The Great Gama Biography in Hindi | गामा पहलवान की जीवनी

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The Great Gama Biography in Hindi
The Great Gama Biography in Hindi

जाने माने पहलवान गामा (Gama) सन 1880 ई, के दौरान एक मुसलमान परिवार में पैदा हुए थे | उनके घर के सदस्यों को कुश्ती में गहरी रूचि थी | पंजाब के प्रसिद्ध पहलवान माधोसिंह ने गामा (Gama) को प्रशिक्षित किया था | मशहूर पहलवान गामा ने धाकर सिंह , अली सेन ,हसन बक्श तथा चंदा सिंह आदि पहलवानों को चित्त करने के पश्चात खलीफा गुलात मोहिनुदीन को ललकारा तथा उन्हें केवल आठ मिनट में ही धराशायी कर दिया | उस समय देश में केवल एक ही ऐसा पहलवान था जो गामा के सामने कुछ देर तक टिक सकने की क्षमता रखता था जिसे रहीम सुल्तानीवाला के नाम से जाना जाता था | गामा और सुल्तानीवाला के बीच बार बार मुकाबला हुआ परन्तु एक बार भी निर्णय नही हो पाया कि विजेता  है |

भारत का यह छिपा रुस्तम एक दिन रुस्तमे-जहां बन सकता है जो कल्पना से भी परे था | यह घटना 1910 ई. की है एक बार ब्रिटेन के लन्दन शहर में विश्व दंगल का आयोजन हुआ ,उस समय एक लखपति बंगाली सेठ भारत के कुछ पहलवानों को लेकर ब्रिटेन गये थे जिसका इमामबक्श , अहमद बक्श तथा गामा द्वारा प्रतिनिधित्व किया गया | वहां पर दंगल के आयोजको ने भारतीय पहलवानों की बड़ी उपेक्षा की | गामा साढ़े पांच फुट लम्बे थे और उनका वजन 200 पौंड के लगभग था |

लन्दन के आयोजको ने गामा (Gama) को उम्मीदवारों की सूची में शामिल नही किया था | उन्हें क्या पता था कि इस छोटे कद वाले पहलवान का शरीर इस्पात का है और वह दुनिया के बड़े से बड़े पहलवान से टक्कर लेने की क्षमता रखता है | गामा को इससे गहरा आघात लगा | उन्होंने एक थिएटर कम्पनी में जाकर दुनिया भर के पहलवानों को चुनौती देते हुए कहा कि जो पहलवान अखाड़े में मेरे सामने पांच मिनट तक टिक जाएगा उसे पांच पौंड का नकद इनाम दिया जाएगा | इसके पूर्व कई गिने चुने पहलवान गामा से भिड़ने के लिए तैयार हो गये | गामा ने पहले अमेरिकी पहलवान रोलर को हराया और इमामबक्श ने स्विट्जरलैंड के कोनोली और जान लेम को देखते देखते पराजित कर दिया | इस पर विदेशी पहलवानों और आयोजको ने साजिश के तहत गामा को विश्व विजेता स्टेनली जिविस्को से कुश्ती के लिए भिड़ा दिया |

गामा (Gama) तथा जिविसको के बीच 12 दिसम्बर 1910 को कुश्ती का आयोजन किया गया | जिविसको गामा के मुकाबले बहुत लम्बा और भारी भरकम पहलवान था | यह कुश्ती 2 घंटे और 40 मिनट तक चली | गामा ने पोल्लैंड के इस पहलवान को इतना थका दिया जिससे उसके शरीर की सम्पूर्ण उर्जा समाप्त हो गयी | जब गामा ने जिविसको को नीचे पटका तो वह अपने बचाव के लिए लेट गया | उसका शरीर इतना वजनी था कि गामा उसे उठा नही सके | इस पर भी हार जीत का फैसला न हो सका तो कुश्ती को अनिर्णीत घोषित किया गया और फैसले के लिए दुसरे दिन की तारीख तय की गयी | अगले दिन जिविसको इतना भयभीत हो गया कि मैदान में ही उपस्थित नही हुआ | दंगल के आयोजक जिविसको की खोज-बीन करने लगे लेकिन वह न जाने कहा छिप गया और मैदान में भी नही पहुचा फलस्वरूप गामा को विश्व विजेता बना दिया गया |

28 जनवरी 1928 को दोनों के मध्य दुबारा कुश्ती पटियाला में हुयी | इस बार गामा (Gama) ने केवल ढाई मिनट में ही जिविसको को परास्त कर दिया , जिविसको ने गामा को अपने से श्रेष्ट पहलवान माना | हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार राय कृष्णदास ने के स्थान पर लिखा है कि इस मुकाबले को देखने के लिए 80 हजार दर्शक मैदान में उपस्थित थे | गामा की विजय के बाद पटियाला के महाराजा ने गामा को आधा मन भारी चाँदी की गुर्ज और 20 हजार रूपये उपहार स्वरूप प्रदान की |

रायकृष्णदास द्वारा भी गामा की कुछ अन्य कुश्ती की प्रतियोगिताओं का उल्लेख किया गया -1911 ई. में प्रयाग में प्रदर्शनी हुयी | उस समय गामा पुरे ओज पर थे | रीवा के महाराज वेंतेश सिंह भी प्रतिपालकता में थे | उस दंगल को देखने के लिए महाराज उपस्थित हुए थे साथ ही साथ दुसरे भी नरेश उपस्थित थे | सभी नरेशो के बैठने के लिए बॉक्स बनाये गये थे | केवल रतलाम नरेश वर्गवाद को तोडकर साधारण दर्शको में बैठे थे | यह उस जमाने के लिए बड़ा उदार एक साहसपूर्ण कदम माना जा सकता था |

वही निकट में रीवा नरेश की कुर्सी के नीचे दरी पर गामा पहलवान ने स्थान ग्रहण किया था | सर पर मुंडासा , तन पर पंजाबी कुर्ता और लूंगी | ऐसे बैठे थे कि शरीर सम्पति का कोई अनुमान ही न होता था | उनकी भिडत करीम नाम के पहलवान से होनी थी | करीम मैदान पर अकड़-अकड़ कर ,एक बार दांयी और फिर बांयी ओर ताकता “या अली , या अली” गर्जन करता अखाड़े तक पहुचा | गामा ने महाराजा के चरण स्पर्श किये | मुड्सा , कुर्ता और लूंगी उतार कर रख दी और थोडा सा दूध जो पहले से ही तैयार था पीकर दो चार बैठके लगाकर एक बार जो देह को फुलाया तो देखते देखते मृग शावक मृग राज परिणत हो गया |

गामा (Gama) की शारीरिक सुन्दरता का दर्शन करने हेतु काफी संख्या में लोग उपस्थित हुए थे | क्या बनाया था गामा ने अपने ठिगने शरीर को कोई कसर थी तो केवल पिंडलियों की जो उस भव्य निर्माण के हिसाब से उन्नीस पडती थी | वे काफी विन्रम स्वभाव से अखाड़े में पहुचे तथा पलक मारते , ताल ठोकते ही दोनों मल्ल गूँथ गये | दाँव-पेच के करिश्मे होने लगे जिनमे गामा भारी पड़ते नजर आ रहे थे मानो प्रतियोगी अब चित्त हुआ | परन्तु तभी अचानक करीम ने अपने शरीर को अखाड़े में डाल और बहुत विकल ध्वनि से हाय मार डाला ,हाय मार डाला धुन लगा दी | रेफरी के पूछने पर करीम ने कराहते हुए बताया कि गामा ने मेरी पसली तोड़ डाली है | वहां डॉक्टर भी उपस्थित थे अच्छी तरह से परीक्षण करने के पश्चात इसे बहाना मात्र बताया | बहुत कुछ कहने के बाद करीम दुबारा लड़ने के लिए राजी नही हुआ तो गामा को रुस्तमे हिन्द का गदा भेंट किया गया | गदा को उसी विनीत भाव से रीवा के महाराजा के चरणों में सौंपते हुए दुबारा उसी प्रकार अपना स्थान ग्रहण कर लिया |

गामा पहलवान अपने शागिर्दों को यह कहकर प्रेरित किया करते थे कि व्यक्ति को कभी अपनी ताकत के घमंड में चूर नही रहना चाहिए | खुदा ने ताकत दी है तो सिर नीचा करके चलो | बलवान बनकर कभी निर्बल को मत सताओ बल्कि उसका सहारा बनो | अपने छोटे भाई इमामबक्श को गामा सदा संयमी जीवन व्यतीत करने की सीख दिया करते थे | इमामबक्श भी अपने जमाने के मशहूर पहलवान थे और जम्मू-कश्मीर के महाराज प्रतापसिंह के राज्याश्रय में रहा करते थे | जब उनका स्वाभिमान घमंड का रूप धारण कर गया तो वह असंयम जीवन व्यतीत करने लगे ,जिससे गामा को काफे तकलीफ हुयी और उन्होंने उन्हें एक प्रकार की चेतावनी देते हुए कहा कि यदि कोई पहलवान तैयारी करके तुम्हारे सामने खड़ा हो गया तो तुम्हे मुंह की कहानी पड़ेगी | उनकी इस सीख से इमामबक्श पहलवान के कानो पर जूं तक नही रेंगी जिसके परिणामस्वरूप कुछ अंतराल के पश्चात वह गूंगा पहलवान से पराजित हो गये |

गूंगा पहलवान भी अपने समय के चर्चित पहलवानों में से एक थे | लाहौर में जब गूंगा और इमामबक्श की पहली बार कुश्ती हुयी तब गूंगा ने इमामबक्श को जमीन पर पटक दिया तो सभी आश्चर्यचकित हो गये | इस हार पर इमामबक्श बहुत शर्मिंदा हुए और इंदौर जाकर रहने लगे | कुछ समय बाद महाराज प्रताप सिंह ने उन्हें फिर तैयारी करने को कहा और उनकी खुराक के लिए डेढ़ सौ रूपये रोज के हिसाब से भिजवाने लगे | इमामबक्श वापस लाहौर आ गये और अपने भाई के संरक्षण में तैयारी में लग गये | उसके बाद गूंगा पहलवान और इमामबक्श के बीच कुश्ती हुयी तो इमाम ने उन्हें जमीन पर पटखनी देकर धराशायी कर दिया | इस प्रकार इमामबक्श ने अपनी हार का बदला ले लिया | यहाँ यह बता देना उचित होगा कि गूंगा पहलवान विभाजन से कुछ वर्ष पूर्व एक बस दुर्घटना में मारे गये थे |

प्रतिदिन गामा पहलवान सरसों के तेल की मालिश किया करते , मालिश करने के तुंरत बाद लगभग 2000 बैठके और करीब 100 दंड लगाते थे | शाम को बैठक और दंड के बाद गुगदर भी घुमाते | हल चलाना , पानी खींचना , 2-3 मील की दौड़ लगाना यह उनका नियमित कार्यक्रम था | जिविसको ने के बार कहा था कि मेरी कई पहलवानों से भिडंत हुयी है परन्तु मै सचमुच गामा पहलवान का लोहा मानता हु | जितनी आसानी से गामा ने मुझे पटका उतनी आसानी से दुनिया का कोई ओर पहलवान मुझे पटकने में सफलता प्राप्त नही कर पाया |

आजादी के पश्चात जब देश का विभाजन हुआ तब गामा पहलवान भारत से अलग होकर पाकिस्तान में  रहने लगे | रुस्तमे-हिन्द के आखिरी 13 वर्ष बड़ी गरीबी और गुरबत में गुजरे | रावी नदी के किनारे इस अजेय पुरुष को एक छोटी सी झोंपड़ी बनाकर रहना पड़ा | उन्होंने बहुत ही अभावग्रस्त जीवन व्यतीत किया | पहलवान की खुराक की कमी उसका सबसे बड़ा रोग माना जाता है | एक एक बाद एक मुसीबतों ने उन्हें घेर लिया | एक बार रावी नदी के किनारे घूमते हुए एक सांप ने उन्हें काट लिया | साँप का विष पुरे शरीर में फ़ैल गया , उनका शरीर एकदम काला और कमजोर हो गया | वे सदा रोगग्रस्त रहने लगे |

उनकी बीमारी की खबर पाकर भारतवासियों का दुखी होना स्वाभाविक थे | पटियाला के महाराज और बिडला भाइयो ने उनकी मदद के लिए धनराशि भेजनी शुरू की लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी | 22 मई 1960 को मौत ने उन्हें गले लगा लिया | उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर भारतवर्ष में शोक की लहर छा गयी | उनके परिचित और प्रशसंक आसू बहाने लगे | आज भी देश में बहुत से ऐसे व्यक्ति मौजूद है जिन्होंने गामा के दर्शन किये है या उनकी कुश्ती देखी है | गामा मरकर भी आज हमारे बीच मौजूद है तथा आने वाली पीढ़ी के वे प्रेरणास्त्रोत रहेंगे | आज भी हर कुश्ती प्रेमी परिवार में उनकी कहानिया सुनाई जाती है | गामा पहलवान (Gama pahlwan)ने भारतीय कुश्ती को विश्व मंच पर जो सम्मान दिलाया , वह वाकई काबिले तारीफ़ है | दुनिया ने उनकी कुश्ती का लोहा माना |

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