचाने के लिए एक अभिनव बलिदान देने का निर्णय लिया |

पन्ना (Panna Dai) ने एक टोकरे में युवराज उदयसिंह को लिटाया और उपर से कूड़ा-करकट भर दिया | इसी मध्य स्वामिभक्त सेवक सफाई वाले का वेश बनाकर आ गया | पन्ना ने सेवक को कुछ आवश्यक निर्देश दिए और युवराज को एक सुरक्षित स्थान पर पहुचाने के लिए कहा | बनबीर ने पुरे राजमहल के कर्मचारियों को यह आदेश दे दिया था कि किसी भी स्त्री को छोटे बच्चे के साथ महल के बाहर न जाने दिया | इतना ही नही उसने महल के उस भाग के उस भाग पर भारी पहरा बैठा दिया था जहा पन्ना और उदयसिंह थे |

यह दिन का समय था | बनबीर रात को युवराज उदयसिंह की हत्या करना चाहता था अत: उसने दिन के समय युवराज की निगरानी के विशेष आदेश दिए थे | स्वामिभक्त सेवक को इन सभी बातो की पुरी जानकारी थी | वह महल के कई गुप्त रास्तो से भी परिचित था अत: उसने युवराज उदयसिंह को महल के बाहर ले जाने में कोई परेशानी नही हुयी | सेवक सफाई कर्मचारी के वेश में था अत: उसे बाहर जाते हुए कई लोगो ने देखा किन्तु कोई भी उसे पहचान न सका |

इधर युवराज उदयसिंह को महल के बाहर भेजने के बाद पन्ना ने उसी आयु के अपने बेटे को युवराज के कपड़े पहनाये और उसे उसी पलंग पर लिटा दिया जिस पर कुछ समय पूर्व युवराज उदयसिंह लेटे थे | पन्ना (Panna Dai) का हृदय यह सब करते हुए चीत्कार कर रहा था | वह जानती थी कि युवराज उद्यिसंह को बचाने के लिए अपने बेटे का बलिदान देने जा रही है | पन्ना का हृदय हा-हाकार कर रहा था | एक ओर स्वामिभक्ति और दुसरी ओर माँ की ममता |

अंत में पन्ना ने धैर्य और साहस से काम लिया और अपने बेटे को युवराज के पलंग पर लिटाकर वह इस प्रकार सामान्य कार्यो में व्यस्त हो गयी जैसे उसे राजमहल में होने वाले षड्यंत्रों की कोई जानकारी ही न हो | तभी अचानक अपने हाथ में नंगी तलवार लिए बनबीर ने युवराज सिंह उदयसिंह के कक्ष में प्रवेश किया | बनबीर के सर पर खून सवार था उसने आते हे कठोर आवाज में पन्ना से पूछा “उदयसिंह कहा है ?”

पन्ना कुछ क्षण तो ठगी से खडी रही फिर उसने हृदय पर पत्थर रखकर युवराज उदयसिंह के पलंग पर लेटे हुए अपने बेटे की ओर इशारा कर दिया | बनबीर ने एक बार अपने चारों ओर देखा और फिर बड़ी निर्दयता से उसने अपनी तलवार पलंग पर सोते हुए पन्ना (Panna Dai) के बेटे के हृदय पर घोंप दी | युवराज उदयसिंह के कक्ष में एक भयानक चीख उभरी और फिर कुछ ही क्षणों में सब शांत हो गया | बनबीर के चेहरे पर एक विजयपूर्ण मुस्कान आ गयी | उसने सोचा कि उसके मेवाड़ नरेश बनने का मार्ग का एकमात्र काँटा दूर हो गया |

अपना काम पूरा करने के बाद बनबीर ने पन्ना की ओर एक सरसरी दृष्टि डाली और जिस ओर से आया था उसी ओर लौट गया | पन्ना अभी तक बुत बनी हुयी थी | बनबीर के जाते ही वह फुट-फुटकर रो पड़ी | उसके सामने उसके एकमात्र पुत्र की हत्या कर दी गयी और वह कुछ न कर सकी | पन्ना बड़ी देर तक पड़ी रोटी रही | अगले दिन उसने युवराज बने अपने बेटे का दाह संस्कार कराया और उस स्थान पर आ पहुची , जहा युवराज उदयसिंह थे |

पन्ना ने युवराज उदयसिंह का बड़ी सावधानी से पालन-पोषण किया | उसने एक ओर उदयसिंह को बनबीर की नजरो से दूर रखा और दुसरी ओर उन्हें युवराज के समान शिक्षित किया | बड़े होने पर युवराज उदयसिंह ने मेवाड़ की राजगद्दी प्राप्त की और युवराज उदयसिंह से राणा उदयसिंह बने | राणा उदयसिंह ने जीवनभर पन्ना का उपकार माना और जब तक पन्ना जीवित रही उसे माता का सम्मान दिया | आज न पन्ना है न उदयसिंह किन्तु एक वीरांगना के रूप में आज भी मेवाड़वासी पन्ना (Panna Dai) को याद करते है | वीरांगना पन्ना का नाम आते ही मेवाड़वासियों के मस्तक उसके प्रति श्रुधा से झुक जाते है |

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