Sir Syed Ahmed Khan Biography in Hindi | सर सैय्यद अहमद खा की जीवनी

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Sir Syed Ahmed Khan Biography in Hind
Sir Syed Ahmed Khan Biography in Hind

19वी सदी भारत में धर्म और समाज सुधार आन्दोलन का काल था | इस काल में राजा राममोहन रॉय , स्वामी दयानन्द , स्वामी विवेकानंद और थियोसौफिकल सोसायटी आदि के द्वारा हिन्दू धर्म और समाज में धार्मिक और सामजिक सुधारों पर बल दिया गया , वहां मुस्लमानो में सैयद अहमद बरेलवी के बहावी आन्दोलन और सैयद अहमद खां ने मुस्लिम धर्म और समाज व्यवस्था में कुरीतियों को दूर करने पर बल दिया | इनमे बहावी आन्दोलन और सर सैयद अहमद खां (Sir Syed Ahmed Khan) के विचारों और कार्यो में मुलभुत अंतर है | बहावी आन्दोलन का उद्देश्य तो यूरोपियन संस्कारो से इस्लाम की रक्षा करते हुए भारत में मुस्लमानो को पुन: इस्लाम के मूल स्वरूप के साथ जोड़ना था लेकिन सैयद अहमद खां नवीन युग के मनुष्य थे और इस्लाम की प्राचीनता के साथ संलग्न करने वाली कोई भी कड़ी उन्हें पसंद नही थी | उन्होंने तो यूरोपियन पृष्टभूमि में इस्लाम का साक्षात्कार किया था और उनका उद्देश्य इस्लाम को पाश्चात्य शिक्षा एवं विज्ञान के साथ जोड़ना था |

यूरोप एवं इसाइयत में जो भी अच्छी बाते है उन्हें वे इस्लाम के अनुकूल बताते थे | वे ब्रिटिश सरकार और अंग्रेजियत के ऐसे प्रबल भक्त थे कि उन्होंने अपने अनुयायियों को राष्ट्रीय आन्दोलन से काटकर उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति अटूट भक्ति का पाठ पढाया | समाज सुधार के क्षेत्र में भी उन्होंने सर्वाधिक प्रमुख रूप से एक ही बात पर बल दिया और वह था मुस्लिम वर्ग में पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार | अत्यधिक आकर्षक व्यक्तित्व के धनी इस व्यक्ति की भूमिका 19वी सदी के अन्य किसी भी प्रमुख भारतीय की तुलना में विवादास्पद है |

सर सैयद अहमद खां (Sir Syed Ahmed Khan) का जन्म 17 अक्टूबर 1817 ई. को दिल्ली के एक सम्मानित परिवार में हुआ था |उनके पूर्वज ईरानी सामंत थे जो शाहजहा के शासनकाल में भारत आये और उन्होंने मुगल दरबार में प्रतिष्टा प्राप्त की | सर सैयद अहमद खां में शायद बदलते हुए समय को पहचान लेने की तीव्र दृष्टि थी इसलिए पतनोन्मुख मुगल साम्राज्य से जुड़ने के बजाय उन्होंने कम्पनी शासन की सेवा में प्रवेश किया | 1857 में पदोन्नति पाकर उन्हें सब-जज का पद मिला और अंत के चार वर्ष (1878-82) के लिए वायसराय की कार्यकारिणी परिषद की सदस्यता प्राप्त हुयी | 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय उन्होंने ईस्ट इंडिया कम्पनी और अंग्रेजो के प्रति भारी वफादारी का परिचय दिया था | इससे प्रसन्न होकर कम्पनी ने उन्हें सितारे हिन्द की उपाधि से विभूषित किया | वे जीवन-पर्यन्त भारत में ब्रिटिश सरकार और ब्रिटिश सरकार के वफादार बने रहे |

धर्म के क्षेत्र में सर सैयद (Sir Syed Ahmed Khan) बहुत बड़े सुधारक थे | जवानी में उन पर बहावी विचारों का जो प्रभाव पड़ा था वह टिक नही सका और अंत में जाकर उन्होंने यह निर्णय किया कि इस्लाम को अपनी पुरानी परते तोडकर युग के अनुरूप बनना ही चाहिए | बुद्धिवाद और प्राकृतिकता उनकी दो कसौटिया थी और जो बाते इन दो कसौटियो पर खरी उतरी केवल उन्ही ही मानने के लिए उनका उपदेश था | कुरान शरीफ की उन्होंने जो टीका लिखी , वह बहुत अंशो में बुद्धिवादी है | क़ुरान और हदीस में जो चमत्कारपूर्ण अलौकिक बाते है उनके संबध में सर सैयद अहमद का मत था कि या तो ये अलंकार की भाषा में कही गयी है जिसका बुद्धि-संगत अर्थ ही लिखा जाना चाहिए अथवा उन्हें छोड़ दिया जाना चाहिए | वस्तुत: इस्लाम का साक्षात्कार उन्होंने यूरोपियन विचारधारा की पृष्टभूमि और किया था और यूरोप एवं ईसाईयत में जो भी अच्छी बाते है उन्हें वे इस्लाम के अनुकूल बताते थे |

उन्होंने इस्लामी मित्रता की किसी धारणा को स्वीकार करने से इन्कार किया और अपने एक लेख में उन्होंने यह भी कहा कि टर्की का सुल्तान विश्व भर के मुसलमानों का खलीफा नही है | मुसलमानों के प्रति ब्रिटिश सरकार के संदेह को दूर करने के लिए उन्होंने मुहम्मद साहब के समय से इस्लाम और इसाइयत के बीच चले आये संबधो का इतिहास रखा , जब कुछ अरब मुसलमानो ने गैर-मुसलमानों से पीड़ित होकर इथियोपिया के इसाई शासक के यहाँ शरण ली थी | उन्होंने एक निबन्ध में घोषणा की कि “संसार का कोई भी धर्म इसाईयत के उतने निकट नही है जितना इस्लाम” त्बैय्न -उल-कलाम में उन्होंने कुरान और बाइबिल के समान मुद्दे लिपिबद्ध किए |

सैयद अहमद खां (Sir Syed Ahmed Khan) समाज सुधार के महत्व को भली भांति समझते थे | अपनी मसिक पत्रिका तहजीबुल अख़लाक़ के द्वारा उन्होंने समाज सुधार का समर्थन किया | समाज सुधार के लिए आवश्यक वातावरण बनाने और उत्साह जागृत करने के लिए उन्होंने मोहम्मडन एजुकेशनल कांफ्रेंस की स्थापना की | सामाजिक जीवन के संबध में सर सैयद अहमद खां के विचार बहुत उदार और प्रगतिशील थे | उन्होंने पर्दा प्रथा और दास प्रथा का विरोध किया और स्त्री-शिक्षा औ विदेश भ्रमण का समर्थन |

सैयद अहमद (Sir Syed Ahmed Khan) मुस्लमानो की दीन-हीन दशा को देखकर बहुत दुखी होते थे उनकी समझ में इस स्थिति को दूर करने का एकमात्र उपाय मुसलमानो को पाश्चात्य शिक्षा और पाश्चात्य राजनितिक और वैज्ञानिक विचारों को ग्रहण करने से ही मुस्लिम समाज का कल्याण हो सकता है | उन्होंने ऐसे शैक्षिक पाठ्यक्रम की आवश्यकता पर बल दिया जिसमे प्राचीन तथा नवीन ज्ञान का समन्वय हो | शिक्षा व्यवस्था में उनकी इतनी अधिक रूचि थी कि इंग्लैंड की शिक्षा व्यवस्था को देखने के लिए वे अप्रैल 1869 में इंग्लैंड गये | कट्टर मुसलमानों के प्रबल विरोध के बावजूद 24 मई 1875 को अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो ओरियन्टल कॉलेज की स्थापना की | बाद में इसी कॉलेज ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का रूप ग्रहण किया |

इंग्लैंड जाने से पूर्व सैयद अहमद खां (Sir Syed Ahmed Khan) मुसलमानों से केवल यह आशा रखते थे कि वे अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण करे लेकिन इंग्लैंड से वापस आने पर उनकी यह आकांशा हो गयी कि मुसलमान ब्रिटिश सभ्यता , संस्कृति और विज्ञान के अधिक से अधिक निकट पहुच जाए | सवय उनका खान-पान ,रहन-सहन यूरोपियन ढंग पर ढल गया | मुस्लमानो की रूढ़िवादिता से मुक्त करने के लिए अब उन्होंने अलीगढ़ को केंद्र  बनाकर पुनर्जागरण आन्दोलन प्रारम्भ किया | इस आन्दोलन ने अंधी रुढिवादिता पर गहन प्रहार किये परिणामस्वरूप धार्मिक अंधविश्वास में फंसे लोगो ने उन्हें काफिर कहना आरम्भ किया | उन्हें तरह तरह के फतवे दिए गये , मारने की धमकियाँ दी गयी और रुढ़िवादी मुसलमानों ने उन्हें धर्म-विरोधी घोषित कर दिया लेकिन सैयद अहमद अपने मार्ग पर डटे रहे थे | 27 मार्च 1898 को बीमारी के चलते सर सैयद अहमद खां का देहांत हो गया |

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