Rutherford Biography in Hindi | परमाणु वैज्ञानिक लार्ड रदरफोर्ड की जीवनी

Rutherford Biography in Hindi

Rutherford Biography in Hindi

लार्ड रदरफोर्ड (Rutherford) का जन्म 30 अगस्त 1871 को न्यूजीलैंड के स्प्रिंगग्रोव नामक स्थान पर हुआ था | रदरफोर्ड बाल्यकाल से ही अपनी प्रतिभा का चमत्कार दिखाने लगे थे | यह होनहार बालक गणित , भौतिकी और रसायनशास्त्र में गहन रूचि प्रकट करता था | रदरफोर्ड दिन-रात पढने लिखने में ही अपना समय व्यतीत करता था | रदरफोर्ड जब 17 वर्ष की आयु के थे तो उनको विश्वविद्यालय से जूनियर छात्रवृति प्राप्त हुयी थी | उसके बाद रदरफोर्ड क्राइस्ट चर्च नामक बड़े नगर में चले गये | वहां रहकर रदरफोर्ड (Rutherford) ने बी.ए. की उपाधि प्राप्त की |

ऐसा माना जाता है कि 19वी शती का अंतिम दशक मानवता के इतिहास में महान अविष्कारों के दशक के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है | उन्ही दिनों जर्मनी के हीनरिक हर्ट्ज विद्युतचुम्बकीय तरंगो पर काम कर रहे थे | उस समय रदरफोर्ड का ध्यान इन तरंगो की ओर गया | अपने विश्वविद्यालय के तहखाने में उन्होंने विद्युतचुम्बकीय तरंगे उत्पन्न करने वाले एक यंत्र का निर्माण कर दिया | इस विषय पर रदरफोर्ड ने वैज्ञानिक विवरण प्रकाशित कराए तो उस 24 वर्षीय न्यूजीलैंडवासी की ओर वहा के अनेक वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित हो गया |

यह संयोग की बात है कि उसी वर्ष रदरफोर्ड (Rutherford) को कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ,इंग्लैंड में छात्रुवृति प्राप्त हो गयी तो सन 1895 में केवेन्दिश प्रयोगशाला में कार्य करने के लिए वहां चले गये , जहां प्रसिद्ध वैज्ञानिक और इलेक्ट्रॉनिक के आविष्कर्ता जे.जे.थोमसन कायर्रत थे और उन्होंने रदरफोर्ड का हृदय से स्वागत किया | रदरफोर्ड ने कैम्ब्रिज की केवेंदिश प्रयोगशाला में रेडियोधर्मिता पर काम करना आरम्भ किया | उस अवधि में रदरफोर्ड में पाया कि विभिन्न रेडियोधर्मी पदार्थो से विभिन्न प्रकार की किरने निकलती है उन्होंने इन किरणों के नाम एल्फा और वीटा किरने रखा | इन किरणों को आज भी इसी नाम से जाना जाता है |

एक्स किरणों की सहायता से रदरफोर्ड (Rutherford) ने परमाणु के अंदर विद्यमान नाभिक का पता लगाया और फिर यह सिद्ध करके दिखाया कि परमाणु का समस्त भार नाभिक में ही निहित होता है | रदरफोर्ड सन 1907 में मेनचेस्टर विश्वविद्यालय में चले गये | ऐसा माना जाता है कि ये दिन रदरफोर्ड के जीवन में सबसे अधिक सुखमय दिन थे | सन 1908 में रदरफोर्ड को उनके रेडियोधर्मिता संबधी कार्यो के लिए रसायनशास्त्र का नोबेल पुरुस्कार प्रदान किया गया | अपने अनेक प्रयोगों के आधार पर रदरफोर्ड ने यह सिद्ध करके दिखाया था कि अल्फा किरने एक प्रकार के कण होते है जो हीलियम नाभिक के समतुल्य होते है |

उनका कहना था कि प्रत्येक पदार्थ अत्यंत सूक्ष्म कणों से बना है जिन्हें परमाणु कहते है | 19वी शताब्दी में परमाणु की आंतरिक रचना वैज्ञानिकों के लिए एक जटिल पहेली थी और इस पहेली को सुलझाने के लिए रदरफोर्ड ने महान योगदान दिया था | रदरफोर्ड ऐसे प्रथम वैज्ञानिक थे जिन्होंने प्रयोगों के आधार पर यह सिद्ध करके दिखाया कि प्रत्येक परमाणु के अंदर एक अत्यंत सूक्ष्म भाग होता है जिसे उस कण का नाभिक कहते है | रदरफोर्ड ने इस संबध में यह भी सिद्ध करके दिखाया कि नाभिक पर धनात्मक आवेश होता है |  सन 1909-1914 के मध्य रदरफोर्ड नने नाभिक का एक मॉडल भी प्रस्तुत किया था |

सन 1911 में रदरफोर्ड (Rutherford) में सोने की एक पतली पत्ती पर अल्फा किरणों की बौछार करके परमाणु में नाभिक के अस्तित्व का क्रांतिकारी विचार प्रस्तूत किया तो समस्त संसार में हलचल मच गयी किन्तु आज तो यह तथ्य सबके लिए जाना-माना तथ्य बना हुआ है कि परमाणु में नाभिक होता है किन्तु सन 1911 में तो यह विचार सर्वथा नवीन विचार माना जाता था | एक विश्वविख्यात अन्य वैज्ञानिक थे नील्स बोहर | सन 1912 में वे भी रदरफोर्ड के साथ मिलकर काम करने के लिए उपस्थित हो गये | दोनों वैज्ञानिकों में मिलकर परमाणु संबंधी खोजो को नये आयाम प्रदान किये |

सन 1914 में प्रथम विश्व युद्ध आरम्भ हो गया | इनकी प्रयोगशाळा में कार्यरत वैज्ञानिक इधर-उधर चले गये | यहाँ तक कि स्वयं रदरफोर्ड वापस केवेंदिश प्रयोगशाळा में आ गये | सन 1917 में रदरफोर्ड ने विश्व को एक नया वैज्ञानिक उपहार प्रदान किया | सर्वप्रथम उन्होंने एक तत्व को किसी अन्य तत्व में परिवर्तित कर दिखाया | एल्फा कणों की बौछार करके नाइट्रोजन परमाणुओ को ऑक्सीजन परमाणुओ में परिवर्तित कर दिखाया | इस प्रकार वैज्ञानिकों के लिए एक तत्व से दुसरे तत्व में बदलने का मार्ग प्रशस्त कर दिया | रदरफोर्ड के लिए सन 1920 बड़ा भाग्यशाली रहा | उस वर्ष उनको कैवैंदिश प्रयोगशाला का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया | सन 1920 में रदरफोर्ड ने नाभिक का नाम प्रोटोन रख दिया |

रदरफोर्ड (Rutherford) की देखरेख में कैवेंडिश प्रयोगशाला दिन दुनी रात चौगुनी प्रगति करने लगी | रदरफोर्ड धुन के धनी और लगन के पक्के वैज्ञानिक थे | काम करते हुए वे कभी थकते नही देखे गये | रदरफोर्ड सन 1925 से 1930 तक रॉयल सोसायटी के अध्यक्ष रहे | यह सब उनके वैज्ञानिक प्रयोगों के कारण ही सम्भव हो पाया था | सन 1931 में उन्हें वैरन रदरफोर्ड ऑफ़ नेल्सन का सम्मान प्रदान किया गया | सारे विश्व में रदरफोर्ड की ख्याति फ़ैल गयी | सब कुछ क्रमश: चल रहा था कि सहसा 1937 में रदरफोर्ड अस्वस्थ होकर चारपाई पर पड़ गये और कुछ ही दिनों की अस्वस्थता के उपरान्त 19 अक्टूबर 1937 को उनका देहांत हो गया |

रदरफोर्ड (Rutherford) को वेस्टमिनिस्टर एबे में दफनाया गया | यह एक बड़े आदर का स्थान माना जाता है | इसके उपरान्त रदरफोर्ड को आदर देने के लिए 104 परमाणु संख्या वाले तत्व का नाम रदरफोर्डीयम प्रस्तावित किया गया | इस तत्व के एक समस्थानिक का नाम कूर्चाटोवियम है | विश्व ने इस प्रकार इस महान वैज्ञानिक के ऋण से कुछ उऋण होने का उपक्रम किया |

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