हीरालाल सेन , भारत के प्रथम फिल्मकार | Hiralal Sen Biography in Hindi

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Hiralal Sen Biography in Hindi
Hiralal Sen Biography in Hindi

सावे दादा की ही तरह कोलकाता में हीरालाल सेन (Hiralal Sen) के भीतर भी फिल्म निर्माण की अभिरुचि जागृत हो चुकी थी | सन 1898 तक हीरालाल सेन ने कई छायाचित्रों को अखिल भारतीय प्रतियोगिताओं तथा प्रदर्शनियो में पुरुस्कृत एवं सम्मानित किया जा चूका था | छायांकन में उनकी प्रतिभा अक अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब वो महज सोलह साल के थे तभी उनके एक छायाचित्र को सर्वश्रेष्ठ छायाचित्र की श्रेणी में स्वर्ण पदक का सम्मान मिला था |सेन के इस छायाचित्र में सूर्यास्त को बड़े ही मार्मिक तरीके से दर्शाया गया था |

छायांकन में उनके कला कौशल को प्रोत्साहन मिलने के बाद सेन (Hiralal Sen) ने फिल्म माध्यम की तरफ भी ध्यान बंटाया | सेन फिल्म विद्या से गहरे तौर पर प्रभावित हो गये थे | उन्होंने विभिन्न प्रान्तों में घूम-घूमकर फिल्मो का प्रदर्शन किया और धन भी अर्जित किया | इसी क्रम में अब उनके भीतर फिल्म निर्माण की भी अभिरुचि जागृत हो गयी | संयोग यह कि उन्हें जल्द ही फिल्म निर्माण की कला को नजदीक से देखने का अवसर भी मिल गया |

दरअसल 1900 में फ्रास की पाथे कम्पनी में कई कैमरामैन कोलकाता के जन-जीवन क्र दृश्यों को फिल्मांकन करने आये थे | हीरालाल सेन को इन्ही कैमरामैनो का सहायक बनने का मौका मिला | इस दौरान उन्होंने फिल्म निर्माण की बारीकियाँ सीखी | उन दिनों पाथे बन्धु के काम को ल्यूमियर बंधुओ से अधिक आधुनिक और विकसित समझा जाने लगा था | हीरालाल सेन (Hiralal Sen) पाथे कम्पनी का कैमरा खरीदने वाले पहले भारतीय बने |

उन्होंने इसी कैमरे से सन 1902 से 1905 के बीच लगभग बीस नाटको का फिल्मांकन किया | इतना ही नही , उन्होंने आगे चलकर कई फिल्मे भी बनाई | इनमे सबसे प्रमुख थी “अलीबाबा और चालीस चोर” | इस फिल्म की अवधि दो घंटे से अधिक थी | सन 1906 में उन्होंने वृतचित्र “बंगाल के विभाजन का आन्दोलन” भी बनाया था | यह फिल्म इंग्लैंड भेजी गयी थी | बंगाली फिल्मो के सुप्रसिद्ध अभिनेता प्रभात मुखर्जी के अनुसार “हीरालाल सेन की फिल्मो में नये प्रयोगों की भरमार थी मसलन वो क्लोज-अप और रिल्ट्स आदि का भरपूर प्रयोग करते थे जिसे उस दौर के फिल्मकार कम ही इस्तेमाल करते थे | ऐसे में सेन की फिल्मोग्राफी को लोग खूब पसंद करते थे “|

उस समय की तकनीकी विकास के मुताबिक ये सभी तकनीक बहुत ही आधुनिक समझी गयी थी | हालांकि हिंदुस्तान के इन दोनों मशहूर छायाकारो हरिश्चन्द्र सखाराम भाटवाडेकर और हीरालाल सेन (Hiralal Sen) का कला कौशल ल्यूमियर बंधुओ की शैली की यथार्थवादी छायांकन कला तक ही सिमित था | चलचित्र छायांकन में मनोरंजन के मकसद से कल्पनाशीलता की अभी पुरी गुंजाईश थी | इनके कैमरे से मौलिक कहानी अभी तक नही कही जा सकी थी | इनके चलचित्र किसी घटना का पुनर्प्रस्तुतिकरन मात्र थे | इस दृष्टि से हिंदुस्तान में अब भी कल्पनाशील और मौलिक सिनेमा के चमत्कार का इन्तजार था |

हीरालाल सन (Hiralal Sen) का जन्म 1866 में ढाका से 80 किमी दूर माणिकगंज के एक छोटे से गाँव बजगुरी में हुआ था | अपने इलाके के जमींदार परिवार के एक सफल वकील के घर जन्म लेने के कारण उनकी परवरिश कलकत्ता में हुई थी | इसके बाद से उनका करियर शुरू हुआ था | 1913 में उन्होंने अपने करियर की अंतिम फिल्म बनाई थी जो उनकी कम्पनी रॉयल बायोस्कोप बैनर तले बनी थी | उसके बाद वो कैंसर से झुझ रहे थे और 1917 में उनका देहांत हो गया | उनकी मृत्यु के चंद दिनों पहले एक आग में उनके द्वारा बनाई सभी फिल्मे नष्ट हो गयी |

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