Swami Dayanand Saraswati Biography in Hindi | स्वामी दयानन्द सरस्वती की जीवनी

Swami Dayanand Saraswati Biography in Hindi

Swami Dayanand Saraswati Biography in Hindi

आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती (Swami Dayanand Saraswati)  , भारतीय संस्कृति के वैदिक संरक्षक थे जिन्होंने सर्वप्रथम और सबसे अधिक प्रमुख रूप से “वेदों की ओर लौटो” का संदेश दिया था | उन्होंने भारत और हिन्दू धर्म को नवजीवन प्रदान किया | वे एक साथ ही संत , समाज-सुधारक और देशभक्त थे | वैदिक धर्म और संस्कृति को पुनर्जीवित करना उनका एकमात्र ध्येय था | उन्होंने भारत की खोई आत्मा को दूँढ लिया और उसे राष्ट्रीय जीवन की प्रमुख शक्ति बना दिया | उन्होंने हीनता की भावना से ग्रस्त और यूरोपियन विचारों में पागल बनी भारतीय जनता को अतीत का गौरव दिखाकर और हिन्दू धर्म को सर्वोत्तम बतलाकर उनमे अपूर्व आत्मविश्वास भर दिया |

स्वामी दयानन्द (Swami Dayanand Saraswati) का जन्म काठियावाड़ की मोरवी रियासत में टंकारा नामक स्थान पर 1824 ई. में एक माध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ | उनका पारिवारिक नाम मूलशंकर था | मूलशंकर पर अपनी स्नेहमयी माता का प्रभाव अधिक पड़ा | पिता परम्परावादी व्यक्ति थे और पुत्र से आशा करते थे कि वह परिवार के धार्मिक संस्कारों को अपनावे | 14 वर्ष की आयु में ही पिता ने उन्हें प्रथम शिवरात्रि का व्रत रखने तथा रात्रि जागरण का आदेश दिया | व्रत पिता के आदेश से रखा गया था लेकिन व्रत की महत्ता की कथा सुनकर और उत्साहपूर्ण वातावरण में बालक के मन में व्रत के प्रति श्रुद्धा भाव ने जन्म ले लिया |

रात्रि के नीरवतापूर्ण वातावरण में बालक मूलशंकर की दृष्टी शिवमूर्ति और शिवलिंग पर टिकी थी जिन्हें शक्ति का प्रतीक बतलाया गया था | बालक ने जब चूहों को शिव की मूर्ति पर उछलकूद करते देखा तो शिवमूर्ति और शिवरात्रि व्रत के प्रति प्रयत्नपूर्वक उत्पन्न किया गया समस्त श्रुद्धाभाव तिरोहित हो गया | इस छोटी सी घटना ने एक आघात के रूप में उनके जीवन को प्रभावित किया | उनका तर्कपूर्ण मन इस बात को स्वीकार नही कर सका कि पत्थर का यह पिंड ही महादेव या ईश्वर है | इसके बाद निकटतम पारिवारिक जनों की मृत्यु के दो प्रसंगो (16 वर्ष की अवस्था में छोटी बहन की मृत्यु और 19 वर्ष की उम्र में चाचा की मृत्य) ने उन्हें सांसारिक जीवन से मुक्त होने के लिए प्रेरित किया |

माता-पिता ने उन्हें विवाह बंधन में बांधना चाहा , लेकिन मूलशंकर ने 21 वर्ष की अवस्था में घर को त्याग दिया | मूलशंकर के मन में जिज्ञासा थी और अब उन्होंने कठिन यात्राओं एवं साधना का मार्ग अपना लिया | सम्भवत: उनका मन गुरु की तलाश में था | अक्टूबर 1860 ई. में उन्हें मथुरा में गुरु विरजानंद जी मिले और 14 नवम्बर 1860 ई. को उन्होंने गुरु विरजानंद के सम्मुख सहज समपर्ण कर दिया | यह समर्पण समस्त विश्व के लिए कल्याणकारी सिद्ध हुआ , जब उन्हें स्वामी दयानन्द का नाम मिला | लगभग तीन वर्ष तक गुरु के चरणों में बैठकर उन्होंने साधना के साथ ज्ञानार्जन किया | 1863 ई. में धर्मोपदेश के लिए विदा करते हुए उन्हें गुरु ने संदेश दिया “देश का उपकार करो | सत शास्त्रों का उद्धार करो| मत मतान्तरो की अविद्या को मिटाओ और वैदिक धर्म फैलाओ”|

गुरु के आदेशो और उपदेशो को लेकर स्वामी जी सम्पूर्ण देश की यात्रा पर निकले | वैदिक धर्म की रक्षा का प्रश्न उनके सामने सबसे अधिक प्रमुख था | स्थिति यह थी कि भारत का धार्मिक जीवन एक ओर तो अंधविश्वासों और कुसंस्कारो से ग्रस्त था दुसरी ओर वैदिक धर्म पर इस्लाम और इसाई धर्म , दोनों के द्वारा भारी प्रहार किये जा रहे थे | इस स्थिति में वैदिक धर्म के अनुयायी अपना गौरव और अपना साहस खोकर आत्महीनता से ग्रस्त हो गये थे | स्वामी जी ने इस स्थिति को दूर करने का संकल्प किया और उस समय जैसी परिस्तितियो थी उनमे उन्होंने वैदिक धर्म पर आक्रमण करने वाले अन्य मतावलम्बियो पर दुगुनी शक्ति से आक्रमण बोल दिया | वेदों को धर्म का मूलाधार सिद्ध करने और मूर्ति पूजा का विरोध करने के लिए उन्हें सनातनी पंडितो और अन्य धर्मगुरुओ से शास्त्रार्थ में भाग लेना पड़ा . ऐसे सभी अवसरों पर जीत उन्ही की हुयी |

धर्म प्रचार और यात्रा क्रम में अक्टूबर 1874 में स्वामी जी मुम्बई पहुचे और 10 अप्रैल 1875 के दिन बम्बई में प्रथम आर्य  समाज की स्थापना की | इसके लगभग दो वर्ष बाद लाहौर में आर्य समाज की स्थापना हुयी | इसी समय आर्य समाज का विधान बना और देश के विभिन्न भागो में आर्य समाज की शाखाए स्वत: स्थापित होने लगी | एक तरफ स्वामीजी (Swami Dayanand Saraswati) का ध्यान आर्य समाजो के सन्गठन की तरफ केन्द्रित था दुसरी तरफ वे वैदिक धर्म और संस्कृति के प्रचार में भी पुरी शक्ति के साथ सलंग्न थे | इस क्रम में वे देशी रियासतों के नरेशो के भोग के साथ त्याग और अपनी प्रजा के हित चिन्तन की शिक्षा देने में भी पीछे नही रहे |

17 मई 1883 को वे जोधपुर पहुचे और जोधपुर नरेश जसवंतसिंह की वेश्या नन्हीबाई के प्रेम में लिप्त देखकर जब उन्होंने नरेश को प्रताड़ित किया , तब उस वेश्या ने षडयंत्र रचकर स्वामीजी को दूध में विष मिला दिया | 30 अक्टूबर 1883 ई. को उनका देहावसान हो गया | वैदिक धर्म के प्रचार क्रम में जिन व्यक्तियों के स्वामी के साथ भारी मतभेद थे उन व्यक्तियों ने भी मृत्यु के बाद ज्ञान के इस सूर्य को भावभीनी श्रुद्धांजलि अर्पित की |

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  1. Booksword.in July 14, 2018

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