Veer Kunwar Singh Biography in Hindi | वीर कुंवर सिंह की जीवनी

Veer Kunwar Singh Biography in Hindi

Veer Kunwar Singh Biography in Hindi

वीर कुँवर सिंह ने भारत की स्वाधीनता के लिए जो साहस दिखाया वह इतिहास में दर्ज है | बाबू कुँवर सिंह का जन्म बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर नामक गाँव में सन 1777 में हुआ था | इनके पिता बाबू साहबजादा सिंह प्रसिद्ध शासक भोज के वंशजो में से थे | उनके छोटे भाई अमर सिंह , दयालु सिंह और राजपति सिंह एवं इसी खानदान के बाबू उद्वंत सिंह , उमराव सिंह तथा गजराज सिंह जाने-माने जागीरदार थे तथा अपनी स्वतंत्रता कायम रखने के लिए हमेशा युद्ध करते रहे |

सन 1846 में अंग्रेजो को भारत से भगाने के लिए हिन्दू और मुसलमानों ने मिलकर कदम बढाया | मंगल पांडे की बहादुरी ने सारे भारतीयों में जोश भर दिया | बिहार के दानापुर रेजिमेंट , बंगाल के बैरकपुर और रामगढ़ के सिपाहियों ने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह कर दिया | मेरठ , कानपुर , लखनऊ , इलाहाबाद , झांसी और दिल्ली में भी विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी | ऐसे वातावरण में बाबू कुँवर सिंह ने भारतीय सिपाहियों का मार्गदर्शन किया |

भारत के महान सपूत बाबू कुंवर सिंह ने 27 अप्रैल 1857 को दानापुर के सिपाहियों , भोजपुरी जवानो और अन्य साथियों के सहयोग से आरा नामक शहर पर अधिकार कर लिया | अंग्रेजो की लाख कोशिशो के बाद भी भोजपुर बहुत अधिक समय तक स्वतंत्र रहा | जब अंग्रेज सिपाहियों ने आरा पर हमला करने की कोशिश की तो बीबीगंज और बिहिया के जंगलो में घमासान युद्ध हुआ और अंत में अंग्रेज सिपाहियों की विजय हुयी | आरा पर फिर से कब्जा जमाने के बाद अंग्रेजो ने जगदीशपुर पर हमला कर दिया | बाबू कुंवर सिंह और अमर सिंह को अपनी जन्मभूमि जगदीशपुर को छोड़ना पड़ा | अमर सिंह अंग्रेजो से छापामार युद्ध करते रहे और बाबू कुंवर सिंह रामगढ़ के बहादुर सिपाहियों के साथ बांदा , रीवा ,आजमगढ़ , बनारस ,बलिया ,गाजीपुर एवं गोरखपुर में विप्लव के नगाड़े बजाते रहे |

सन 1857 की क्रान्ति का नेतृत्व वीर कुँवर सिंह ने किया | जिस समय क्रान्ति की शुरुवात हुयी उस समय उनकी उम्र 80 वर्ष थी लेकिन उन्होंने मातृभूमि की स्वाधीनता का संघर्ष सहर्ष स्वीकार किया | क्रान्ति की घटनाएँ कुछ इस तरह घटी – सन 1857 की क्रांति के समय बिहारवासियों के मन में जोश उत्पन्न होने लगा और पटना के प्रसिद्ध क्रांतिकारी पीर अली को अंग्रेजो ने फांसी की सजा दे दी | उनकी फाँसी की खबर सुनते हे 25 जुलाई को दानापुर की तीन देशी पलटनो ने विद्रोह कर दिया | इसी दौरान एन अंग्रेज पलटन और अंग्रेजी तोपखाना दानापुर में मौजूद था पर उसकी परवाह न करके सिपाहियों ने अंग्रेजो की गुलामी की वर्दी उतार दी और जगदीशपुर पहुचकर बाबू कुँवर सिंह से नेतृत्व करने की सिफारिश की | क्रांति का नेतृत्व करने के लिए कुँवर सिंह तैयार हो गये | इस बात की जानकारी अंग्रेजो को भी लगी | उनके द्वारा वीर कुँवर सिंह को बंदी बनाने के उद्देश्य से उन्हें मेहमाननवाजी का न्योता दिया |

कुँवर सिंह अंग्रेजो की इस चाल को समझ गये थे इसलिए बीमारी का बहाना बनाकर इस न्योते को अस्वीकार कर दिया था किन्तु जब सिपाही उनके पास पहुचे तो वे अपना बुढापा भूलकर विद्रोहियों का नेता बनना स्वीकार कर लिया | उन्होंने आरा पर हमला किया और सरकारी खजाने को लुट लिया , अंग्रेजो के जेलखाने और कार्यालय को तहस-नहस कर दिया और अंग्रेजो का झंडा उखाडकर फेंक दिया | आरा में रह रहे अंग्रेजो ने 50 सिखों के साथ आरा हाउस में शरण ली और अपनी जान बचाई | विद्रोहियों ने सिखों को अपनी तरफ मिलने की बहुत कोशिशे भी की |

इस घटना की सुचना पाते ही ब्रिटिश सरकार ने 29 जुलाई को दानापुर से कैप्टन डनबर के नेतृत्व में 270 अंग्रेज सैनिक और लगभग 100 सिख सैनिक इन घिरे हुए अंग्रेजो की मदद के लिए भेजा | रात को जब वे चुपचाप आरा की ओर जा रहे थे तथा कुँवर सिंह के आदमियों से उनका आमना-सामना हो गया और अंत में दोनों पक्षों के बीच घमासान युद्ध प्रारम्भ हो गया | इस युद्ध में डनबर और उसके अधिकाँश साथी मारे गये | सिर्फ 50 आदमी वापस दानापुर जा सके | इस पराजय के बाद ब्रिटिश प्रशासन कैप्टन आयर को विद्रोहियों को कुचलने के लिए भेजा | वह तीन तोपे और कुछ सिपाही लेकर बाबू कुँवर सिंह के घेरे को विनष्ट करने के लिए आया | उसके आने की खबर पाकर घेरे को कायम रखते हुए कुँवर सिंह ने एक जंगल में उसका रास्ता रोका | इस दौरान विद्रोही आयर की तोपों का सामना नही कर सके और उन्हें वहां से भागना पड़ा | आयर ने पुन: आरा पर अधिकार कर लिया | इस प्रकार 8 दिन के बाद आरा हाउस में घिरे अंग्रेज बाहर निकल सके | कुँवर सिंह ने जगदीशपुर जाकर अपनी सैन्यशक्ति बढाना प्रांरभ कर दिया परन्तु आयर तुंरत जगदीशपुर की ओर अपने सैनिको के साथ चल दिया | उसके आने की सुचना मिलते ही कुँवरसिंह जगदीशपुर से हट गये और उन्होंने जंगल में जाकर छापामार युद्ध करना प्रारम्भ किया |

आयर ने जगदीशपुर पर आक्रमण किया और अंत में उसने १४ अगस्त १८५७ को जगदीशपुर पर कब्जा कर लिया और कुँवरसिंह के महल में ही डेरा डाला | वीर कुँवरसिंह के पास सैनिक बहुत कम थे अत: जगदीशपुर और आरा में अंग्रेजो को सतर्क देख शान्तिपूर्वक उचित अवसर का इन्तजार करने लगे | कुछ महीने बाद उन्हें सुचना मिली कि आजमगढ़ से अंग्रेज और नेपाली सैनिक लखनऊ पर चढाई करने के लिए जा रहे है | कुँवरसिंह ने छापामार युद्ध के जरिये उनपर आक्रमण करने का फैसला किया | वे अपनी सेना लेकर जंगल से निकलकर आजमगढ़ की ओर चल दिए | इसी बीच 18 मार्च 1858 को कुछ विद्रोही भी उनसे आ मिले | इस संयुक्त सेना ने अतरौलिया के किले के पास विश्राम करने का निश्चय किया |

कुँवरसिंह के अतरौलिया आने की सूचना पाकर मिलमैन 300 पैदल सैनिक और घुडसवार तथा दो तोपे लेकर अतरौलिया के लिए रवाना हो गया | मिलमैन 22 मार्च 1858 को सुबह ही अतरौलिया पहुच गया | उसे देखते ही कुँवरसिंह के समर्थक इधर-उधर छिप गये | मिलमैन विजय के गर्व से निश्चिंत होकर सेना के साथ जलपान ही कर रहा था तभी एकाएक कुँवरसिंह के आदमियों ने चारो तरफ से गोलियाँ चलानी शुरू कर दी | अपने को घिरा देख मिलमेंन को भागना पड़ा | अतरौलिया से कौसिल्ला के पडाव तक कुँवरसिंह के छापामार मिलमैन और उसके सैनिको को परेशान करते गये किन्तु कौसिल्ला के पड़ाव में भी अंग्रेज सैनिको को शरण नही मिली | जिन भारतीयों के उपर उस पड़ाव का सामान छोड़ दिया गया , वे गाडियों के उपर सारा सामान लादकर वहां से चले गये थे |

मिलमैन पुरी तरह परेशान हो चूका था  भूख-प्यास से परेशान वह किसी तरह से आजमगढ़ पहुचा | कुँवरसिंह के सिपाही इसका पीछा करते हुए आजमगढ़ आ पहुचे | इसी दौरान अंग्रेजो की सहायता हेतु वाराणसी तथा गाजीपुर से कर्नल डेम्स के नेतृत्व में 350 सैनिक आजमगढ़ से आ चुके थे | यह कर्नल अपने सैनिको को लेकर 18 मार्च 1858 को मिलमैन की हार का बदला लेने चला लेकिन उसे सफलत नही मिली |

आजमगढ़ पर अधिकार करने के बाद कुँवरसिंह इस शहर को पाने कुछ साथियो को सौंपकर वह बनारस की तरफ रवाना हो गये | उनकी योजना थी बनारस और इलाहाबाद पर कब्जा कर कलकत्ता से अंग्रेजो की मदद के लिए अवध और दिल्ली को जाने वाले रास्ते को काट देना | गर्वनर जनरल लार्ड केनिंग ने इस खतरे को देखा और क्रीमिया के युद्ध में ख्याति प्राप्त लार्ड मार्कर को कुँवरसिंह पर चढाई करने का आदेश दिया | मार्क 500 सैनिको और 60 तोपों को लेकर चला | 6 अप्रैल को आजमगढ़ से लगभग 8 मील की दूरी पर कुँवरसिंह से लार्ड मार्कर का मुकाबला हुआ | मार्कर ने अपने सैनिको को हमला करने का आदेश दिया | उसे अपनी तोपों और अपने सैनिको पर पूरा भरोसा था | इस समय कुँवरसिंह की सेना अत्यधिक मजबूत हो चुकी थी लेकिन वे जानते थे कि भीड़ से युद्ध जीता नही जा सकता इसलिए उन्होंने सैन्य संचालन की चतुराई पर भरोसा किया |

ब्रिटिश सैनिको की तोपे जब कुँवरसिंह के सैनिको के आगे आग उगल रही थी तभी कुँवरसिंह की सेना ने पीछे से दुश्मन पर आक्रमण कर दिया | मारकर की सारी योजना पर पानी फिर गया | उसकी सेना पीछे हटने लगी और अंत में वह अपनी सेना को लेकर आजमगढ़ की तरफ भागा | कुँवरसिंह ने ब्रिटिश सैनिको की मंशा को भांपकर बनारस और इलहाबाद पर अधिकार करने का विचार छोड़ दिया और जगदीशपुर जाने ओर उस पर कब्जा करने की योजना बनाई | इसके लिए दुश्मन को चकमा देना जरुरी था | यह काम उन्होंन बड़ी बहादुरी से किया | जनरल लुगार्ड आजमगढ़ से घिरे अंग्रेजो की मदद के लिए आ रहा था | कुँवरसिंह ने अपने कुछ कुशल सैनिको को टौंस नदी के पुल पर लुगार्ड का रास्ता रोकने के लिए तैनात कर दिया | शेष बची सेना को लेकर वे गाजीपुर को प्रस्थान किये | कुँवरसिंह ने अपने सैनिको को यह आदेश दिया था कि जब आजमगढ़ से सारी सेना को सुरक्षित गाजीपुर की सड़क पर पहुच जाने का संकेत दिया जाएगा , तब वे पीछे हटेंगे और सेना में आकर वे शामिल हो जायेंगे | इन सैनिको ने अपने दायित्व को बड़ी जिम्मेदारी से पूरा किया | अंग्रेजो ने समझा कि आजमगढ़ को अपने अधिकार में रखने के लिए विद्रोही पुल पर रोक अंग्रेजो को पुल पार करने नही दिया | उन्होंने पुल पर अपना हमला तेज किया लेकिन सिपाही इस बहादुरी से लड़े कि अंग्रेज सिपाही आगे न बढ़ सके | संकेत पाकर ही सिपाही पीछे हटे |

कुँवरसिंह के सिपाहियों को पुल से अचानक गायब होते देख लुगार्ड तेजी से आगे बढ़ा लेकिन कुँवरसिंह की सेना को जब उसने वहां से गायब होते हुए देखा तो वह बहुत आश्चर्य में पड़ गया | उसने तुंरत अंग्रेज घुड़सवार और घोड़ो द्वारा खीचा जाने वाला तोपखाना उनका पीछा करने को भेजा | 12 मील चलकर जब अंग्रेज सिपाहियों ने कुँवरसिंह के सिपाहियों को देखा तो अपने को चारो तरफ  से घिरा पाया | यहाँ पर दोनों सिपाहियों के बीच घमासान युद्ध हुआ और अंत में अंग्रेजो की पराजय हुयी | इस पराजय को सुनकर डगलस पांच-छ: तोपे लेकर आया | कुँवरसिंह ने फिर अपने चुनिन्दा सिपाहियों को इसका रास्ता रोकने का आदेश देकर अपनी सेना को दो रास्तो से गंगा की तरफ भेज दिया |

कुँवरसिंह के चुनिन्दा सिपाही अंग्रेज सिपाहियों का रास्ता तक तक रोके रहे जब तक उनकी सारी सेना सुरक्षित स्थान पर नही पहुच गयी और वे लोग अपने सैनिक दल में आकर शामिल हो गये और आगे बढने लगे | रात भर चलकर मनोहर नामक स्थान पर पहुचे और वही आराम करने लगे परन्तु तभी वहां पर डगलस अपने घुड़सवारों के साथ आ पहुचा और कुँवरसिंह की सेना पर आक्रमण कर दिया परन्तु थककर चूर हुए इन सिपाहियों का इस हमले के सामने ठहरना मुश्किल हो गया | कई हाथी , लड़ाई का सामान और रसद अंग्रेजो के हाथ लगी | कुँवरसिंह को जब पूर्ण रूप से यह मालुम पड़ा कि अब हमारी हार सुनिश्चित है तो अपने सिपाहियों को कई टुकडियो में बंटने और एक निश्चित स्थान और समय पर आ मिलने का आदेश दिया |

सिपाहियों को विभिन्न दशाओं में हटता देख अंग्रेजो ने उनका पीछा करना उचित नही समझा , अत: वही पड़ाव डाल दिया और कुँवरसिंह की गतिविधियों का पता लगाने के लिए आदमी भेज दिया | इधर निर्धारित स्थल पर एकत्रित होकर कुँवरसिंह की सेना पुन: आगे बढने लगी | दुश्मन को धोखा देने के लिए उन्होंने यह झूठी सुचना फैला दी कि नावो की कमी के कारण वे हाथियों से बलिया के पास गंगा पार करेंगे | डगलस यह समाचार पाकर बड़ा खुश हुआ और बलिया जाकर कुँवरसिंह के दल के आने का रास्ता देखने लगा | कुँवरसिंह के सैनिको ने बलिया से लगभग 7 मील दूर शिवपुर घाट से नावो में बैठकर गंगा पार की |

डगलस सूचना पाकर जल्दी वहां पहुचा लेकिन सिर्फ अंतिम नाव उसके हाथ लगी | बाकी सेना या तो पार कर गयी थी या बीक नदी में पहुचे चुकी थी किन्तु यही पर एक दुर्घटना घटी | गंगा पारकर कुँवरसिंह हाथी पर बैठकर जा रहे थे तभी डगलस ने कुँवरसिंह को देख लिया | इसके बाद उसने कुँवरसिंह के उपर एक हथगोला फेंका | यह गोला कुँवरसिंह की भुजा पर लगा और वहां का मांस उड़ गया जिसके कारण उन्होंने उस हाथ को काटना जरुरी समझा | 80 साल के इस वीर पुरुष ने दुसरे हाथ से तलवार निकाली और कुहनी से नीच काटकर गंगा नदी में फेंक दिया |

22 अप्रैल 1858 को कुँवरसिंह ने जगदीशपुर पर आक्रमण कर दिया | उनका यह आक्रमण इतना आकस्मिक था कि आरा के अंग्रेजो को तब सुचना मिली जब जगदीशपुर को कुँवरसिंह ने अपने अधिकार में कर लिया था | यह समाचार पाते ही आरा का अंग्रेज सेनापति ले ग्रान्ड अत्यधिक गुस्से में आ गया | उसने अपने सैन्यबलों के साथ 23 अप्रैल को जगदीशपुर पर आक्रमण कर दिया | बीच के जंगल में ही कुँवरसिंह ने अपने सिपाहियों को लेकर उसे आ घेरा और इस कार्यवाही में ब्रिटिश ग्रान्ड की हत्या कर दी गयी | 190 अंग्रेज सैनिको में केवल 80 सैनिक ही वापस जा सके | अंग्रेजी सेना में बाकी सिख सैनिक थे उनमे सिर्फ 7 ही मारे गये बाकी भाग गये |

कुँवरसिंह का आदेश था कि अंग्रेजो को अधिक से अधिक मारो और उनका साथ देने वाले भारतीयों को कम मारो | 26 अप्रैल 1858 को वीर कुँवरसिंह का जगदीशपुर में देहांत हो गया | कुँवरसिंह के देहांत के बाद उनका छोटा भाई अमर सिंह ने वहां की बागडोर सम्भाली | सफलता के कोई लक्षण न देखकर कुँवरसिंह के परिवार की 150 महिलाओ ने 19वी सदी में जौहर व्रत किया | तोपों के मुह के सामने खड़े होकर उन्होंने अपने हाथ से पलीते में आग लगाई | कुँवरसिंह का नाम आज भी एक साहसी वीर के रूप में लिया जाता है |

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