Sanjeev Kumar Biography in Hindi | संजीव कुमार की जीवनी

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Sanjeev Kumar Biography in Hindi
Sanjeev Kumar Biography in Hindi

मोतीलाल की परम्परा के अंतिम स्तम्भ थे संजीव कुमार (Sanjeev Kumar) , जो कि Theater की पृष्टभूमि वाले स्वाभाविक कलाकार थे | संजीव कुमार ने हिंदी सिनेमा में सर्वथा पृथक छवि बनाई | सोच और संवेदना आधारित फिल्मो में अपने किरदार को चरित्र का एक ठोस स्वरूप देने वाले संजीव कुमार किसी भी तरह की भूमिका की चुनौती को स्वीकार करने वाले अदाकार थे | उन्होंने रूमानी किरदार से लेकर वृद्ध पिता के किरदार तक बखूबी अभिनय किया है |

उनका हास्य भी शुद्ध हास्य की श्रेणी में रखा जाता है जिसमे फूहड़ता नही ,स्वस्थ मनोरंजन अधिक होता है | “मनचली” “मनोरंजन” तथा “पति,पत्नी और वो ” जैसी फिल्मे इस श्रेणी में आती है | हिंदी सिनेमा में वह एकमात्र अभिनेता थे , जिन्होंने सर्वाधिक गम्भीरतम फिल्मो में सफल अभिनय किया है | थिएटर से निकलने के पश्चात वो पद्मालय एक्टिंग स्कूल से संबध हो गये | जहा उन्हें जीवन की पहली भूमिका फिल्म “हम हिन्दुस्तानी” (1960) में मिली |

बतौर नायक उनकी पहली फिल्म थी “निशान (1965)” | “संघर्ष (1968)” में वह दिलीप कुमार के साथ आये और अपनी गम्भीर प्रतिभा का लोहा मनवा गये | किन्तु स्टार कहलाये फिल्म “खिलौना (1970)” से | इसी वर्ष उनकी एक ओर फिल्म आयी  – “दस्तक” | इस फिल्म में बेहतरीनअभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरुस्कार भी मिला | इसके बाद “अनुभव (1971)” , “सीता और गीता (1972)” जैसी फिल्मो में भी वो यादगार किरदार निभाते र

आगे चलकर फिल्मकार गुलजार के सम्पर्क ने संजीव कुमार (Sanjeev Kumar) को एक कालजयी अभिनेता बना दिया | गुलजार के निर्देशन में ही उन्हें “परिचय (1972)” तथा “कोशिश (1972)” जैसी फिल्मो में अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला | इन फिल्मो में चर्चा और राष्ट्रीय सम्मान के पश्चात गुलजार-संजीव कुमार की जोड़ी की कई सफल फिल्मे आयी “आंधी (1975)” , “मौसम (1975)” “अंगूर (1981)” और नमकीन (1982) | इन फिल्मो में संजीव कुमार ने अभिनय की अविस्मरनीय कला का प्रदर्शन किया है |

1975 की ही फिल्म “शोले” में ठाकुर साहब के रूप में संजीव कुमार एक अमर कलाकार है | जया भादुड़ी के साथ उन्होंने सर्वाधिक अभिनय किया हो परन्तु जब जया के समक्ष उन्हें बुजुर्ग का अभिनय करना था फिर भी वह “शोले” में श्वसुर बनकर ही रहे | युवा संजीव कुमार “आंधी” और “शोले” के बाद “त्रिशूल”में एक बार फिर बुजुर्ग बने | कहने का आशय है कि संजीव कुमार (Sanjeev Kumar) ऐसे कलाकार थे जिन्होंने “छवि” की रूढ़ धारणा को दरकिनार करते हुए हमेशा कला और किरदार की अहमियत को सर्वोपरि समझा है |

“नया दिन और नई रात (1974)” में उनके विविध किरदारों को भला कौन विस्मृत कर सकता है ? उनकी प्रतिभा को सत्यजित रॉय जैसे फिल्मकार ने “शतरंज के खिलाड़ी” में बड़ी गहराई के साथ उभारा | सईद जाफरी और संजीव कुमार ने अपने अभिनय से “मीर” और “मिर्जा” के किरदार को जीवंत बना दिया | सन 1980 के पश्चात वह फिल्मो में कम सक्रिय रहने लगे | इसके बाद उनकी सिर्फ दो ही फिल्मे आ सकी “विधाता” और “हीरो” | दोनों ही सुभाष घई द्वारा  निर्मित |

आजीवन कुंवारे रहने वाले संजीव कुमार (Sanjeev Kumar) का दिल का दौरा पड़ने से 1985 में ही निधन हो गया | उनके निधन पर बॉलीवुड के दिग्गज कलाकारों ने टिप्पणी की कि “एक मौलिक अभिनेता चला गया” | संजीव कुमार की अन्य यादगार फिल्मे है “अनामिका ” , “आपकी कसम” , “जिन्दगी” “गृह प्रवेश” और “सिलसिला”|

 

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