Prakash Mehra Biography in Hindi | मसाला फिल्मो के सूत्रधार प्रकाश महरा की जीवनी

0
63
Prakash Mehra Biography in Hindi
Prakash Mehra Biography in Hindi

“जंजीर” ने सिर्फ अमिताभ बच्चन को ही स्टार नही बनाया था | इस फिल्म की सफलता से जहा एक तरफ निर्माता-निर्देशक प्रकाश मेहरा (Prakash Mehra) चर्चा में आये , वही दुसरी तरफ लेखक जोड़ी सलीम खान और जावेद अख्तर के मांस की उदगिन्ताओ को पर्दे पर अपेक्षित और अनुकूल चित्रण का अवसर भी मिला था क्योंकि उन्हें उनकी धार को ओर भी चमक प्रदान करने के वास्ते अब फिल्म उद्योग में एंग्री यंगमेन अमिताभ बच्चन का पदार्पण हो चूका था |

सलीम-जावेद ने आगे चलकर अमिताभ के किरदारों के बहाने अपनी बैचनियो का विशिष्ट प्रकटीकरण किया | जाहिर है कि “जंजीर” प्रकाश महरा (Prakash Mehra) की प्रस्तुति है इसलिए भ्रष्टाचार के विरोध में उबले गुस्से का आधुनिक जनक उन्हें ही माना जाता है | परन्तु “जंजीर” से पहले ही प्रकाश मेहरा (Prakash Mehra) अपना फ़िल्मी करियर प्रारम्भ कर चुके थे | उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बिदनौर में 13 जुलाई 1939 को हुआ था और वह सन 1958-59 में विष्णु सिनेटोन में धीरुभाई देसाई के सहायक रहे |

प्रकाश मेहरा (Prakash Mehra) ने साठ के दशक में कई गीत भी लिखे | कहते है वो पहले गीतकार बनना चाहते थे परन्तु बन गये निर्देशक | उनकी आरम्भिक फिल्म है “हसीना मान जायगी” (1968) , मेला (1971) ,कुँवारा (1973)| उल्लेखनीय है कि प्रकाश मेहरा सातवे और आठवे दशक के महत्वपूर्ण फिल्मकार है और चूँकि ये दशक अमिताभ के दशक माने गये है इसलिए स्वाभाविक तौर पर प्रकाश मेहरा ने अमिताभ के साथ कई सफल फिल्मे बनाई |

हेराफेरी (1976),  मुक्कदर का सिकन्दर (1978) , लावारिस (1981) ,नमक हलाल (1982), शराबी (1984) जैसी सफलतम फिल्मे उन्ही की देन है | उनकी अन्य फिल्मे भी कम महत्वपूर्ण नही है  मसलन हाथ की सफाई (1974), खलीफा (1976), आखिरी डाकू (1978), देशद्रोही (1980), ज्वालामुखी (1980) , मुकद्दर का फैसला (1987) , मुहब्बत के दुश्मन (1988), जादूगर (1989) , जिन्दगी एक जुआ (1992 )आदि |

वस्तुतः प्रकाश मेहरा (Prakash Mehra) का सिनेमा मनोरंजन के सफल फ़ॉर्मूले का सिनेमा है | दर्शक आखिर क्या देखना पसंद करते है इस बात को प्रकाश मेहरा बखूबी समझते है | केवल अमिताभ बच्चन ही नही , शत्रुघ्न सिन्हा और विनोद खन्ना की प्रतिभा का भी प्रकाश मेहरा की फिल्मो में बेहतरीन उपयोग हुआ है | वह नायक को आम आदमी की संवेदनाओ से लैस तो रखते थे लेकिन उनका नायकत्व विशिष्ट होता था | और जब महान सा दिखने वाला नायक प्रतिरोधी शक्ति को परास्त करता है तो दर्शक तालियाँ बजाये बगैर नही रह पाते थे |

प्रकाश मेहरा (Prakash Mehra) कद्दावर किरदारों को तरजीह देते थे | यह विशेषता पारसी रंगमंच की देन थी जिसमे सामान्य कदकाठी के अभिनेताओं का कोई वजूद नही होता था | प्रकाश मेहरा ने इस परम्परा को सिनेमा के पर्दे पर आगे बढाया | अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना बारम्बार उनकी फिल्मो के नायक इसलिए बनते रहे है | प्रकाश महरा समझते थे कि दर्शक फिल्मे महज दुखो को महसूस करने के लिए नही आते वरन चमत्कृत कर सकने जैसी शक्ति को देखने आते है , भावुकता के साथ साथ साहस और पराक्रम का नाटक देखने आते है |

प्रकाश मेहरा (Prakash Mehra) समझते थे कि दर्शको को बस अपना सा लगने वाला नाटक दिखना चाहिए | “शराबी” का अंदर से दुखी किन्तु बाहर से हंसोड़ किरदार हो या “मुक्कदर का सिकन्दर” का साहसी किन्तु भीतर से टूटे दिल वाला किरदार या फिर लापरवाह “लावारिस” जिसके भीतर उबलता हुआ उपेक्षा भाव का लावा – वास्तव में ऐसे किरदार और अति नाटकीय प्रभाव दर्शको के दिलो दिमाग को झकजोर कर रख देते थे और यही प्रकाश महरा के फिल्मो की सबसे बड़ी ताकत थी | 17 मई 2009 को इस महान फिल्मकार का देहांत हो गया |

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here