पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की जीवनी | Gyani Zail Singh Biography in Hindi

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 पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की जीवनी  | Gyani Zail Singh Biography in Hindi
पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की जीवनी | Gyani Zail Singh Biography in Hindi

भारत के सातवे राष्ट्रपति श्री ज्ञानी जैल सिंह (Gyani Zail Singh) उन महापुरुषों में से है जिन्होंने साधारण परिवार में जन्म लेकर अपनी प्रतिभा ,गुणवत्ता ,संघर्षमय जीवन के कारण लोकप्रियता प्राप्त की | आप देश के लिए सर्वस्व त्यागकर और कष्ट सहकर राष्ट्रपति के सबसे ऊँचे पद पर विराजमान हुए |

प्रारम्भिक जीवन एवं शिक्षा 

ज्ञानी जैल सिंह (Gyani Zail Singh) का जन्म 25 मई 1916 को पंजाब के संधवान गाँव में हुआ था | उनके दादा सरदार राम सिंह एक बढई कारीगर थे | बाद में उन्होंने सिख धर्म अपना लिया और रामगढ़िया कहलाने लगे | जैल सिंह अपने पिता किशन सिंह की तीसरी पत्नी बीबी इंदी कौर से पैदा हुए थे लेकिन वे जब केवल 11 महीने के थे तभी उनकी माता का निधन हो गया था | उनका पालन पोषण उनकी पहली बड़ी माँ बीबी दया कौर ने किया |

जैल सिंह (Gyani Zail Singh) पर घर का धार्मिक परिवेश का बहुत असर पड़ा | इसी का परिणाम था कि वे पांच साल की उम्र में ही गुरु ग्रन्थ साहिब का पाठ कर लेते थे | विदेशी शिक्षा तो दूर की बात थी उन्हें तो देशी शिक्षा भी केवल मिडिल क्लास तक ही मिल पायी | उन्होंने स्वाध्याय से हिंदी ,अंग्रेजी और उर्दू का अच्छा ख़ासा अध्ययन किया | उन्होंने जीवनयापन के लिए राजमिस्त्री , बढ़ई एवं लुहार सहित अनेक काम किये इसलिए आम आदमी के जीवन और उसकी इच्छाओ को उन्होंने करीब से महसुसू किया | 1934 में 18 साल की उम्र में जैल सिंह का बीबी प्रधान कौर से विवाह हो गया |

ज्ञानी जैल सिंह का राजनितिक जीवन

ज्ञानी जैल सिंह (Gyani Zail Singh) ने राजनितिक जीवन की शुरुवात फरीदकोट से की | वहां उन्होंने 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की एक शाखा स्थापित की | स्थानीय प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और पाँच साल कैद की सजा सुनाई | जेल से छूटने के बाद जैल सिंह ने कई गुरुद्वारों में स्वयंसेवक के रूप में धर्म प्रचारक का काम किया | बाद में उन पर महात्मा गांधी के विचारो का प्रभाव पड़ा | उन्होंने अहिंसा एवं सत्याग्रह का रास्ता अपनाया और स्वतंत्रता आन्दोलन में बढ़ चढकर भाग लिया |

देश को आजादी मिलने के बाद भी जब फरीदकोट के राजा के अत्याचार नही थमे तो जैल सिंह ने उनका डटकर मुकाबला किया | आखिर मेहनत रंग लाई और 1948 में फरीदकोट रियासत का विलय PEPSU (पंजाब और पूर्वी पंजाब राज्यों के संगठन) में हो गया | उन्हें राजस्व मंत्री बनाया गया | 1956 में वे राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित हुए | 1962 में पंजाब विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद उन्हें जेल एवं पशुपालन मंत्री बनाया गया |

17 मार्च 1972 को जैल सिंह (Gyani Zail Singh) पंजाब के मुख्यमंत्री बने | इस दौरान पंजाब में हरित क्रांति और औद्योगिक क्रांति में उल्लेखनीय प्रगति हुयी | 1980 में होशियारपुर संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतकर सातवी लोकसभा में पहुचे तो प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने उन्हें गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी | गृह मंत्री के रूप में उन्हें अनेक कठिन समस्याओं से रुबुरु होना पड़ा | पंजाब और असम में अलगाववादी आन्दोलन सुलग रहे थे | इन समस्याओं को उन्होंने सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझाया लेकिन जरूरत पड़ने पर कठोर कदम उठाने से भी नही चुके |

खालिस्तान की मांग का उन्होंने स्पष्ट विरोध किया | जून 1982 में राष्ट्रपति पद का नामाकंन दाखिल करने से पहले उन्होंने गृह मंत्री से त्यागपत्र दे दिया | चुने जाने के बाद उन्होंने राष्ट्रपति भवन के दरवाजे सभी के लिए खोल दिए | वे प्रतिदिन आम लोगो से मिलने के लिए जनता दरबार लगाते थे |

प्रखर और प्रभावी वक्ता 

पंजाब के फरीदकोट में आर्य समाजियों की एक सभा में अपने धर्म के पक्ष में बोलने के लिए विभिन्न वक्ताओं को बुलाया गया | लेकिन सभा में सिख धर्म के विचारों को रखने वाला कोई नही था | ऐसे में जैल सिंह की प्रतिभा से परिचित कुछ लोगो ने उन्हें भी आमंत्रित कर लिया | इस सोलह वर्षीय युवक ने सभा में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अपने विचारो को रखा उअर भाषण समाप्त होने के बाद उनकी अनूठी वक्तव्य शैली और आकाट्य तर्को से प्रभावित होकर लोगो ने जैल सिंह को कन्धो पर उठा लिया और जयकारा लगाने लगे |

आध्यात्मिक पुरुष एवं अंतिम दिन

ज्ञानी जेल सिंह (Gyani Zail Singh) वास्तव में आध्यात्मिक पुरुष थे | सिख मत के इस सच्चे अनुयायी ने सभी धर्मो को समान रूप से आदर किया | जब वे 5 रेसकोर्स रोड से राष्ट्रपति भवन गये तो उन्होंने गुरु ग्रन्थ साहिब को अपने मस्तक के उपर रखकर राष्ट्रपति भवन के पूजा गृह में प्रवेश किया | उन्होंने विद्वानों से वेद-उपनिषद , गीता ,कुरान और बाइबिल का भी सम्यक ज्ञान प्राप्त किया | वे उर्दू भाषा के भी अच्छे जानकार थे और शेरो-शायरी में उन्हें महारत हासिल थी | इसका असर उनके भाषणों में भी देखने को मिलता है |

हरियाणा के रोहतक के पास एक सड़क दुर्घटना में घायल होने के बाद वे 27 दिन तक कोमा में रहे | आख़िरकार 25 दिसम्बर 1994 को ज्ञानी जैल सिंह इस दुनिया को अलविदा कह गये |

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