Shambhu Nath De Biography in Hindi | हैजे रोग के विषैले तत्व के खोजकर्ता शम्भुनाथ डे की जीवनी

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Shambhu Nath De Biography in Hindi | हैजे रोग के विषैले तत्व के खोजकर्ता शम्भुनाथ डे की जीवनी विश्वभर में अनेको ऐसी बीमारियाँ है जिनका आज उपचार सम्भव है किन्तु कुछ दशक पूर्व उन पर विजय पाना कठिन था | ऐसी बीमारियों की चपेट में आकर उष्ण देशो में रहने वाले हजारो लोग मारे जाते थे | इन बीमारियों में हैजा बेहद भयानक छुत रोग है | यह रोग महामारी की भांति फैलता था करीब आधी शताब्दी पूर्व इस रोग को फैलाने वाले जहरीले तत्वों और इस रोग का उपचार खोजा गया | इस प्रसंशनीय खोज का श्रेय भारत के वैज्ञानिक शम्भुनाथ डे (Shambhu Nath De) को जाता है |

शम्भुनाथ (Shambhu Nath De) डे का जन्म 1 फरवरी 1915 को कलकत्ता के निकट गारीवाटी नमक गाँव में हुआ था | उन्होंने अपने गाँव में रहकर ही अपनी शिक्षा सम्पन्न की किन्तु उन्हें चिकित्सा विज्ञान की डिग्री प्राप्त करने के लिए कलकत्ता जाना पड़ा | यद्यपि चिकित्सा विज्ञान के अध्ययन के दौरान उन्हें छात्रवृति मिलती थी मगर उनकी आवश्कताए इससे पुरी नही हो पाती थी | उनके कॉलेज में “डे” नामक प्रोफेसर कार्यरत थे | उन्होंने शम्भुनाथ की बहुत सहायता की | यहा यह बताना आवश्यक है कि इन्ही प्रोफेसर डे की बेटी से शम्भुनाथ डे का विवाह हुआ और विवाह के बाद Ph.D. करने लन्दन विश्वविद्यालय चले गये |

शम्भुनाथ डे (Shambhu Nath De) लन्दन विश्वविद्यालय में अध्ययन करते समय कोई सफलता प्राप्त नही कर पाए वहा भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी | वही अध्ययन करते हुए उनके मस्तिष्क में हैजा रोग के विषय में समाधान खोजने की बात आई | भारत वापस आकर शम्भुनाथ डे (Shambhu Nath De) नीलरत्न सरकार मेडिकल कॉलेज में नियुक्त हो गये और हैजे रोग पर अनुसन्धान करने लगे | उनके जन्म से कई वर्ष पूर्व सन 1883 में रोबर्टकूप नामक वैज्ञानिक ने हैजे रोग पर अनुसन्धान कार्य किया था |

शम्भुनाथ डे (Shambhu Nath De) ने उनके काये के सम्बन्ध में भली-भाँती अध्ययन किया और कठिन परिश्रम करके इसका समाधान खोज निकाला | अपने क्रमबद्ध अनुसन्धानो से उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि हैजा किसी जीवाणु से नही फैलता बल्कि एन्त्रोक्सिन नामक जहरीले तत्व के कारण होता है | इस जहरीले तत्व का मानव शरीर में ही रिसाव होता है | शम्भुनाथ डे अपनी समस्या में लगे रहे और सन 1959 में उन्होंने अपनी खोजो को नेचर नामक पत्रिका में प्रकाशित किया | उनकी इन खोजो को हैजे का मूल माना जाता है |

सन 1960 में उनकी खोज को मान्यता प्राप्त हुयी और इस जहरीले तत्व एन्ट्राक्सिन के रासायनिक गुणों को समझने का प्रयास होने लगा | सं 1978 में नोबेल फाउंडेशन द्वारा हैजे पर विचार गोष्ठी की गयी और हैजे जैसी बीमारी पर निराकरण करने वाली वैक्सीन पर सारी दुनिया ने ऊँचे पैमाने पर कार्य किया | अंत में वैज्ञानिकों को इसमें भारी सफलता मिली | आज उन्ही के अनुसन्धानो के आधार पर हैजा जैसी भयानक रोग पर काफी हद तक विजय पा ली गयी है |

15 अप्रैल 1985 को 85 वर्ष की उम्र में शम्भुनाथ डे (Shambhu Nath De) का देहांत हो गया | उनकी मृत्यु तक भी उनके कार्य के संबध में चंद वैज्ञानिकों को ही पता था | उन्ही खोज के आधार पर मुंह से दी जाने वाली वैक्सीन की खोज सम्भव हो सकी थी | हालंकि ये बड़ी विडम्बना थी कि उनके जीवित रहते हुए उनके कार्यो को कभी सम्मान नही मिला | उनकी मौत पर उन्हें भारतीय वैज्ञानिकों से कोई सम्मान नही मिला | वर्तमान में गहन अध्ययन के बाद उनके कार्यो को सम्मान मिला जो कि हैजे जैसी महामारी का मूल निकालने वाले वैज्ञानिक थे |

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