Bhamashah History in Hindi | दानवीर भामाशाह की जीवनी

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Bhamashah History in Hindi | दानवीर भामाशाह की जीवनी
Bhamashah History in Hindi | दानवीर भामाशाह की जीवनी

महाराणा प्रताप के प्रधान सामंत और उनके विश्वास पात्र योद्धा वीर भामाशाह (Bhamashah) ने देश भक्ति का सुंदर प्रसंग नव भारत के लिए छोड़ा है | भामाशाह (Bhamashah) के पिता भारमल को महाराणा सांगा ने अलवर से बुलाकर रणथम्भौर दुर्ग का अध्यक्ष नियुक्त किया था | महाराणा उदयसिंह ने भारमल को एक लाख का पट्टा दिया था और इनकी हवेली चित्तोडगढ के राजमहलो के सामने तोपखाने के पास थी | भारमल की हस्तीशाला गढ़ की तलहटी के मुख्य द्वार के पास थी |

भामाशाह (Bhamashah) का परिवार कावड़िया ओसवाल जैन था और उनका प्रथम उल्लेख हल्दीघाटी युद्ध में हुआ है | इस युद्ध में भामाशाह अपने भाई ताराचंद के साथ मेवाड़ी सेना के दांये पार्श्व में थे और इसी पार्श्व ने प्रथम प्रहार मुगलों पर किया था जिसके प्रचण्ड वेग से मुगलों का फ़ौज बख्शी खा और हरावल भाग छुटे थे | हल्दीघाटी के युद्ध के बाद भामाशाह ने मेवाड़ की सैनिक टुकडियो का नेतृत्व करते हुए अनेक बार गुजरात , मालवा और मालपुरा को लुटकर स्वतंत्रता संघर्ष के लिए धन जुटाया था |

वीर विनोद के अनुसार भामाशाह (Bhamashah) मेवाड़ के लिए वैसे ही थे जैसे गुजरात के अन्हिलवाड़ के सोलंकी नरेशो के प्रधान वस्तुपाल और तेजपाल | भामाशाह का मालवे पर धावा प्रसिद्ध है जहां से 20 हजार स्वर्ण मुद्राए लुटकर चुलिया ग्राम में उन्होंने प्रताप को भेंट की थी | अब्दुरहीम खानखाना ने ने भी भामाशाह को अकबर के पक्ष में आने का प्रलोभन दिया था परन्तु भामाशाह का वीरत्व था हिंदुत्व का गौरव था कि राष्ट्रभक्ति को छोड़ वे एक आक्रमणकारी विदेशी की सत्ता में नही आये |

महाराणा प्रताप ने दिवेर घाटी का जो युद्ध जीता था उसमे भामाशाह भी उनके साथ था | इस युद्ध को कर्नल टॉड ने मेराथन की संज्ञा दी थी | महाराणा अमरसिंह के समय में भी भामाशाह अहमदाबाद से दो करोड़ का धन लाये थे | ऐसा प्रसिद्ध है कि मृत्यु से पूर्व भामाशाह ने अपनी धर्म पत्नी को गुप्त बही थी जिससे कि संकट काल में महाराणा गुप्त राजकोष से धन प्राप्त कर सके | इस कोष से महाराणा अमरसिंह का वर्षो तक खर्च चलता रहा |

उत्कृष्ट देश सेवा करते हुए वीर भामाशाह (Bhamashah) का देहांत हुआ तो महाराणा अमरसिंह ने उनका दाह संस्कार मेवाड़ महाराणाओ के दाह संस्कार स्थल गंगोद्भव तीर्थ पर अपने लिए निर्धारित स्थान के पास कराया | इस प्रकार मेवाड़ का यह सपूत महाराणा द्वारा सम्मानित हुआ और उसका स्थान सदा के लिए महाराणाओ के बीच हो गया | वस्तुतः भामाशाह क्षत्र्यित्व और श्रमण भावना का मूर्तरूप है उनकी शाश्वत एकता , सजातीयता का प्रतीक है | ऐसे ही वीरो ने समय-समय पर नाना प्रकार से भारत की सुरक्षा की है |

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