सरदार वल्लभभाई पटेल की जीवनी | Sardar Vallabhbhai Patel Biography in Hindi

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Sardar Vallabhbhai Patel Biography in Hindi
Sardar Vallabhbhai Patel Biography in Hindi

सरदार वल्लभभाई पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) ने महात्मा गांधी के साथ देश को स्वतंत्र कराने के लिए लम्बे समय तक स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया ही , परन्तु उससे भी अधिक महत्व का उनका काम था स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश को संगठित रखना | 15 अगस्त 1947 को जब देश स्वतंत्र हुआ तो देश के दो टुकड़े कर दिए गये थे एक हिंदुस्तान और दूसरा पाकिस्तान | भारत वाले भाग में पांच सौ से अधिक छोटे बड़े देशी राज्य थे | अंग्रेजो ने उन्हें छुट दी थी कि वे जिधर चाहे मिल जाए |

स्थिति बड़ी नाजुक थी कुछ मुस्लिम नवाब भी थे | वे यदि पाकिस्तान से मिलने का मन बनाते तो भारत के अनेक भागो के बीच पाकिस्तान होता , स्तिथि बड़ी भयंकर होती , परन्तु सरदार पटेल के प्रयत्नों ,बुद्धिमता और कूटनीति के कारण ही सभी देशी राज्यों को भारत में मिलने पर विवश होना पड़ा | परन्तु जूनागढ़ और निजाम हैदराबाद इसमें रोड़ा बने हुए थे | निजाम के रजाकरो ने रियासत में गुंडागर्दी फैला रखी थी अंतत: सरदार पटेल को विवश होकर कार्यवाही करनी पड़ी और निजामशाही का खात्मा किया |

जूनागढ़ का मामला तो थोड़ी ही देर में हल हो गया था | सभी देशी रियासतों को भारत में मिलाने के काम में काफी रूकावटे थी परन्तु सरदार पटेल ने देश की एकता का स्वप्न साकार करने के लिए दृढ़तापूर्वक कार्य किया और अपने ध्येय में सफल हुए | यह एक ऐसा कार्य था जिसके कारण सरदार पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) को भारत का “लौह पुरुष” कहा जाता है | संसार के इतिहास में कुछ ही ऐसे महापुरुष हुए है जिन्होंने अपने देश के बिखरे हुए टुकडो को संगठित करके अपना नाम सदा के लिए अमर कर दिया |

सरदार पटेल ने बिना किसी रक्तपात के देश को संघठित रखने का कार्य कर दिखाया | सरदार पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) उन दिनों देश के उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री भी थे | कुछ लोग इस बात की शंका प्रकट करते है कि यदि यह काम सरदार पटेल के हाथ में न होता तो आज स्थिति सर्वथा भिन्न होती , जैसा कि आज कश्मीर की स्थिति है क्योंकि कश्मीर का मसला उनके पास नही था | सरदार पटेल के प्रारम्भिक जीवन की अनेक घटनाओं से प्रकट होता है कि वे निर्भीक ,साहसी और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की क्षमता वाले व्यक्ति थे |

वल्लभभाई पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) का जन्म गुजरात के बोरदस ताल्लुका के करमसद गाँव में हुआ था | वल्लभभाई के पिता झेवरभाई पटेल बड़े साहसी ,संयमी और वीर पुरुष थे | 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने अपनी तरुणाई मातृभूमि के लिए अर्पित कर दी थी | वे महारानी लक्ष्मीबाई की सेना में भर्ती होकर अंग्रेजो और उनके हिमायतियो से लड़े थे | इस प्रकार साहस और निडरता आदि गुण वल्लभभाई को घुट्टी में प्राप्त हुए थे | उनके बचपन के अनेक कारनामे इन बातो को सिद्ध करते है |

एक बार की बात है कि बचपन में उनकी बगल में एक बड़ा सा फोड़ा निकल आया | फोड़ा विषैला था और इसी वजह से वल्लभभाई स्वस्थ नही हो पा रही थे | गाँव वालो का कहना था कि लोहे की सलाख गर्म करके फोड़े को फोड़ दिया जाए तो विष निकल जाएगा और बालक स्वस्थ हो जाएगा | जब सलाख गर्म हो गयी तो भोंकने वाले का हाथ कांपने लगा कि इस बच्चे को इससे कितनी पीड़ा होही | यह देख बालक बोला “अरे भाई रुक क्यों गये ? सलाख ठंडी हो जायेगी लाओ मुझे दो” | उसके हाथ से छीन कर गर्म सलाख अपने हाथ में ले ली और फोड़ा चीर दिया |

इसी तरह की निडरता और साहस के अनेक उदाहरण उनके जीवन में मिलते है | वे दसवी कक्षा में पढ़ते थे पहले उन्होंने अन्य विषयों के साथ संस्कृत ले रखी थी परन्तु उसे याद रखने में कठिनाई होती थी इसलिए उन्होंने संस्कृत के स्थान पर गुजराती ली | मजेदार बात यह थी कि गुजराती के अध्यापक संस्कृत के भक्त थे | संस्कृत न पढने वाले लडको से वे नाराज रहते थे | वल्लभभाई जब पहली बार उनकी कक्षा में गये तो मास्टर साहब ने व्यंग्यपूर्ण कहा “पधारिये महापुरुष”

मास्टर साहब को क्या मालूम था कि उनके यह वचन एक दिन पूर्ण होने वाले है | थोड़ी देर बाद मास्टर साहब बोले “संस्कृत छोडकर गुजराती लेना तुम जैसे होनहार लडके को शोभा नही देता” | इस पर वल्लभभाई ने प्रश्न किया “पर मास्टर साहब यदि हम सबने संस्कृत ही ली होती तो आप क्या करते ?” | मास्टर जी ने लडके को बेंच पर खड़े होने का हुक्म दिया | उस दिन से गुरु-शिष्य में टक्कर होने लगी | मास्टर साहब वल्लभ भाई को परेशान करने के लिए घर से पहाड़े लिखकर लाने को कहते

कई दिन तो वल्लभभाई (Sardar Vallabhbhai Patel) पहाडे लिखते रहे | एक दिन तंग आ गये क्योंकि रोज रोज वही पहाड़े लिखने से उन्हें कोई लाभ नही होता था | यह सब वह पढ़ चूके थे और पहाड़े उन्हें याद थे सो उस दिन पहाड़े नही लिखे | गुजराती में पहाडो को पाडे कहते थे | भैंस के बच्चे को भी पाड़ा या पाडे कहते थे | कक्षा में आने पर मास्टर साहब ने पूछा “अरे तुम पाडे लाये ?”| वल्लभभाई ने चेहरे पर शराफत दिखाते हुए कहा ” सर पाडे लाया तो था पर दरवाजे से दो भडक उठे और उनके भदकते ही सारे पाडे भाग गये “|

मास्टर साहब नाराज होकर हेडमास्टर के पास पहुचे | हेडमास्टर ने वल्लभभाई को वुलाया और सारी बात पूछी | जब उन्होंने सारी बात सूनी तो उन्होंने बिना कोई सजा दिए उन्हें छोड़ दिया और कहा “ऐसा लड़का मैंने आज तक नही देखा” | नाडियाद के जिस स्कूल में वल्लभभाई पढ़ते थे वहा के एक अध्यापक की पुस्तको की दूकान भी थी | वे छात्रों को मजबूर करते थे कि सारी किताबे उन्ही की दूकान से खरीदी जाए | वल्लभभाई को यह बात अच्छी नही लगी | उन्होंने अपने साथी छात्रों को उकसाया कि कोई भी लड़का उनसे पुस्तके न खरीदे | इसी बात पर सात दिन तक स्कूल बंद पड़ा रहा और आखिर मास्टर साहब को झुकना पड़ा और हडताल खत्म हुयी | इस प्रकार नेता के गुण वल्लभभाई में आरम्भ से ही थे |

दसवी पास करने के बाद कॉलेज की शिक्षा का बोझ परिवार वाले उठा नही सकते थे इसलिए वल्लभभाई ने विलायत जाकर बैरिस्टर बनने की ठानी पर विलायत जाने के लिए इतना पैसा था ही नही | अंत में वल्लभभाई ने मुख्तारी की परीक्षा पास करके गोधरा में मुख्तारी आरम्भ कर दी | इससे आमदनी हुयी और कुछ पैसा जमा होने पर एक कम्पनी से विदेश जाने की बात चलाई पर चिट्ठी बड़े भाई विट्ठल भाई के हाथ लग गयी | उन्होंने स्वयं पहले बैरिस्टर बनने की बात वल्लभभाई से की | वल्लभभाई मान गये और जमा पूंजी बड़े भाई को दे दी |

तीन साल बाद जब वे पढकर आये तो वल्लभभाई गये | अंत में बड़े भाई ने परिवार का सारा खर्च इन पर डालकर स्वयं देश सेवा के कार्य में लग गये | वल्लभभाई (Sardar Vallabhbhai Patel) ने यह बात भी स्वीकार कर ली | वल्लभभाई उन दिनों गोधरा में वकालत करते थे | वकालत खूब चल रही थी | उधर गांधीजी का प्रवेश गुजरात की राजनीति में बढ़ता जा रहा था | गोधरा में राजनितिक कार्यो के लिए जो उपसमिति बनाई गयी , वल्लभभाई को उसका मंत्री बनाया गया | इससे वे सारे गुजरात में प्रसिद्ध हो गये | इसके बाद तो एक के बाद एक अनेक कामो में उन्हें सफलता मिलती गयी |

उन्होंने गुजरात में बेगार प्रथा बंद करवाई | यह राजनितिक जीवन में उनकी पहली विजय थी | गांधीजी से वल्लभभाई का परिचय तो बढ़ रहा था परन्तु अहिंसा और सत्याग्रह उन्हें कमजोर आदमी के हथियार प्रतीत होते थे परन्तु अहमदाबाद में मजदूरों की मांगे मान लिए जाने पर वल्लभभाई को गांधीजी के सत्याग्रह और अहिंसा पर विश्वास हो गया और वे पुरी तरह जनता की सेवा में जुट गये | इन्ही दिनों खेड़ा में फसल खराब हो गयी और किसानो के पास लगान देने को भी पैसा था |

सरकार लगान माफ़ करने से मना करती थी परन्तु जब वल्लभ भाई (Sardar Vallabhbhai Patel) ने गाँवों में घूम घूमकर किसानो को सत्याग्रह के लिए तैयार कर दिया तो सरकार को झुकना पड़ा | इससे गांधीजी वल्लभभाई पर अधिक विश्वास करने लगे | प्रथम विश्वयुद्ध के बाद देश को आजादी देनें के स्थान पर रोलेट एक्ट आया | कांग्रेस ने असहयोग का प्रस्ताव पास किया | वल्लभभाई ने बैरिस्टरी का ही परित्याग नही किया अपितु अपने बच्चो को भी विदेश में पढाई के लिए जाने से रोक दिया |

जब छात्रों ने सरकारी शिक्षा संस्थानों का बहिस्कार किया तो वल्लभभाई ने गुजरात विद्यापीठ की स्थापना की और उसके लिए धन जुटाया | 1922 में बोरसद ताल्लुका में सरकार ने लगान की दर इतनी अधिक कर दी कि जो किसानो के लिए अदा करना कठिन थी | इसके साथ ही क्षेत्र में डाकुओ का आतंक बढ़ा | वल्लभभाई ने गाँव-गाँव में स्वयंसेवक दल बनाये | डाके बंद हुए परन्तु सरकार ने नया कर लगा दिया ताकि पुलिस पर आया अधिक खर्च किसानो से वसूल किया जाए | वल्लभभाई के प्रयत्नों से यह कर वसूली भी रुकी |

इन्ही दिनों गुजरात में बाढ़ आई | वल्लभभाई ने लगान माफी के साथ बाढ़ पीडितो की सहायता के लिए सरकार से एक करोड़ पचास लाख रुपया मंजूर करवाया | इस बाढ़ के समाप्त होते ही बारडोली के किसानो की सहायता के लिए सरकार को लोहा लेना पड़ा | सरकार ने यहा के किसानो पर 30 प्रतिशत लगान बढ़ा दिया था | सरकार ने किसानो पर अत्याचार में कोई कसर न उठा रखी परन्तु वल्लभभाई के नेतृत्व में किसानो ने सरकार का डटकर मुकाबला किया और लगान की एक कौड़ी सरकारी खजाने में जमा नही हुयी |

सरकार किसानो के घर तक नीलाम करने पर उतर आयी थी पर सरदार के प्रयत्नों से सरकार को खरीददार ही नही मिलते थे | सरकार के अत्याचारों की गूंज सारे देश में पहुची | अंत में सरकार को झुकना पड़ा | इसी सत्याग्रह में सफलता के कारण वल्लभभाई (Sardar Vallabhbhai Patel) के नाम के आगे “सरदार” लिखा जाने लगा | 1929 में लाहौर कांग्रेस में पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पास हुआ और फिर सत्याग्रह एवं डांडी यात्रा का निश्चय हुआ | 7 मार्च को सरकारी आज्ञा का उल्लंघन करके भाषण करने पर सरदार को गिरफ्तार कर लिया गया | इसी तरह बम्बई सत्याग्रह में भी उन्हें गिरफ्तार किया गया |

गोलमेज कांफ्रेंस के बाद फिर सत्याग्रह आरम्भ हुआ और अनेक लोगो के साथ सरदार वल्लभभाई पटेल को फिर जेल में डाल दिया गया परन्तु स्वास्थ्य बिगड़ जाने के कारण उन्हें मियाद से पहले रिहा कर दिया गया | उसके बाद कांग्रेस और सरकार में समझौता होने के बाद चुनाव हुए और आठ प्रान्तों में कांग्रेसी सरकारे बनी | इन कांग्रेसी सरकारों के सही ढंग से चलाने का सारा दायित्व सरकार पर ही था | गांधीजी ने 1942 में अंग्रेजो को देश छोडकर जाने को कहा तो ब्रिटिश सरकार ने सभी नेताओं के साथ वल्लभभाई (Sardar Vallabhbhai Patel) को भी गिरफ्तार करके अहमदनगर जेल में डाल दिया |

पर सरकार ने दम नही था वह खोखली हो चुकी थी इसलिए उसने घुटने टेक दिए और भारत को आजाद करने का निश्चय घोषित किया परन्तु मुस्लिम लीग ने अडंगे डालने चाहे ,सरदार ने उन्हें भी करारा जवाब दिया | सन 1946 में केंद्र में कांग्रेस मंत्रीमंडल बना | सरदार पटेल को प्रचार ,रियासतों और गृह विभाग का कार्य सौपा | देश की अन्य रियासते तो भारत में मिलने को तैयार हो गयी पर जूनागढ़ के नवाब और हैदराबाद के निजाम ने रूकावटे डाली परन्तु सरदार की बुधदिमता से वे भी सही रस्ते पर आ गये | जूनागढ़ का नवाब भाग गया और हैदराबाद पर कार्यवाही करके उसे भी भारत में मिला लिया गया |

देश की स्वतंत्रता के बाद जिस उत्साह से सरदार पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) काम कर रहे थे उसे उस समय भारी धक्का लगा जब गांधीजी की हत्या कर दी गयी | गांधीजी के बलिदान से सरदार की कमर टूट गयी | वे गांधीजी से अगाध स्नेह रखते थे | उन्हें अपना बड़ा भाई और गुरु मानते थे | अपने उत्साह के अतिरिक्त प्रेरणा उन्ही से पाते थे | गांधीजी की हत्या के बाद वे एक प्रकार से टूट से गये थे | सरदार पटेल का गुर-गम्भीर चेहरा देखकर ऐसा लगता था कि वे बहुत कठोर और निर्मम हृदय के होंगे परन्तु ऐसी बात नही थी |

देश के प्रशाशन के कार्यो के अतिरिक्त निजी मामलों में भी कर्तव्य को सर्वोपरि मानते थे | यह बात इस उदाहरण से स्पष्ट है कि एक बार वकील की हैसियत से वे आदालत में बहस कर रहे थे | उसी समय उन्हें अपनी पत्नी की मृत्यु का समाचार मिला , तब भी उन्होंने बहस जारी रखी | मृत्यु का तार पढ़ लिया और उसे मोड़ कर जेब में रख लिया | बहस समाप्त होने के बाद अदालत से विदा हुए | कर्तव्य पालन में वे जहा कठोर थे वहा उनका हृदय फुल से भी कोमल था | सरदार पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) का सबसे महत्वपूर्ण कार्य भारत की रियासतों को देश के साथ मिलाकर एक करना और खंडित न होने देना था | जूनागढ़ और हैदराबाद के मसले को जिस बुद्धिमता से उन्होंने हल किया वह अपने आपमें में प्रशासन की एक मिसाल थी |

सरदार पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) 15 दिसम्बर 1950 को स्वर्ग सिधार गये | यह समाचार जंगल की आग की तरह देश-विदेश में फ़ैल गयी | सारा देश शोक में डूब गया | सरकारी झंडे झुक गये | स्कूल ,कॉलेज ,सरकारी दफ्तर , कल-कारखाने शांत हो गये | संसद का चलता हुआ अधिवेशन रुक गया | भारत के कृतज्ञ नागरिको ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से इस दिव्य लौह पुरुष को अंतिम विदाई दी | भारत ने कृतज्ञता प्रकट करते हुए सरदार को 1991 में मरणोपरांत भारत रत्न से विभूषित किया |

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