Vijay Singh Pathik Biography in Hindi | विजयसिंह पथिक की जीवनी

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Vijay Singh Pathik Biography in Hindi
Vijay Singh Pathik Biography in Hindi

विजयसिंह पथिक (Vijay Singh Pathik) अपने समय के विख्यात क्रांतिकारी थे | उनका वास्तविक नाम भूपसिंह था | वह उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के गुठावली गाँव के गुर्जर जाति के लम्बे कद के सुदृढ़ शरीर वाले सावले रंग के चेचक के दाग वाले युवक थे | वह खड़ी बोली की कविताये भी लिखता था |  उसने किशनगढ़ एवं अजमेर के लोको वर्क-शॉप में नौकरी की थी | वहा से वह खरवा आ गया और राव साहब के निजी सचिव के पद पर नियुक्त हो गया |

सन 1915 में जब राव साहब को टॉटगढ़ में नजरबंद किया गया तो वह भी उनके साथ था | 1915 में उसे टॉड गढ़ में बंदी बनाकर रखा गया था जहा से वह फरार हो गया और विजयसिंह पथिक के छद्म नाम से मेवाड़ में घुस गया | संयोगवश उसकी मुलाकात सीताराम दास से हुयी और सीताराम दास के आग्रह पर विजयसिंह पथिक (Vijay Singh Pathik) ने बिजौलिया आन्दोलन का नेतृत्व करना स्वीकार किया | उसकी उपस्थिति से किसानो का उत्साह बढ़ गया |

इस समय जागीरदारों द्वारा बिजौलिया के लोगो पर भारी कर लगाये गये थे और उनसे बलात बेगार ली जाती थी | बिजौलिया आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य इन अत्याचारों के विरूद्ध आवाज उठाना था | सन 1913 में साधू सीताराम दास के नेतृत्व में बिजौलिया के किसानो ने अपना विरोध प्रकट करने के लिए भूमि कर देने से इनकार कर दिया | एक वर्ष के लिए खेती करना भी स्थगित कर दिया | इसके बाद 1915 में साधू सीताराम चित्तोडगढ गये |

वंहा उन्होंने विजयसिंह पथिक (Vijay Singh Pathik) से सम्पर्क किया और उनसे बिजौलिया के जागीरदार द्वारा जनता पर किये जाने वाले अत्याचारों की कहानी सुनाते हुए आन्दोलन का नेतृत्व करने का अनुरोध किया जिसको उन्होंने स्वीकार कर लिया | 1916 में किसानो ने अन्याय और शोषण के विरुद्ध “किसान पंच बोर्ड” की स्थापना की , जिसका अध्यक्ष साधू सीताराम दासजी को बनाया गया | इस समय किसानो ने विजयसिंह पथिक के आह्वान पर युद्ध ऋण देने से इंकार कर दिया |

बिजौलिया के ठाकुर ने इस आन्दोलन को कुचलने के लिए दमनकारी साधनों का सहारा लिया | हजारो किसानो और उनके प्रतिनिधियों को जेलों में ठूंस दिया गया जिसमे साधू सीतारमा दास , रामनारायण चौधरी और माणिक्यलाल वर्मा भी शामिल थे | इस समय पथिक भागकर कोटा राज्य की सीमा में चले गये और वहा से आन्दोलन का नेतृत्व एवं संचालन करते रहे | विजयसिंह पथिक ने कानपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र “प्रताप” के माध्यम से बिजौलिया के किसान आन्दोलन को समूचे देश में चर्चा का विषय बना दिया | इस पर जागीरी दमन-चक्र जोर पकड़ गया | आन्दोलन और दमन चक्र चलता रहा |

धीरे धीरे बिजौलिया आन्दोलन का प्रभाव मेवाड़ के अन्य जागीरो तथा सीमावर्ती राज्यों के किसानो पर भी पड़ने लगा | इससे ब्रिटिश अधिकारी सतर्क हो गये | उन्हें इस आन्दोलन में रूस के बोल्शेविक आन्दोलन की प्रतिछाया दिखाई देने लगी अत: मेवाड़ स्थित ब्रिटिश रेजीमेंट ने महाराणा और जागीरदार को इस आन्दोलन कुचलने की सलाह दी | इस बीच 1920 ईस्वी में नागपुर कांग्रेस अधिवेशन के अवसर पर विजयसिंह पथिक , माणिक्यलाल वर्मा , साधू सीतारामदास आदि नेताओं ने गांधीजी तथा अन्य कांग्रेसी नेताओं ने गांधीजी तथा अन्य कांग्रेस नेताओं से भेंट कर उन्हें किसानो की दुर्दशा से अवगत कराया और उन लोगो का नैतिक समर्थन प्राप्त किया |

1920 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन शुरू कर दिया गया जिससे भारत सरकार के लिए एक नई परेशानी उत्पन हो गयी | मेवाड़ सरकार ने प्रतिनिधियों , बिजौलिया जागीरदार के प्रतिनिधियों और किसानो की ओर से “राजस्थान सेवा संघ”के प्रतिनिधियों ने वार्ता में भाग लिया और अंत में फरवरी 1922 में समझौता हो गया | समझौते के अनुसार किसानो की अनेक मांगे स्वीकार कर ली गयी , अनेक करो को समाप्त कर दिया गया और लगान की मांग भी कम कर दी गयी | बेगार प्रथा को समाप्त कर दिया गया | इस प्रकार 1922 में आन्दोलन समाप्त हुआ |

मेवाड़ सरकार ने बेगू किसान आन्दोलन के सिलसिले में पथिक को बंदी बनाकर साढ़े तीन वर्ष के कारवास की सजा दे दी |  1923-26 का समय किसानो ने बड़ी तकलीफ में गुजारा | 1926 में अंग्रेज अधिकारी ट्रेंच ने भूमि बन्दोबस्त प्रस्तावित किया जिससे पीवल क्षेत्रो के लिए लगान की दर को थोडा कम कर दिया गया परन्तु बारानी क्षेत्रो पर लगान की दर को बढ़ा दिया गया | मार्च 1927 में किसान पंचायत हुयी जिसमे रामनारायाण चौधरी और माणिक्यलाल वर्मा भी उपस्थित हुए |

पंचायत में बारानी क्षेत्रो को छोड़ देने पर विचार -विमर्श हुआ | इसी समय पथिक जेल से रिहा हुए | पथिक ने किसानो को बारानी भूमि छोड़ने अरु अहिंसात्मक साधनों से आन्दोलन को जारी रखने का सुझाव दिया | पथिक का विश्वास था कि किसानो द्वारा छोड़े जाने वाली बारानी भूमि को किसान लोग नही खरीदेंगे और जागीरदार को विवश होकर लगान कम करना पड़ेगा परन्तु जागीरदारों ने बारानी भूमि पर बढ़े हुए राजस्व पर नये किसानो को दे दी |

अब किसानो ने अपनी अपनी समर्पित बारानी भूमि वापस करने के लिए सत्याग्रह करने का निश्चय किया | 21 अप्रैल 1931 को लगभग 400 किसानो ने अपनी समर्पित भूमि पर हल चलाना शुरू कर दिया | इस पर सेना ,पुलिस ,ठिकाने के कर्मचारी और भूमि के नये किसान मालिक ,किसानो पर टूट पड़े | 200 किसानो को बंदी बना लिया गया | हरिभाऊ उपाध्याय जी ने गांधीजी को किसानो पर हुए जुल्मो का विस्तृत विवरण भेजा | गांधीजी की सलाह पर पंडित मदन मोहन मालवीय ने उदयपुर के दीवान पर सुखदेव प्रसाद को पत्र लिखकर समस्या को हल करने का अनुरोध किया | इस प्रकार बिजौलिया आन्दोलन अब अखिल भारतीय रूप धारण करने लगा |

सन 1941 में मेवाड़ के दीवान टी.विजय राघवाचार्य ने राजस्व मंत्री डा.मोहनसिंह मेहता को बिजौलिया भेजा जिन्होंने किसान नेताओं एवं अन्य नेताओं से बातचीत कर किसान नेताओं एवं अन्य नेताओं से बातचीत कर किसानो की समस्या का समाधान करवाया | किसानो को उनकी जमीने वापस दे दी गयी | इस प्रकार यह आन्दोलन समाप्त हुआ | बिजौलिया के किसानो ने कष्ट और अत्याचार सहन करने की अद्भुद क्षमता का प्रदर्शन कर राजस्थान के लोगो में नई राजनितिक चेतना जागृत कर राष्ट्रीय भावना के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया |

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