Ramesh Krishnan Biography in Hindi | रमेश कृष्णन की जीवनी

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Ramesh Krishnan Biography in Hindi
Ramesh Krishnan Biography in Hindi

जाने माने टेनिस खिलाड़ी रमेश कृष्णन (Ramesh Krishnan) 5 जून 1961 ई. को मद्रास में जन्मे थे | वे अपनी कमजोरी से भली भाँती परिचित थे और उसे स्वीकारने में जरा भी शर्म महसूस नही करते थे | ये अपने पिता से काफी प्रभावित थे | ये सचमुच में एक राष्ट्रभक्त खिलाड़ी थे | इन्होने अपने यशस्वी पिता की भाँती हमेशा डेविस कप मैचो में अपना सब कुछ दांव पर लगाकर राष्ट्रीय गौरव को शिखर पर पहुचाकर देशवासियों को गौरवान्वित कर दिया |

कृष्णन (Ramesh Krishnan) के लिए राष्ट्र सर्वप्रथम था | वे जानते थे कि जरा सी चुक का मतलब होगा ,भारतीय अप्रतिष्टा और सारा दोष उनके सर जाता | अनुभव उनके पास था ही , लेकिन अपने से 11 साल छोटे खिलाड़ी के वे एक अनुभवी खिलाड़ी थे तथा वे अपने से 11 वर्ष छोटे खिलाड़ी से अधिक फुर्तीले थे यूँ भी रमेश प्राय: चुस्त ,कलात्मक खेल खेलते आये है यदि रामनाथन कृष्णन , विजय अमृतराज ,समन्त मिश्रा ,अख्तर अली और जयदीप मुखर्जी ने गिल्बर्ट के विरुद्ध रमेश की जीत को उनके करियर की सर्वश्रेष्ट विजय माने जाते थे , जिससे विपक्ष में किसी प्रकार का मतभेद आवश्यक नही है | यूँ तो रमेश ने कुछ एक अवसरों पर टॉप शीर्ष खिलाडियों को भी पराजित किया है लेकिन इस जीत का एक अलग ही स्थान है |

रमेश काफी अनुभवी थे उन्होंने सही टाइमिंग ,सटीक प्लेसिंग , क्लासिक टच और पुरी तरह पेशेवर तकनीक अपनाकर अपने से कही तेज तरार खिलाड़ी को पांच सेटों में परास्त किया और इस धारणा को गलत साबित कर दिया कि अब लम्बी पारिया खेलने और पांच सेटों तक झूझने का मादा उनमे नही बचा है | कृष्णन अपने पिता की बराबरी तो नही कर सके परन्तु 1977 ई. के दौरान सोलह साल की उम्र में राष्ट्रीय चैंपियन बनने से लेकर पुरे करियर में कई बार बेहतरीन प्रदर्शन कर सबको मन्त्रमुग्ध कर दिया |

अंतर्राष्ट्रीय टेनिस मानचित्र में सन 197’9 ई. में रमेश ने तहलका मचाते हुए पदार्पण किया था तथा विंबलडन एवं फ़्रांसिसी प्रतियोगिताओं में जूनियर खिताब जीतकर विश्व के सर्वश्रेष्ठ जूनियर खिलाड़ी कहलाने का गौरव प्राप्त किया | विंबलडन फाइनल में अमेरिका के डेविड सीमलर को हटाकर रमेश ने अपने पिता की बराबरी की | टेनिस पेशेवर रैंकिंग 1983 ई. के दौरान रमेश का 84वा स्थान प्राप्त था जबकि अगले साल पहले पचास में आ गये | 1985 ई. के ऑस्ट्रेलियाई ओपन प्रतियोगिता में उन्हें 11वा स्थान दिया गया | वे दो बार 1981 ई.तथा 1986 ई. में अमरीकन ओपन एवं 1986 ई. में विम्बल्डन क्वार्टर फाइनल में प्रवेश पाया था |

सन 1986-87 ई. में रमेश (Ramesh Krishnan) ने टोकियो तथा हांगकांग के शीर्षस्त खिलाडियों को हराकर खिताब अपने नाम किया | हांगकांग में जिमी कार्नर्स ,पेटकेश और आंद्रेई गोमेज जैसे दिग्गजों को लगभग अप्रत्याक्षित हार का सामना करना पड़ा | दो साल पश्चात न्यूजीलैंड ओपन में इजराइल के आमोस मंसफोर्ड को पराजित किया और एक ओर ख़िताब रमेश को प्राप्त हुआ | रमेश ने सन 1989 के दौरान ऑस्ट्रेलिया ओपन में विश्व के आप सीड मैट्स विलेंडर का खिताब जीतने का सपना दुसरे ही राउंड में तोड़ दिया लेकिन अगले राउंड में खुद रमेश भी मक्सिको के एक अनजान खिलाड़ी से हारकर बाहर हो गये | ऐसा उनके साथ अक्सर होता रहा है | उन्होंने कई जाने-माने खिलाडियों को पराजित किया पर स्थिर प्रदर्शन न कर पाने के कारण अगले ही क्षण हार का सामना भी करना पड़ा |

रमेश (Ramesh Krishnan) डेविस कप के मैचो में कोई ग्रैंड स्लैम अपने नाम तो नही कर पाए परन्तु उनका प्रदर्शन हमेशा रोचक और प्रशसनीय रहा है | जाहिर है देश के लिए खेलने का जज्बा उनमे कूट कूट कर भरा है | विजय अमृतराज उनके सहयोगी के रूप में खेला करते थे | 1987 ई. के डेविस कप में ऑस्ट्रेलिया को उसी के घर पर हराने का पराक्रम दिखाने वाला भारत तीसरा देश था | जॉन फिट्जेराल्ड और वाली मंसूर जैसे श्रेष्ट वरीयता के खिलाडियों पर पर रमेश की जीत ने दुनिया के सामने भारत का नाम रोशन किया |

रमेश (Ramesh Krishnan) बनावटी तथा अक्खड़पन से कोसो दूर थे | आज के खिलाडियों जैसे तेवर और नाज नखरो से वे हमेशा ही दूर रहे जिसके कारण उन्हें प्राय:सुस्त और बोझिल खेल खेलने वाला खिलाड़ी भी माना जाता रहा है लेकिन इस आलोचना में ही उनके खेल की खूबसूरती मानी जाती है जो कि जब भी उभर कर आई अच्छे अच्छे खिलाडियों को उनके सामने हथियार डालने पड़े | खेल विशेषज्ञो के अनुसार यदि रमेश की सर्विस बुलेट के समान होती तो वे एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के महान खिलाड़ी माने जाते | वे खुद अपनी कमजोरी स्वीकारते है किन्तु तीक्ष्ण बुद्धि , संयम और धैर्य की पूंजी तो उनके पास थी ही | मैनकरो जैसे तेवर , बेकर जैसी चपलता , अगासी जैसा व्यक्तित्व और कुरियर एवं संप्रास जैसी सर्विस का उनके पास अभाव था परन्तु इस बात से नकारा नही जा सकता है कि रमेश के पास जो कुछ भी था वह विरलों के पास होता है | देश एवं खेल भावना उनके रग रग में बसी थी |

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