Smita Patil Biography in Hindi | अभिनेत्री स्मिता पाटिल की जीवनी

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Smita Patil Biography in Hindi | अभिनेत्री स्मिता पाटिल की जीवनी
Smita Patil Biography in Hindi

सन 1975 में श्याम बेनेगल की “निशांत” से फ़िल्मी करियर की शुरुवात करने वाली स्मिता (Smita Patil) 1976 में मंथन और 1977 में भूमिका से सशक्त अभिनेत्री के रूप में सामने आयी | “भूमिका” के रोल के लिए उन्हें पहला राष्ट्रीय पुरुस्कार भी मिला | मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकार जयवंत दलवी की कृति पर आधारित “चक्र” में अम्मा की भूमिका के लिए उन्हें दुबारा राष्ट्रीय पुरुस्कार से सम्मानित किया गया | “बाजार” में स्मिता (Smita Patil) ने एक मुस्लिम लडकी का किरदार निभाया , जो अपनी आँखों के सामने ही औरत के सौदा होने की गवाह बनी | वही जब्बार पटेल की सुबह में उन्होंने एक ऐसे अधिकारी की पत्नी का रोल अदा किया था जो पत्नी की गैर-मौजूदगी में एक दुसरी औरत से रिश्ता कायम कर लेता है |

“मंथन” में उन्होंने दलित महिला का रोल अदा करके एक मिसाल कायम की थी | सागर सरहदी की “तेरे शहर में” में उनका रोल उनकी इमेज से बिलकुल विपरीत था | रविन्द्र पीपट की “वारिस” में नि:संतान विधवा होने का रोल उन्होंने बखूबी अदा किया था | वही “भूमिका” में औरत के जटिल मनोविज्ञान को बड़े पर्दे पर साकार किया | वर्षो पहले स्मिता (Smita Patil) की मृत्यु से फ़िल्मी दुनिया में जो खालीपन आया था वह कभी नही भरा जा सकता | आज हम उसे विद्या बालन में भले ही खोजने की कोशिस करे| हो सकता यह खोज कुछ हद तक इस नायिका में पुरी होती हुए भी दिखे लेकिन आम नायिकाओं से पुरी तरह अलग विचारो वाली स्मिता को श्यान बेनेगल ने एंटी हीरोइन की संज्ञा दी थी | उनकी गैर-मौजूदगी हिन्दी सिनेमा के साथ साथ विश्व सिनेमा को भी खलती रही है |

महाराष्ट्र के एम् पूर्व मंत्री शिवाजीराव पाटिल की पुत्री स्मिता (Smita Patil) को छात्र जीवन से ही रंगमंच का गहरा लगाव था | स्कूल के हर कार्यक्रम में भाग लेना वह जरुरी समझती थी | अन्याय के विरोध में आवाज उठाना वह अपना परम कर्तव्य मानती थी | यही वजह थी कि वह अभिनय के साथ-साथ महानगरो में होने वाले आंदोलनों में भी हिस्सा लेती ठी | महिला प्रधान फिल्मो में काम करना वह ज्यादा पसंद करती थी | वह कहती थी कि नाचना-गाना, प्यार करना और रोना-धोना ही औरत के किस्मत में नही है | अपने विचारों के चलते उन्होंने विवाह और प्रेम को अलग अलग माना | उनकी नजर में विवाह सिर्फ सामाजिक दायित्वों को निभाने और सन्तान के लिए जरुरी था | यही वजह थी कि वह शादी किये बिना भी राज बब्बर का साथ निभाने के लिए तैयार थी |

राज बब्बर के साथ उनकी पहली फिल्म “भीगी पलके” थी | इस फिल्म की शूटिंग के समय ही स्मिता राज के शांत स्वभाव एवं अभिनय प्रतिभा से प्रभावित हुयी और दोनों एक दूजे के प्रेम-बंधन में बंधते चले गये | यही निकटता आने वाले समय में उनकी फिल्मो मसलन “तजुर्बा” “शपथ” “हम दो हमारे दो” “आनन्द और आनन्द” “पेट प्यार और पाप” “आज की आवाज” और जवाब जैसी फिल्मो में काम करते करते शादी तक पहुच गयी | चूँकि राज बब्बर विवाहित थे यह जानते हुए भी स्मिता (Smita Patil) अपने परिवार की इच्छा के विरुद्ध 17 मई 1982 को मद्रास के एक मन्दिर में राज के साथ विवाह बंधन में बंध गयी | उन्हें प्यार और सामजिक सुरक्षा की जरूरत थी जो उन्हें मिल गयी थी लेकिन राज का साथ वह ज्यादा दिनों तक नही निभा पाई | 28 नवम्बर को एक बेटे को जन्म देने के 15 दिन बाद 13 दिसम्बर को वह चल बसी |

फिल्मो एम् आने से पहले स्मिता पाटिल (Smita Patil) मुम्बई दूरदर्शन केंद्र पर मराठी समाचार वाचिका रही | श्याम बेनेगल ने स्मिता को पहली बार टीवी पर देखा तब से उन्होंने ही उनमे एक सफल हीरोइन के गुण देखे | बेनेगल कहते था कि उनका बोलने का अंदाज ,आँखों के भाव-भंगिमा और आवाज ऐसी थी कि हर किसी को आकर्षित कर लेती थी | बहुत ही कम लोग जानते थे कि वह एक अच्छी फोटोग्राफर भी थी | श्याम बेनेगल उन्हें याद करते हुए कहते है कि “उनमे अपने रोल के लिए बहुत एनर्जी थी जब वह कैमरे के सामने आती थी तब भी हमेशा बिना मेक-अप के ही नजर आती थी | उनमे सही अर्थ में प्रोफेशनलिज्म था | जहा तक मुम्बई की व्व्यसायिक फिल्मो का सवाल है उनमे काफी उत्तेजक भूमिकाये की थी अपने रोल को सार्थक बनाने के लिए वह कुछ भी करने कोए तैयार रहती थी “

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