Ram Singh Kuka Biography in Hindi | गुरु रामसिंह कुका की जीवनी

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Ram Singh Kuka Biography in Hindi
Ram Singh Kuka Biography in Hindi

पंजाब केसरी महाराजा रणजीतसिंह का अचानक देहांत हो गया | उनके मरते ही अंग्रेजो ने उस स्तिथि का लाभ उठाया | एक साल में पुरे पंजाब की धरती सिक्खों के रक्त से रक्त-रंजित हो गयी | उस समय सिक्खों ने जिस वीरता का प्रदर्शन किया वह अविस्मरनीय है किन्तु नेताओं के विश्वासघात के कारण पंजाब 1757 में अंग्रेजो के अधीन हो गया | सारा भारत फिरंगियों के विरुद्ध संघठित हो रहा था परन्तु पंजाब की ओर किसी ने ध्यान नही दिया | पंजाब के लोग महाराजा और उनके बाद महाराजा दलीपसिंह के साथ किये गये दुर्व्यवहार से बहुत दुखी थे |

कोई कल्पना भी नही कर सकता था कि पंजाब 10 वर्ष बाद स्वतन्त्रता आन्दोलन में विभीषण बन जाएगा | पंजाब के क्रान्तिकारियो को उन्ही के संबधियो ने मारा था परन्तु 1915 में इस दाग को पंजाब के युवको के धोया | कई युवको ने अपनी कुर्बानी दी और जेलों में असहनीय वेदना सहते हुए हंसते हंसते फांसी पर चढ़ गये | सबसे पहले क्रांतिकारी दल का नाम “कुका” था | इसका नेता रामसिंह (Ram Singh Kuka) 1824 ईस्वी में बैना कस्बे जिला लुधियाना में एक खाती परिवार में पैदा हुआ था |

रामसिंह (Ram Singh Kuka)  , महाराजा रणजीतसिंह की सेना में एक सैनिक था | वह अपना अधिकतर समय पूजा-पाठ में व्यतीत करता था और अपने सैनिक कर्तव्यो को नही निभा रहा था अत: वह सेना की नौकरी छोडकर गाँव में भजन-भक्ति करने लगा | वह कुछ दिनों में प्रसिद्ध हो गया और उसके पास दूर दूर से लोग आने लगे | उसने सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया | वह अपने धार्मिक उद्देश्यों के सह साथ राजनितिक स्वतन्त्रता की बाते भी कहने लगा |

रामसिंह (Ram Singh Kuka) ने कहा था कि यह समय कोई मौज-मस्ती या धार्मिक बातो का नही बल्कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए विप्लव करने का है | उन्होंने “नामधारी” नाम का नया पन्थ शुरू किया | इसका उद्देश्य सब तरह के आडम्बर छोडकर केवल भगवान का नाम लेना चाहिए | गुरु रामसिंह ने असहयोग आन्दोलन शुरू किया | उन्होंने अपने अनुयायियों को अंग्रेजी शिक्षा , न्यायालय , रेलवे आदि का बहिष्कार करने का आह्वान किया | उन्होंने अपनी डाक व्यवस्था का प्रबंध किया |

सरकार उनकी गतिविधियों से बौखला उठी और गुरु रामसिंह (Ram Singh Kuka) पर तथा उनके कार्यो पर प्रतिबन्ध लगा दिया परन्तु गुरु रामिसंह ने निर्भय होकर अपना गुप्त विप्लवी कार्य जारी रखा | उन्होंने पुरे प्रांत को 22 भागो में विभक्त करके 22 गर्वनर नियुक्त किये जो संघठन में एकता स्थापित करेंगे और धन संग्रह करेंगे | यह सुरक्षा बल था जो युवको को अस्त्र-शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण भी देता था | कुछ ही समय में वह धार्मिक-राजनितिक संघठन बहुत शक्तिशाली बन गया | बाहरी रूप से उनके सादे जीवन को देखकर सरकार को उन पर संदेह नही हुआ |

1869 में उन पर लगाये गये प्रतिबन्ध हटा दिए गये | प्रतिबंधो के हटने से क्रान्तिकारियो में नया उत्साह सम्पन्न हुआ | सब लोग उत्साहित थे | गौ-रक्षा उनका उद्देश्य और आदर्श था | सन 1871 ने कुछ कुका अमृतसर की ओर जा रहे थे | मार्ग में गाये ले जाते हुए कुछ कसाइयो से टक्कर हो गयी सब कसाई मारे गये | अमृतसर के सब मुख्य हिन्दू पकड़ लिए गये | यह समाचार गुरु रामसिंह (Ram Singh Kuka) के पास पहुचा | उन्होंने तुरंत अपराधियों को न्यायालय में जाकर आत्मसमपर्ण करने का आदेश दिया जिसका पालन हुआ | इससे लोगो पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा | सरकार गुरु का लोगो पर प्रभाव सहन नही क्र पायी |

13 जनवरी 1872 को भैनी में माही मेला था जहा हजारो कुका जा रहे थे | रस्ते में मालेर कोटला मुस्लिम रियासत में एक कुक का विवाद हो गया और उसको बुरी तरह पीटा गया और उसके सामने ही एक गाय का वध किया गया | उसने यह दुःख भरी कथा कुका अधिवेशन में जाकर सुनाई | यह सुनकर लोग क्रोधित हो गये | उन्होंने गुरु से कहा कि उसी दिन से क्रांतिकारी गतिविधिया आरम्भ की जाए परन्तु बिना तैयारी के गुरु ने यह कदम उठाने को मना कर दिया | उसने अपनी पगड़ी रखकर लोगो को ऐसा न करने के लिए मना किया |

अधिकतर लोग उनकी बात मान गये थे परन्तु 154 व्यक्तियों ने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया | गुरु ने सोचा कि यह अच्छा अवसर है कि जब वह गुप्त रूप से अपनी गतिविधिया चलाते रह सकेंगे | अत: उन्होंने पुलिस को सूचित किया कि उन लोगो के कामो का उत्तरदायित्व उनका नही होगा | बाद में उन विद्रोहियों ने मालान्ध के किले पर आक्रमण करके एक तोप ,कुछ तलवारे एवं घोड़े अपने कब्जे में ले लिए | किले के सामन्तो ने उनकी पुरी सहायता करने का आश्वासन दिया परन्तु बाद में उन्होंने इनको अपरिपक्व समझकर सहायता देने से मना कर दिया |

15 जनवरी 1872 को इन विद्रोहियों ने मलार कोटला पर आक्रमण कर दिया और राजमहल तक जा पहुचे | वहा उनका सैनिको से घमासान युद्ध हुआ और विप्लवी लोगो को पीछे हटना पड़ा | सरकार की सेना ने उनका पीछा किया और 68 विद्रोही पकड़े गये | लुधियाना के डिप्टी कमिश्नर की आज्ञा से 17 जनवरी 1872 के दिन 49 विद्रोहियों को उड़ा दिया गया | उनके साथ पचासवा एक 13 वर्ष का बच्चा था | उसके सामने गुरु रामसिंह को गालिया देते हुए उससे पूछा कि तुम यह अगर यह कह दोगे कि रामसिंह के शिष्य नही हो तो तुम्हे नही उड़ाया जाएगा |

बच्चे को सैनिको ने पकड़ रखा था परंतु वह किसी तरह उनसे छुट गया और उसने गुरु को गाली देने वाले अंग्रेज क्राउंस की ढाढी पकड़ ली और जब उसने किसी तरह ढाढी नही छोड़ी तो उसके दोनों हाथ काट दिए गये और उसकी हत्या कर दी गयी | 18 जनवरी 1872 को बाकी विद्रोहियों कको फाँसी दी गयी | तोपों के मुंह पर बांधे जाने या फांसी पर चढ़ते समय उनके मुख पर प्रसन्नता थी | इन विद्रोहियों ने अपनी मातृभूमि और आदर्शो पर बलिदान होकर पंजाब का गौरव बढाया | उसके बाद गुरु रामसिंह (Ram Singh Kuka) को बंदी बनाकर रंगून भेजा गया जहा 1885 में उन्होंने अंतिम साँस ली | मातृभूमि पर बलिदान होने वाले इन वीरो के त्याग और बलिदान को भुलाया नही जा सकता|

2 COMMENTS

  1. Sry to say but satguru ram singh g is alive.. Kisi ne unko antim sans lete huye nhi dekha.. He is supreem power.. So last line ko is artical c remove kar k ye likha jaye ki rangoon k kile c vo aloop ho gye.. Know body knows ki vo is time kidher hai but vo hai…

  2. अंग्रेजों को निकालने वाले नामधारी ही थे और ‘गांधी’ सतिगुरु राम सिंह जी के पदचिन्हों पर चले थे

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