Rani Laxmi Bai Biography in Hindi | रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी

रानी लक्ष्मीबाई (Rani Laxmi Bai) ने देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | इनको स्वतंत्रता संग्राम के शौर्य और त्याग का प्रतीक माना जाता है | इनके साहस और तेजस्व की प्रशसा अंग्रेजो ने भी की थी | इनके वीरता और बहादुरी के किस्से से कोई भी व्यक्ति अछूता नही है | 16 नवम्बर 1835 को बनारस में मोरोपंत ताम्बे एवं भागीरथी बाई की पुत्री के रूप में लक्ष्मीबाई (Rani Laxmi Bai) का जन्म हुआ | उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था पर प्यार से लोग उन्हें मनु कहकर पुकारते थे | लक्ष्मीबाई का बचपन नाना साहब के साथ कानपुर में बिठुर में ही बीता | लक्ष्मीबाई की शादी झांसी के राजा गंगाधर राव से हुयी | 1835 में अपने पति गंगाधर राव की मौत के बाद रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी का शासन सम्भाला पर अंग्रेजो ने उन्हें और उनके दत्तक पुत्र को शासक मानने से इंकार कर दिया |

अंग्रेजी सरकार ने रानी लक्ष्मीबाई (Rani Laxmi Bai) को पांच हजार रूपये मासिक पेंशन लेने को कहा पर महारानी ने इसे लेने से मना कर दिया | पर बाद में उन्होंने इसे लेना स्वीकार किया तो अंग्रेजी हुकुमत ने यह शर्त जोड़ दी कि उन्हें अपने स्वर्गीय पति के कर्ज को भी इसी पेंशन से अदा करना पड़ेगा अन्यथा यह पेंशन नही मिलेगी | इतना सुनते ही महारानी का स्वाभिमान ललकार उठा और अंग्रेजी हुकुमत को उन्होंने संदेश भिजवाया कि जब मेरे पति की उत्तराधिकारी न मुझे माना गया और न मेरे पुत्र को तो फिर इस कर्ज के उत्तराधिकारी हम कैसे हो सकते है ?

उन्होंने अंग्रेजी हुकुमत को स्पष्टता से बता दिया कि कर्ज अदा करने की बारी अंग्रेजो की है न कि भारतीयों की | इसके बाद घुड़सवारी और हथियार चलाने में माहिर रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रिटिश सेना को कड़ी टक्कर देने की तैयारी आरम्भ की और उद्घोषणा की कि “मै अपनी झाँसी नही दूंगी” | रानी लक्ष्मीबाई द्वारा गठित सैनिक दल में तमाम महिलाये शामिल थी | उन्होंने महिलाओ की एक अलग ही टुकड़ी “दुर्गा दल” नाम से बनाई थी | इसका नेतृत्व कुश्ती , घुडसवारी और धनुर्विद्या में माहिर झलकारी बाई के हाथो में था | झलकारी बाई और मूंदर सखियों ने भी रणभूमि में अपना खूब कौशल दिखाया | अपने विश्वसनीय चार-पांच घुड़सवारों को लेकर कालपी की ओर बढी | अंग्रेज सैनिक रानी का पीछा करते रहे | कैप्टन वाकर ने उनका पीछा किया और उन्हें घायल कर दिया |

22 मई 1857 को क्रान्तिकारियों को कालपी छोडकर ग्वालियर जाना पड़ा | 17 जून को फिर युद्ध हुआ | रानी के भयंकर प्रहारों से अंग्रेजो को पीछे हटना पड़ा | महारानी की विजय हुयी लेकिन 18 जून को ह्यूरोज स्वयं युद्धभूमि में आ डटा | लक्ष्मीबाई (Rani Laxmi Bai) ने दामोदर राव को रामचन्द्र देशमुख को सौंप दिया | उसके बाद वह आगे बढी | इस युद्ध में भीषण खून-खराबा हुआ | रानी का घोडा क्षत-विक्षत हो गया | कर्नल स्मिथ की सैन्य टुकड़ी उनका पीछा करती रही | रानी घोडा बदलकर निर्भीकता से तलवार थामे अंग्रेजो के सिर कलम करती रही पर सामने एक नाला आ गया |

नया घोडा नाला देखकर ज्योही अड़ा , पीछा करते हुए शत्रु सैनिक पास आ गये | एक अंग्रेज सैनिक ने रानी लक्ष्मीबाई के सिर पर तलवार से हमला किया और वह बुरी तरह जख्मी हो गयी | उनके सिर का दाहिना भाग कट गया और आँख बाहर निकल आयी | घायल होते हुए भी उन्होंने उस अंग्रेज सैनिक का काम तमाम कर दिया और फिर अपने प्राण त्याग दिए | मरते दम तक वह अंग्रेजो की पकड़ से बाहर रही | 18 जून 1857 को बाबा गंगादास की कुटिया में जहां इस वीर महारानी ने प्राणांत किया वही उनके सहयोगियों ने चिता बनाकर उनका अंतिम संस्कार कर दिया |

वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई (Rani Laxmi Bai) का बलिदान स्वतंत्रता संग्राम में ऐसी आहुति डाल गया जो 1947 के बाद ही खत्म हुआ जब देश आजादी का तिंरगा झंडा फहरा रहा था | लक्ष्मीबाई (Rani Laxmi Bai) ने कम उम्र में ही साबित कर दिया कि वह न सिर्फ बेहतरीन सेनापति बल्कि कुशल प्रशासिका भी है | वह महिलाओं को अधिकार सम्पन्न बनाने की भी पक्षधर थी | उन्होंने अपनी सेना में महिलाओं की भर्ती की थी | झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अज / भी हम सबको शौर्य और साहस की प्रेरणा देती है | आज की पीढ़ी को भी उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए कि विपरीत समय में संघर्ष कैसे किया जाए | वह एक ऐसी वीरांगना थी जिन्होंने हमारी आजादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया | सच्चे रूप में रानी लक्ष्मीबाई (Rani Laxmi Bai) एक क्रान्ति का नाम है जिसे कोई बुझा नही सकता | उनको हमेशा याद किया जाता रहेगा |

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