गुरु गोबिंद सिंह जी की जीवनी | Guru Gobind Singh Biography in Hindi

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गुरु गोबिंद सिंह जी की जीवनी | Guru Gobind Singh Biography in Hindi
गुरु गोबिंद सिंह जी की जीवनी | Guru Gobind Singh Biography in Hindi

गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh) का जन्म 22 दिसम्बर 1666 को हुआ था | ये सिखों के दसवे गुरु थे | इनके पिता का नाम गूर तेग बहादुर था जो सिखों के नवे गुरु थे | इनकी माता का नाम गुजरी था | गुरु गोबिंद सिंह मात्र नौ वर्ष की उम्र में ही एक वीर योद्धा बन चुके थे | उन्होंने ही सिखों को युद्ध करने की शिक्षा दी और उन्हें वीर युद्ध करने वालो की परम्परा में खड़ा किया |

गुरु गोबिंद सिंह (Guru Gobind Singh) को बचपन में गोविन्द राय के नाम से पुकारा जाता था | वे बचपन से ही अकेले में बैठकर ईश्वर का ध्यान करते या ईश्वर की पूजा में इतना ध्यानमग्न हो जाते थे कि कि सब भूल जाया करते थे | पिता का बलिदान ने उनके अंदर अत्याचारों का डटकर मुकाबला करने की ज्वाला भर दी थी | छोटी सी उम्र में ही ये शस्त्र और शास्त्र दोनों विधाओं में पारंगत हो गये थे |

गुरु गोबिंद सिंह का विवाह 1745 में हुआ था | उनकी पत्नी का नाम सुन्दरी देवी था | उनके चार पुत्र अजीत सिंह , जोरावर सिंह ,झुझारू सिंह और फतेह सिंह थे | चमकोन नामक स्थान पर युद्ध में इनके पुत्र अजीत सिंह एवं झुझार सिंह वीरगति को प्राप्त हुए | जोरावर सिंह और फतेहसिंह को सरहिंद के नवाब ने अपना धर्म न छोड़ने के कारण जिन्दा दीवारों में चुनवा दिया था | इतना सब होने के बाद भी उनके चेहरे पर उदासी एवं निराशा नही थी | इसी कारण इन्हें मानवता की रक्षा के लिए लड़ने वाल संत सिपाही की उपाधि दी गयी है |

गुरु गोबिंद सिंह (Guru Gobind Singh) ने 13 अप्रैल 1699 को खालसा पन्थ की स्थापना की थी | 13 अप्रैल को ही प्रतिवर्ष बैसाखी का त्यौहार भी आता है | सिख लोग इसे गुरु गोबिंद सिंह द्वारा खालसा पन्थ की स्थापना के उपलक्ष्य में बड़े धूमधाम से मनाते है | खालसा अर्थात खालिस या शुद्ध | खालसा पन्थ का मार्गदर्शन के लिए कई निषेध किये गये है | उन्होंने अपने शिष्यों को केश न मुंडवाने , जांघिया सदा पहनने , सिर को नंगा न रखने , कंघा अपने पास सदा रखने , हाथ में लोहे का कड़ा सदा पहनने और तलवार सदा पास रखने की सलाह दी जिसे “पांच ककार” कहा गया | केश ,कंघा , कड़ा , कच्छा और कृपाण |

1699 की एतेहासिक बैशाखी एक अवसर पर उन्होंने आनन्दपुर में शीश भेंट परीक्षा का आयोजन किया , तो जो पांच आत्मोसर्गी आगे आये , उनमे भाई दयाराम (पंजाब ) , भाई धर्मदास (दिल्ली) , भाई हिम्मतचंद (उडीसा) , भाई मोहकमचंद (गुजरात) , भाई साहबचंद (कर्नाटक) का नाम था | गुरु गोबिंदसिंह ने अपने शिष्यों को बहादुरी का ऐसा पाठ पढाया कि जब भी बहादुरी  का नाम आता है “खालसा पन्थ के अनुयायी ही सम्मुख आते है | भारतीय सेना में सिख और “खालसा” दोनों बटालियन है |

गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh) ने नया उद्बोधन दिया “वाहे गुरूजी का खालसा , वाहे गुरूजी की फतेह” अर्थात खालसा ईश्वर का है और ईश्वर की फतेह सुनिश्चित है | उन्होंने कहा कि मेरे बाद कोई सिखों का गूर नही होगा , गुरु ग्रन्थ साहब ही सिखों का मार्ग प्रशस्त करेंगे | गुरु गोबिंदसिंह के जन्म दिवस पर सभी सिख स्त्री-पुरुष , बच्चे ,वृद्ध , प्रात:काल स्नाआदि से निवृत होकर गुरुद्वारे जाते है | गुरुद्वारे में श्री गुरु ग्रन्थ साहब के सामने मत्था टेकते है प्रसाद चढाते है और इसके बाद ही घर आकर कुछ खाते-पीते है |

गुरुद्वारे में अखंड “श्री गुरु ग्रन्थ साहब” का पाठ होता है | लोग अपने घरो में भी गुरु ग्रन्थ साहब का अखंड पाठ करवाते है | अखंड पाठ के दौरान श्री गुरु ग्रन्थ साहब के उपर चंवर ढूलाने का कार्य भी निरंतर चलता रहता है | पर्व के दिन अखंड पाठ की समाप्ति और हलवे के भोग के प्रसाद “श्री गुरु ग्रन्थ साहब” को सुंदर रथ में स्थापित कर सवारी निकली जाती है |

गूरद्वारो में लंगर किया जाता है | इसमें बिना किसी भेदभाव के सभी को एक पंक्ति में बैठाकर भोजन कराया जाता है | गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन एक कर्मवीर की तरह था | उन्होंने समय को अच्छी तरह परखा और फिर कार्य आरम्भ किया | उनकी प्रमुख शिक्षाओं में ब्रह्मचर्य , युद्ध विद्या , सदा शस्त्र पास रखने और हिम्मत न हारने की शिक्षाए प्रमुख है |

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