Sher Shah Suri Biography in Hindi | शेरशाह सुरी की जीवनी

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Sher Shah Suri Biography in Hindi | शेरशाह सुरी की जीवनी
Sher Shah Suri Biography in Hindi | शेरशाह सुरी की जीवनी
  • शेरशाह (Sher Shah Suri) का जन्म 1472 ई. में बैजवाडा (होशियारपुर) नामक स्थान पर हसन की अफगान पत्नी के गर्भ से हुआ था
  • शेरशाह (Sher Shah Suri) के बचपन का नाम फरीद था | उसका प्रारम्भिक जीवन बड़ा ही कष्टपूर्वक व्यतीत हुआ |
  • शेरशाह के पिता हसन खां जौनपुर का एक छोटा जागीरदार था |
  • दक्षिण बिहार के सूबेदार बहार खा लोहानी ने उसे शेर मारने के उपलक्ष्य में “शेरखा” की उपाधि दी तथा अपने पुत्र जलाल खा का संरक्षक नियुक्त कर दिया |
  • शेरखां ने चंदेरी के युद्ध में मुगलों की ओर से लड़ा था और उसी समय उसने कहा था कि “अगर भाग्य ने मेरी सहायता की मै सरलता से मुगलों को एक दिन भारत से बाहर खदेड़ दूंगा”|
  • मुहम्मदशाह (बहार खा लोहानी) की मृत्यु के बाद शेरखा ने उसकी विधवा “दुदू बेगम” से विवाह कर लिया | इस प्रकार एक तरह से वह दक्षिण बिहार का शासक बन गया |
  • शेरखा ने अपने प्रबन्धन (दक्षिण बिहार से) काल में योग्य एवं विश्वास पात्र व्यक्तियों को भर्ती किया |
  • 1529 ई. में शेरखां महमूद लोदी की ओर से घाघरा के युद्ध में भाग लिया था किन्तु अफगानों की पराजय हुयी |
  • 1529 ई. में बंगाल के शासक नुसरतशाह को पराजित करने के उपरान्त शेरखां ने “हजरते-आला” की उपाधि ग्रहण की |
  • 1530 ई. में उसने चुनार के किलेदार ताजखा की विधवा “लाडमलिका” से विवाह करके न केवल चुनार के शक्तिशाली किले पर अधिकार कर लिया वरन बहुत अधिक सम्पति भी प्राप्त कर ली |
  • शेरखा ने दोहरिया के युद्ध (1532 ई.) में महमूद लोदी का साथ दिया था परन्तु वह कोई महत्वपूर्ण योगदान नही था |
  • शेरखा सोचता था कि महमूद लोदी के पतन के बाद ही वह अफगानो के नेता के रूप में उभर सकता है इसलिए वह सदैव पुरी इच्छा शक्ति के साथ अफगानों का साथ नही देता था |
  • 1534 ई. में शेरखा ने सूरजगढ़ के युद्ध में बंगाल के अयोग्य शासक महमूदशाह को 13 लाख दीनार देने के लिए विवश किया |
  • चौसा के युद्ध (1539 ई.) में हुमांयू को पराजित करने के बाद उसने शेरशाह की उपाधि धारण की | अपने नाम का खुतबा पढवाया तथा सिक्का चलाया |
  • शेरशाह (Sher Shah Suri) ने 1540 ई. में हुमांयू को कन्नौज (बिलग्राम) के युद्ध में परास्त कर दिल्ली का सिंहासन प्राप्त किया |
  • इस प्रकार उसने 1540 ई. में उत्तर भारत में सुरवंश अथवा द्वीतीय अफगान साम्राज्य की स्थापना की |
  • शेरशाह (Sher Shah Suri) ने सिंहासन पर अधिकार कर लेने के बाद उत्तर पश्चिम की ओर मुगलों के प्रवेश को असम्भव बनाने के लिए सबसे पहले पश्चिमोत्तर सीमा पर स्थित मुगलों के वफादार गक्खरो पर आक्रमण कर उसे जीत लिया |
  • किन्तु शेरशाह पूर्णरूप से से गक्खरो को न समाप्त कर सका और वे बाद तक शेरशाह का विरोध करते रहे |
  • शेरशाह (Sher Shah Suri) ने अपनी उत्तरी-पश्चिमी सीमा की सुरक्षा के लिए वहा “रोहतासगढ़” नामक सुदृढ़ किला बनवाया और हैबात खां तथा खवास खा के नेतृत्व में एक शक्तिशाली सेना को नियत कर दिया |
  • 1542 ई. में शेरशाह ने मालवा पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर दिया |
  • 1543 ई. में शेरशाह ने रायसीन पर आक्रमण कर वहां के राजपूत शासक पूरणमल को विश्वासघात करके मार डाला | इस आक्रमण के दौरान स्त्रियों ने जौहर किया |
  • रायसीन की घटना शेरशाह के चरित्र पर एक कलंक माना जाता है क्योंकि उसने धोखे से अनेक राजपूत स्त्री , बच्चो की मौत के घाट उतार दिया | इस घटना से क़ुतुबखां ने इतनी शर्म अनुभव किया कि उसने आत्महत्या कर ली |
  • 1544 ई. में शेरशाह ने मारवाड़ के शासक मालदेव पर आक्रमण किया | इस युद्ध में शेरशाह ने कूटनीति का सहारा लिया |
  • इस युद्ध में राजपूत सरदार जेता और कुंपा ने अत्यंत वीरता का प्रदर्शन किया और अफगान सेना के छक्के छुड़ा दिए |
  • शेरशाह मारवाड़ के युद्ध में राजपूतो के शौर्य से इतना प्रभावित हुआ कि उसने कहा “मै मुट्ठी भर बाजरे के लिए लगभग हिंदुस्तान का साम्राज्य खो चूका था “
  • 1545 ई. में शेरशाह ने कलिंजर पर अपना अंतिम आक्रमण किया जिसका शासक कीरतसिंह था |
  • कहा जाता है कि शेरशाह कीरतसिंह की एक नाचने-गाने वाली दासी को हथियाना चाहता था जिसे कीरतसिंह ने देने से इनकार कर दिया था | इसके अतिरिक्त कीरतसिंह ने रीवा के राजा वीरभान बघेला को शरण दिया था |
  • इस अभियान के दौरान जब वह उक्का नामक आग्नेयास्त्र चला रहा था उसी दौरान किले की दीवार से एक गोला आकर पास रखे बारूद के ढेर पर गिर पड़ा और उसमे आग लग जाने से उसकी मृत्यु हो गयी |
  • शेरशाह (Sher Shah Suri) ने मारवाड़ को छोडकर अन्य राजपूत राजाओ को उनके राज्य से वंचित नही किया वरन उन्हें अधीनता स्वीकार कराके उनके राज्य वापस दे दिए |
  • शेरशाह (Sher Shah Suri) ने बंगाल जैसे दूरस्थ एवं धनी सूबे में विद्रोह की आशंका को समाप्त करने के लिए सम्पूर्ण बंगाल को सरकारों में बाँटकर प्रत्येक को एक शिकदार के नियन्त्रण में दे दिया |
  • शिकदारो की देखभाल के लिए एक असैनिक अधिकारी “अमीन-ए-बंगला” अथवा “अमीन-ए-बंगाल” को नियुक्त किया और सबसे पहले यह पद “काजीफजीलात” नामक व्यक्ति को दे दिया |

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