Swami Shraddhanand Biography in Hindi | हिंदुत्व के पुरोधा स्वामी श्रद्धानंद की जीवनी

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Swami Shraddhanand Biography in Hindi | हिंदुत्व के पुरोधा स्वामी श्रद्धानंद की जीवनी
Swami Shraddhanand Biography in Hindi

यथा नाम तथा गुण सुख एवं आनन्द की प्रतिमूर्ति परदादा सुखानंद , निर्भय वीर ईश्वर भक्त पितामह गुलाबराय और अगाध शिवभक्त पिता नानकचंद के धर्मनिष्ट परिवार में ग्राम तलवन जिला जालंधर (पंजाब) की पूण्यधरा पर , फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी संवत 1913 विक्रमी के पावन दिवस को जन्मे बालक का नाम मुंशीराम प्रचलित हो गया था | ये अपने चारो भाई और दो बहनों में सबसे कनिष्ट थे | इनके पिताजी अंग्रेजी शासन में एक वरिष्ट पुलिस अधिकारी थे जिन्होंने लाहौर ,हिसार ,मेरठ ,बरेली ,बदायु ,काशी ,बांदा ,मिर्जापुर ,मथुरा ,खुर्जा आदि स्थानों में प्रतिष्टापूर्वक शासन किया |

मुंशीराम की बाल्यावस्था एवं किशोरावस्था अपने पिता के साथ व्यतीत होती रही | इन्होने बनारस के क्वींस कॉलेज , जय नारायण कॉलेज और प्रयाग के म्यो कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की थी | वंश परम्परा के अनुसार इनके धर्म-कर्म एवं भक्ति का विशेष प्रभाव था | विश्वनाथ जी के दर्शन किये बिना ये जलपान तक नही करते थे | बांदा में ये नियमित रामचरितमानस का पाठ सुनते थे और प्रत्येक आदित्यवार को एक पैर पर खड़े होकर सौ बार हनुमान चालीसा का पाठ करते थे |

एक दिन उनके किशोर हृदय को ऐसी ठेस लगी कि इनकी समस्त रुढ़िवादी धार्मिक कट्टरता तिरोहित हो गयी | हुआ यह कि काशी के विश्वनाथ के दर्शनार्थ गये तो उन्हें बाहर ही रोक दिया गया क्योंकि मन्दिर में रींवा की महारानी दर्शन कर रही थी | इस प्रकार मूर्तिपूजा से इनको विरक्ति हो गयी | ऐसी ही अनेक घटनाओं के कारण मुंशी राम के मन में उथल पुथल मच गयी | संवत 1936 वि. में स्वामी दयानन्द सरस्वती का बरेली आगमन हुआ | पिता को तो शान्ति व्यवस्था के नाते स्वामी जी के व्याख्यान सुनने थे | उन्होंने इनके न चाहने पर ही आग्रह पूर्व मुंशी राम को स्वामी के सत्संग में सम्मीलित होने की प्रेरणा दी |

आदित्यमूर्ति दयानन्द के महान व्यक्तित्व के दर्शन कर तथा सभा में पादरी स्काट एवं अन्य यूरोपियनो को बैठा देखकर इनके मन में श्रुधा का उत्स प्रस्फुटित हो उठा | इन्होने तीन अवसरों पर स्वामी जी के समक्ष इश्वर के अस्तित्व पर शंका प्रकट की | उनका उत्तर सुनकर इन्हें मौन रहना पड़ा पर इन्होने कह दिया कि “महात्मन् ! अपनी तर्क शक्ति के कारण आपने मुझे निरुत्तर तो कर दिया किन्तु विश्वास नही दिलाया कि ईश्वर में भी कोई शक्ति होती है |” यह सुनकर स्वामी जी पहले हंसे ,फिर गम्भीर होकर उन्होंने कहा “तुमने प्रश्न किये , मैंने उत्तर दिए , यह युक्ति की बात थी | मैंने कब प्रतिज्ञा की कि मै तुम्हारा विश्वास इश्वर पर करा दूंगा | तुम्हे इश्वर पर विश्वास तभी होगा जब वह प्रभु स्वयं तुम्हे विश्वासी बना दे”|

बात आई गयी हो गयी | बरेली से आकर मुंशीराम जालन्धर में मुख़्तार का कार्य करने लगे | अंग्रेजो की चाकरी में इन्हें गुलामी की गंध लगती थी | विक्रमी संवत 1941 में इन्होने लाहौर जाकर वकालात की परीक्षा उत्तीर्ण करने का निश्चय किया | लाहौर पहुचने पर इनका सम्पर्क आर्य समाज और सत्यार्थ प्रकाश से हुआ | बाद में जालन्धर में वकालत करते हुए सामाजिक कार्यो में सक्रिय हो गये | आर्य समाज जालन्धर के प्रधान बना दिए गये और इन्होने यंत्र-तन्त्र भ्रमण कर वेद प्रचार करना आरम्भ कर दिया | आवश्यकतानुसार शास्त्रार्थो के माध्यम से पाखंडो का खंडन कर सत्य धर्म दृढ़ किया | उन्होंने “सधर्म प्रचारक” तथा अन्य पत्र प्रकाशित कर वितरित किये |

अनेक आर्य समाजो को मिलाकर बनाई गयी आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब को स्थायित्व प्रदान किया | भरपूर युवावस्था में धर्मपत्नी के आकस्मिक निधन के बाद भी दूसरा विवाह नही किया | सर्वप्रथम कन्या पाठशाळा जालन्धर में खोली | DAV कॉलेज लाहौर की संचालन व्यवस्था में सहयोगी रहे किन्तु वहा संस्कृत  भाषा एवं आर्ष शास्त्रों की उपेक्षा को देखकर सत्यार्थ प्रकाश की शिक्षा प्रणाली को मूर्तरूप देने के लिए 1902 में गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की जिसके लिए न केवल अपनी कोठी बेच दी प्रत्युत वांछित धनराशि का संग्रह निश्चित अवधि से पूर्व ही कर लिया और अपने दोनों पुत्रो को भी गुरुकुल में ही रखकर पढाया |

दक्षिण अफ्रीका से गाधीजी भारत आये और गुरुकुल में दर्शनार्थ गये तो सर्वप्रथम आचार्य मुंशीराम ने ही उनको “महात्मा” कहकर महात्मा गांधी विश्व विश्रुत किया | गुरुकुल की 15 वर्ष तक सेवा करके भारत स्वातंत्र्य युद्ध में योगदान के लिए दिल्ली आ गये | रोलेट एक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह आन्दोलन का नेतृत्व करते समय गोलीबारी करने वाले सैनिको के सामने अपनी छाती खोलकर हुंकार उठे “मै खड़ा हु गोली मारो गोरखा सैनिको की उठी हुयी संगीने नीचे झुक गयी “|

अब तक मुंशी राम महात्मा के सम्बोधन के बाद सन्यासी श्रुद्धानंद (Swami Shraddhanand) बन चुके थे | दिल्ली की जामा मस्जिद के मिम्बर से 30 हजार मुस्लिम भाइयो को सम्बोधित करने के लिए स्वामी जी को बुलाया गया | अकालियो के न्यायपूर्ण आन्दोलन में सहायक बने और जेल यातना सहन की | इन्हें अकाल तख्त पर सम्मान उपदेश देने के लिए आमंत्रित किया गया | भारत माता की स्वतन्त्रता ,राष्ट्रीय एकता और वैदिक संस्कृति की समरसता के परासार्थ स्वामी श्रुद्धानंद (Swami Shraddhanand) ने कांग्रेस आन्दोलन में बढ़-चढकर भाग लिया | जलियांवाला बाग़ की क्रूरतम हत्याकांड के बाद पंजाब में कांग्रेस महाधिवेशन आयोजित करना भला किसके बूते की बात थी |

स्वामी जी (Swami Shraddhanand) ने साहसपूर्वक न केवल स्वागताध्यक्ष के दायित्व को वहन कर इसे सफल बनाया प्रत्युत प्रथम बार हिंदी में स्वागत भाषण देकर नया इतिहास रचने का कीर्तिमान स्थापित कर दिया | भारतभूमि के स्थायी कल्याण के लिए कटिबद्ध स्वामी जी (Swami Shraddhanand) देश के दलित भाइयो की दीनदशा के प्रति चिंतातुर रहने लगे उन्होंने इनके उद्धार के लिए प्रस्ताव कांग्रेस अधिवेशनो में रखे | इनकी इस गुहार की अनवरत उपेक्षा हुयी तो उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और द्लितोद्दर सभा के माध्यम से दलितों की कठिनाईयों के निवारण का एक सफल अभियान आरम्भ किया |

स्वामी श्रुद्धानंद (Swami Shraddhanand) न केवल उत्तर भारत में ही अपितु दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश ,विजयवाड़ा ,मैसूर ,चेन्नई और मुम्बई आदि की यात्राये करके इसे दलितोद्धार के अभियान को संचालित किया | स्वामी जी (Swami Shraddhanand) ने अनुभव किया कि देशोद्धार के लिए वृहत हिन्दू समाज को संगठित किया जाना आवश्यक है इसलिए उन्होंने आर्य समाज के साथ साथ हिन्दू महासभा के माध्यम से हिन्दू धर्म से अन्य मतो से चले गये इच्छुक व्यक्तियों के स्वधर्म में परावर्तन पर बल दिया | उन्हें इसके अनुकूल परिणाम भी मिले | सन 1924 में शुद्धिसभा के द्वारा तीस हजार नव मुस्लिम मलकाने राजपूतो को गायत्री उच्चारण कराके उनके पुरातन वैदिक धर्म का श्रेयस उन्हें प्रदान किया |

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