Rani Gaidinliu Biography in Hindi | नागा स्वतंत्रता सेनानी रानी गाईडील्यू की जीवनी

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Rani Gaidinliu Biography in Hindi
Rani Gaidinliu Biography in Hindi

मणिपुर के महाराजा भाग्यचन्द्र का 1798 ईस्वी में देहांत हो गया और उनके आठ पुत्रो में परस्पर सिंहासन के लिए संघर्ष शुरू हो गया | उसके चतुर्थ पुत्र मारजीत ने सिंहासन न मिलने के कारण 1812 ईस्वी में म्यांमार के राजा से संधि की और उसको सिंहासन प्राप्त हो गया | कुछ समय बाद उसने म्यांमार के राजा का आदेश मानने से इनकार कर दिया | म्यांमार के सेनापति बन्दुला ने 1819 ईस्वी में मणिपुर पर आक्रमण कर दिया | मारजीत भागकर कछार चला गया |

म्यांमार की सेना ने मणिपुर पर अधिकार कर लिया और जनता पर भयंकर अत्याचार किये | उन्होंने लोगो को घरो में बंदी करके जीवित जला दिया | हथेलियों में छेद करके रस्सी डालकर पशुओ के समान खींचा |स्त्रियों को बेआबरू किया गया | महामारी भी फ़ैल गयी , जनता जो बच गयी थी उसने पड़ोसी राज्यों में जाकर शरण ली | 1819 से 1826 ईस्वी के बीच के सात वर्ष मणिपुर के इतिहास में विनाश लीला के नाम से जाने जाते है | इन सात वर्षो में कृषि बर्बाद हो गयी , खेतो में घास उग गयी | मणिपुर के महाराज कुमार गम्भीर सिंह ने अंग्रेजो से संधि कर ली और म्यांमार की सेना को मणिपुर से निकालने में समर्थ हुए |

24 फरवरी 1826 को म्यांमार के साथ यादाम्बू संधि हुयी | 1833 ईस्वी में गम्भीरसिंह और अंग्रेजो के बीच व्यापारिक संधि हुयी और 1835 ईस्वी में मणिपुर में पहला अंग्रेज पोलिटिकल एजेंट नियुक्त किया गया | मणिपुर का पर्वतीय क्षेत्र प्रशासन 1891 से दरबार के अध्यक्ष एवं ICS अंग्रेज अधिकारी के जिम्मे हो गया |मणिपुर के पर्वतीय क्षेत्र में जनजातीय लोग रहते हाउ जो स्वभाव से ही स्वतंत्र प्रवृति के है और उनके समाज में प्रजातांत्रिक प्रणाली का प्रचलन है | अंग्रेजो ने उनके साथ गुलामो जैसा व्यवहार करना शुरू किया तो कबुई जनजाति के ज्ड़ोनाद ने उनके विरुद्ध विद्रोह कर दिया किन्तु उसको 1931 ईस्वी में न्याय पर फांसी दी गयी उसको फाँसी देने के पश्चात उसकी शिष्या एवं चचेरी बहन गाईडील्यु ने उस धार्मिक एवं राजनितिक क्रान्ति की बागडोर सम्भाल ली |

गाइन्दिल्यु का जन्म 26 जनवरी 1919 के दिन नुड्काओ गाँव के कबुई परिवार में हुआ | इनके पिता का नाम लोत्तनोहोड़ था और माता का नाम कलोतनेनल्यु था | बचपन में गाइन्द्ल्यु के वीरतापूर्ण कार्यो को देखकर गाँव की स्त्रियों को आश्चर्य होता था | उसका बचपन गाँव में सामान्य लडकियों जैसे ही बीता | बारह वर्ष की होने पर गाईदिल्यु को सपने में ज्डोनाद के पास जाने की देवी आज्ञा हुयी | उसको सपने में जदोनाद मन्दिर में पूजा करता हुआ दिखाई देता |

उस समय तक वह ज्ड़ोनाद के सामजिक एवं धार्मिक कार्यो के विषय में बहुत कुछ सुन चुकी थी | जदोंनाड यों तो चचेरा भाई था मगर काम्बीरोन में रहता था इसलिए कभी उसे देखा नही था | आखिर देवी प्रेरणा से वह काम्बीरोन गई | जदोनाड ने भी गाइन्दिल्यु को सपनों में देखा था | दोनों ने एक दुसरे को पहचान लिया | जदोंनाड ने भी बारह वर्ष की गाइन्दिल्यु की प्रतिभा को पहचान लिया | जब बारह वर्ष की बालिका जडोनाद के पास पहुची तब वह 22 वर्ष का था |

जदोनाड उस समय तक अंग्रेजो को देश से निकालने का एवं पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त करने का निश्चय कर चूका था | उसने गाइन्दिल्यु को सशस्त्र क्रान्ति के लिए कुबइ महिलाओं के प्रशिक्ष्ण  का काम सौंपा | बारह वर्ष की यह किशोरी जदोंनाड के सामाजिक , धार्मिक एवं राजनितिक कार्यो में हाथ बंटाने लगी | वह जदोंनाड़ का दांया हाथ बन गयी | यदि जदोंनाद कबुई क्रान्ति का नेता था तो गाइन्दिल्यु उसकी सेनापति थी | अंग्रेजो ने मणिपुरी व्यापरियों की हत्या का आरोप लगाकर सन 1931 में जदोंनाड़ को फाँसी दे दी |

गाइन्दिल्यु को 16 वर्ष की आयु में क्बुई क्रान्ति की बागडोर सम्भालनी पड़ी | 1914 से कबुई क्षेत्र में ईसाई धर्म का प्रचार आरम्भ हो चूका था | जदोंनाड ने इसाईकरन का भी विरोध किया था | जदोनाद बेगार के भी विरुद्ध था | अंग्रेजो द्वारा अपनी जाति के लोगो पर अन्याय एवं अत्याचार से उसका खून खौल उठता था | उसने अपने आदिम धर्म को “हराका” धर्म का नाम दिया तथा फादर पेटीग्रियु द्वारा भोले भाले जनजातीय लोगो को इसाई बनाने का घोर विरोध किया | जडोनाद बेगार के विरुद्ध था अब गाइन्दिल्यु “हराका” नामक धर्म की आध्यात्मिक गुरु एवं संचालिका बनकर इसाईकरण का विरोध कर रही थी |

जदोनाद को पकड़ने के बाद अंग्रेज मानते थे कि जब तक गाइन्दिल्यु नही पकड़ी जायेगी क्बुई क्रान्ति का अंत नही हो सकता | यदि उस समय राजतन्त्र और कांग्रेस ने इनका साथ दिया हॉट अतो 1963 में नागालैंड नही बनता क्योंकि इनका उद्देश्य स्वतंत्र नागाराज की स्थापना था | इनका यह स्वप्न अंग्रेजो की कुटनीतिक चाल से टूट गया | उसको पकड़ने के लिए 500 रूपये के पुरुस्कार की घोषणा की गयी कबुई गाँवों में नम्बरदारो (लम्बू) की नियुक्ति कर दी गयी |

लम्बू (नम्बरदार) लोगो को गानिन्दिल्यु के चाचा के घर नुद्काओ भेजा गया | एक लम्बू ने उसके चाचा से कहा कि यदि गाई दिल्यु मुझसे विवाह कर ले तो उसको अंग्रेज सरकार माफ़ कर देगी | गाइन्दिल्यु ने ल्म्बुओ से कहा कि मै भोजन करके चलने को तैयार हो | वह भोजन करने घर में गयी और लौटकर नही आयी | बाद में सुना गया कि वह जदोनाद के शुरू किये गये अवज्ञा आन्दोलन का संचालन कर रही है | उसने बारह वर्ष की उम्र से ही देश को स्वतंत्र कराने के वचन से विवाह कर लिया था ऐसे में वह लम्बू के प्रस्ताव को कैसे मानती ?

गाइन्दिल्यु को पकड़ने के लिए असम राइफल्स को भेजा गया | अत्याचार एवं अन्याय की कभी न भूली जाने वाली कहानी शुरू हुई | कुबाई बस्तियों को जला दिया | कई लोगो को मौत के घाट उतार दिया गया | स्त्री-पुरुषो को असहनीय यातनाये दी गयी उनको गाँवों से बाहर नही निकलने दिया ,जिससे वे भूख और प्यास से मर जाए | स्त्रियों और किशोरियों का अपमान किया गया | कबूई गाँवों में सैनिको ने चारो ओर से घेर लिया | उनके अन्न भंडारों को जला दिया जिससे वे भूखे मर गये | इन गाँवों में पानी का स्त्रोत भी बाहर ही होते है | उन्हें जलस्त्रोतों तक पहुचने नही दिया गया जिससे प्यास से भी लोग मरे एक वर्ष तक आतंक फ़ैलाने के लिए यह दमन-चक्र चला |

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