भगवतीचरण वोहरा की जीवनी | Bhagwati Charan Vohra Biography in Hindi

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भगवतीचरण वोहरा की जीवनी | Bhagwati Charan Vohra Biography in Hindi
भगवतीचरण वोहरा की जीवनी | Bhagwati Charan Vohra Biography in Hindi

भगवतीचरण (Bhagwati Charan Vohra )का जन्म 4 जुलाई 1904 को लाहौर में हुआ था पर बड़े होने पर वे पंजाब में आकर रहने लगे थे | बोहरा सम्प्रदाय में दीक्षित हो गये थे |यही कारण है कि वे भगवतीचरण वोहरा (Bhagwati Charan Vohra) के नाम से संबोधित किये जाते थे | भगवतीचरण की शिक्षा-दीक्षा लाहौर में हुयी थी | वे प्रकृति से विप्लवी थे नियमो को तोडकर चलने वाले थे | अत: विद्यार्थी अवस्था में ही क्रांतिकारियों में सम्मिलित होकर देश की स्वतंत्रता के लिए कार्य करने लगे थे |

विद्यार्थी अवस्था में ही भगवतीचरण का विवाह हो गया था | उनके पत्नी का नाम दुर्गा बोहरा था | दुर्गा के पिता एक सन्यासी थे | उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह भगवतीचरण के साथ यह समझकर किया कि उनकी पुत्री उनके साथ सुख से रहेगी पर जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि भगवतीचरण का साथ क्रांतिकारियों का है तो वह बहुत दुखी हुए थे | पर स्वयं दुर्गा जी को इस बात से रंचमात्र भी दुःख नही था | दुःख के स्थान पर उन्हें अभिमान था क्योंकि उनके हृदय में भी देश के प्रति प्रगाढ़ भक्ति थी |

भगवतीचरण ने बड़ी अनन्यता के साथ अपने क्रांतिकारी पति का साथ दिया | एक समय था जब उनका घर क्रान्तिकारियो का अड्डा बना रहा था | वे क्रांतिकारियों में दुर्गा भाभी के नाम से जानी जाती थी | भगवतीचरण ने पढना छोड़ने के पश्चात देश के काम के अतिरिक्त और कोई काम नही किया | उन्होंने उत्तर प्रदेश , दिल्ली और पंजाब में क्रांतिकारी दल का संघठन बड़े उत्साह और बड़ी लगन के साथ किया था | वे चंद्रशेखर आजाद और भगतसिंह जी के दांये हाथ थे |

भगवतीचरण (Bhagwati Charan Vohra) ने अपने प्राणों की चिंता न्र करके क्रान्तिकारियो के लिए अपना घर खोल रखा था | कोई भी क्रांतिकारी किसी भी समय उनके घर में जा सकता था रोटी खा सकता था और विश्राम कर सकता था | क्रांतिकारियों की बैठके भी प्राय: उन्ही के घर में हुआ करती थी | क्रांतिकारियों के लिए अर्थ का प्रबंध वे ही किया करते थे |

1928 ई. में भारत में साइमन कमीशन का आगमन हुआ था | कांग्रेस के निश्चयानुसार सारे देश में कमीशन का बहिष्कार किया गया | अक्टूबर में जब कमीशन लाहौर गया तो वहा भी उसके बहिष्कार के लिए एक बहुत बड़ा जुलुस निकाला गया था | जुलुस का नेतृत्व लाला लाजपतराय जी ने किया था | जुलुस जब लाहौर स्टेशन पर पहुचा तो उस पर घोड़े तो दौडाए ही गये , लाठियों की वर्षा भी की गयी | लाठी की चोट लालाजी को भी लगी फलस्वरूप उनका स्वर्गवास हो गया |

लालाजी के स्वर्ग-गमन में सारे देश में शोक का सागर उमड़ पड़ा | जहां शोक का सागर उमड़ा वही असंतोष की आग जल उठी क्योंकि उनकी मृत्यु लाठियों की चोट से हुयी थी | क्रांतिकारियों का मन विक्षुब्ध हो उठा | उन्होंने उस अंग्रेजी पुलिस ऑफिसर सांडर्स को मार डालने की प्रतिज्ञा की जिसके संकेत पर लालाजी पर लाठी चलाई गयी थी | क्रांतिकारियों ने सैंडर्स की हत्या की योजना तैयार की |

आखिर 16 दिसम्बर के इदं संध्या समय 4 और 5 के बीच में सैंडर्स की हत्या कर दी गयी | उसकी हत्या के करने में भगतसिंह , राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद का हाथ था | हत्या के पश्चात बड़े जोरो के साथ इन तीनो की गिरफ्तारी के लिए प्रयत्न किया जाने लगा परन्तु अधिक प्रयत्न करने पर भी तीनो क्रांतिकारियों में से किसी की भी गिरफ्तारी नही की जा सकी |

भगवतीचरण (Bhagwati Charan Vohra)  , दुर्गा भाभी और भगतसिंह एवं राजगुरु ने मिलकर लाहौर निकल जाने की एक योजना बनाई | इस योजना के अनुसार भगतसिंह एक अमेरिकी साहब के वेश में अपनी पत्नी और अर्दली के साथ रेलगाड़ी के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठकर लाहौर से कलकत्ता चले गये | दुर्गा भाभी ने अमेरिकन साहब की पत्नी और राजगुरु ने अरदली का वेश धारण किया था | आजाद भी उसी गाडी से साधू के वेश में लाहौर से बाहर चले गये |

कहा जाता है कि मार्ग में किसी स्टेशन पर भगवतीचरण ने अमेरिकन वेशधारी भगतसिंह के डिब्बे के पास खड़े होकर अपनी पत्नी दुर्गा से कहा था “वास्तविक रूप में आज ही तुम्हारा मेरे साथ विवाह हुआ ” | सैंडर्स की हत्या के बाद जब जोरो से गिरफ्तारिय होने लगी तो भगवतीचरण और दुर्गा दोनों अदृश्य हो गये | दुर्गा तो अमेरिकन स्त्री के वेश में भगतसिंह के साथ कलकत्ते चली गयी और भगवतीचरण उत्तर प्रदेश की ओर चले गये थे | घटनाओं से पता चलता है कि दुर्गा और राजगुरु कलकत्ते नही किया थे | कलकत्ते अकेले भगतसिंह ही गये थे |

पुरे डेढ़ वर्ष तक भगतसिंह फरारी की स्थिति में इधर-उधर घूमते रहे | वे कहा कहा गये थे और क्या करते रहे -इस संबध में आज तक भी कुछ पता नही चल सका , बस केवल इतना ही कहा जा सकता था कि डेढ़ वर्ष तक वे प्राय: अदृश्य ही रहे | उधर भगतसिंह पहले तो कलकत्ते गये और फिर आगरे चले गये | आगरे में उन्होंने अपने साथियों से मिलकर दिल्ली के केन्द्रीय असेम्बली हॉल में बम-विस्फोट करने की योजना बनाई |

भगतसिंह और दत्त की योजना के अनुसार 1929 के जून मास में दिल्ली में केन्द्रीय असेम्बली हॉल में विस्फोट किया , फलस्वरूप भगतसिंह एवं दत्त को गिरफ्तार करके लाहौर जेल में पहुचा दिया गया | पहले उन्हें दिल्ली की जेल में रखा गया था फिर लाहौर के मिंयावाली जेल में भेज दिया गया | राजगुरु , सुखदेव आदि को पहले ही गिरफ्तार करके मियावाली जेल में रखा गया था |

जेल में क्रांतिकारियों के साथ अच्छा व्यवहार नही किया जा सकता था अत:उन्होंने अपनी कुछ मांगे सरकार के सामने रखी | सरकार जब उनकी मांगो पर ध्यान नही दे रहे थे तो उन्होंने अनशन आरम्भ कर दिया | जिन दिनों अनशन चल रहा था उन्ही दिनों भगवतीचरण , आजाद ने मिलकर आपस में परामर्श करके भगतसिंह को छुड़ाने के एक योजना बनाई | योजना यह थी कि अनशन के कारण जब भगतसिंह को दुसरी जेल में ले जाया जाने लगे तो रस्ते में पुलिस की गाडी पर बम फेंकर उन्हें छुड़ा लिया जाए | कहा जाता है कि दुर्गा भाभी ने भगतसिंह जी की चाची के वेश में दो-तीन बार जेल में जाकर उन्हें योजना से अवगत कराया था |

योजना अच्छी तरह तैयार हो गयी , तो निश्चय किया गया कि बम का विस्फोट करने से पूर्व उसका परीक्षण कर लिया जाए | कही ऐसा न हो कि समय पर विस्फोट न हो और सारी योजना विफल हो जाए | 28 मई 1930 को भगवतीचरण और आजाद बम का परीक्षण करने रावी नदी के तट पर निर्जन स्थान पर गये | आजाद तो कुछ दूर बैठे रहे पर भगवतीचरण हाथ में बम लेकर उसका परीक्षण करने लगे | उन्होंने कहा “कैप कुछ ढीली लग रही है ”

वैशम्पायन बोल उठे “लाओ मै जरा देख लू”

पर भगवतीचरण बम वैशम्पायन की ओर बढाये उसके पूर्व ही बम फट गया | बड़े जोर से धमाका हुआ | भगवतीचरण के दोनों हाथ कट गये और शरीर क्षत्त-विक्षत हो गया | वैश्मपाय्न और आजाद वहा ठहर नही सके क्योंकि धमाके से पुलिस के आने का डर था | उन्होंने दुर्गा भाभी के पास जाकर इस दुखद घटना का समाचार सुनाया | वे न तो रावी के तट पर अपने मृत पति के शव के पास जा सकी और न अच्छी तरह रोकर अपने हृदय के दुःख को ही कुछ कम कर की |

देश के अहित की आशंका में उनके हृदय को वज्र बना दिया | उनके आंसुओ को सुखाकर बर्फ की भाँती कठोर बना दिया | सुनते है कि भगवतीचरण (Bhagwati Charan Vohra) के क्षत-विक्षत शरीर को किसी अपरिचित मनुष्य ने रावी नदी की लहरों में प्रवाहित कर दिया | रावी नदी अपने वीर पुत्र को अपनी गोद में लेकर पुलकित हो उठी |

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