Hiuen Tsang Biography in Hindi | चीनी यात्री ह्वेनसांग की जीवनी

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Hiuen Tsang Biography in Hindi | चीनी यात्री ह्वेनसांग की जीवनी भारत भूमि हमेशा से ही विदेशी लोगो के लिए आकर्षण और कौतुहल का विषय रही है | धर्म ,दर्शन ,आध्यात्म और विभिन्न संस्कृतियों का मिश्रण ने ना केवल विदेशीयों मो मन्त्रमुग्ध किया बल्कि यहा आने के लिए भी प्रेरित किया है | यहा की संस्कृति और शिक्षा ने तो जापानी ,चीनी , इटली ,अरबी ,पुर्तगाली और युरोप से लेकर संसार के समस्त महाद्वीपों के लोगो को प्रभावित किया है | इस प्रभाव से प्रेरित होकर जो यात्री यहा पर आये , उनमे चीनी यात्री ह्वेनसांग का नाम विशेष रूप से प्रसिद्ध रहा है | इस यात्री ने उत्तर ,दक्षिण ,पूर्व ,पश्चिम के दुर्गम मार्गो को भी अपने बाद आने वाले यात्रियों के लिए सुगम कर दिया | बौद्ध ग्रन्थ एवं यहा के दर्शन को वो यहा से अपने देश चीन लेकर गये |

ह्वेनसांग का जन्म 630 ईस्वी में एक साधारण परिवार में हुआ था | 3 भाइयो में सबसे छोटे होने पर भी उनका स्वभाव उनसे कुछ भिन्न था | युवावस्था में आते ही बौद्ध धर्म का आकर्षण उनमे ऐसा जागा कि उन्होंने बौद्ध भिक्षु बनने का संकल्प ले लिया | केवल 20 साल की उम्र में बौद्ध भिक्षु बनने के बाद उन्होंने चीनी बौद्धविहारों से इस धर्म-दर्शन को गम्भीरता से जानना चाहा , किन्तु उनकी ज्ञानपिपासा शांत न हो सकी | अत: उन्होंने निश्चय किया कि वह भारतवर्ष जाकर वहा के मूल ग्रंथो का अध्ययन करेंगे |

ह्वेनसांग अपने सफर के लिए निकल पड़े | वो मध्य एशिया के रास्ते ताशकंद ,समरकंद तथा काबुल होते हुए भारत 1 साल में पहुचे | यहा कपिशा की राजधानी श्लोका के विहार में ठहरे | 2 साल तक कश्मीर में रहते हुए बौद्धग्रंथो का गहन अध्ययन किया | थानेश्वर पहुचकर जयगुप्त नामक विद्वान के यहा अध्ययन करते रहे | कन्नौज के शासक हर्षवर्धन से उनका अच्छा परिचय हुआ | उस दौर में हर्षवर्धन उत्तरी भारत का सबसे शक्तिमान राजा था |

लगभग सम्पूर्ण भारत भ्रमण करते हुए वे मगध की राजधानी पाटलीपुत्र पहुचे , जो उस समय ज्ञान ,शिक्षा और संस्कृति का केंद्र थी | यहा उनकी ज्ञान पिपासा शांत हुयी | वहा के मन्दिरों ,स्तुपो और विहारों का दर्शन किया | बोधगया जाकर महात्मा बुद्ध के दर्शन की अनुभूति उन्हें प्राप्त हुयी | तत्पश्चात वह ज्ञान के सबसे बड़े केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय पहुचे | बौद्धग्रंथो का गम्भीर अध्ययन करते वहा की शिक्षा एवं संस्कृति से प्रभावित हुए |

आसाम के शासक भास्करवर्मन के निमन्त्रण पर वे आसाम पहुचे जहा उनका भव्य स्वागत हुआ | वही से हर्षवर्धन उन्हें अपने साथ प्रयाग ले गये और उनका समुचित सम्मान कर उन्हें बहुमूल्य उपहार भी दिए | लगभग 15 वर्षो तक भारत में रहने के बाद उनहोंने बौद्धग्रंथो का ना केवल अनुवाद किया , वरन कुछ ग्रन्थ अपने साथ चीन भी ले गये | इस चीनी यात्री की 664 ईस्वी में सियान में मृत्यु हो गयी |

ह्वेनसांग एक ऐसे चीनी यात्री थे जिन्होंने अपनी यात्रा वर्णन में भारत की तत्कालीन राजनितिक ,सामाजिक ,धार्मिक ,आर्थिक स्थिति तथा उसके प्रत्येक पहलू का विस्तार से वर्णन किया ,जो अब एतेहासिक विश्वकोष कहा जा सकता है | भारतीय धर्म दर्शन की विशेषताओ को उन्होंने अन्य देशो तक भी प्रचारित करने का कार्य कर भारत का गौरव बढाने का काम किया |

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